पानी-पानी हो रही पानी की पहचान…

Abhay Mishra

 

Symbolic Image ( PTI )

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पानी जो जीवन देता है अगर जहर बन जाए तो क्या होगा ? वाराणसी से लेकर बंगाल तक पानी में आर्सेनिक मिला हुआ है. गंगा पथ पर बसा ये गांव पहले जहां दोआब की संपदा से मालामाल था, वहीं अब पानी में मिला आर्सेनिक, हलक से उतरती हर बूंद के साथ लाखों लोगों को मौत के करीब ले जा रहा है. सैकड़ों लोगों के रिसते घाव इस बात का संकेत हैं कि बात हाथ से निकलती जा रही है. सदियों से गंगा किनारे शान से रहने वाला समाज समझ ही नहीं पा रहा कि उनकी गलती क्या है. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में प्राक्कलन समिति ने आर्सेनिक पानी पर अपनी रिपोर्ट दी. हालांकि रिपोर्ट में इस पर बात नहीं की गई कि आर्सेनिक आया कहा से ?

वैज्ञानिकों का मानना है कि आर्सेनिक हिमालय से बहकर आया है… और नदी की तलहटी पर मौजूद रहता है…सैकड़ों सालों में नदी ने जब रास्ता बदला तो उसकी छोड़ी गई जमीन पर गांव बस गए और भूमिगत जल के बेतहाशा दोहन ने पानी को जहरीला बना दिया . दरअसल आर्सेनिक एक सेमी मटैलिक तत्व है जो आयरन, कैल्शियम, कॉपर आदि के साथ क्रिया करता है . इसे इसके जहरीलेपन की वजह से जाना जाता है. इसमें कैंसर पैदा करने की क्षमता है और ये हवा, पानी, त्वचा और भोजन के संपर्क में आकर हमारे शरीर में पहुंच जाता है .

विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि 10 पार्ट प्रति बिलियन आर्सेनिक मिला पानी ही सुरक्षित होता है लेकिन बलिया और आसपास के क्षेत्रों में आर्सेनिक की मात्रा एक हजार से पंद्रह सौ पार्ट प्रति बिलियन तक पहुंच गई है. जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापक से कई सौ गुना ज्यादा है.

गंगा पथ के अलावा असम, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, में भी आर्सेनिक तेजी से अपने पैर फैला रहा है. संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि 12 राज्यों के 96 जिलों में भूमिगत जल बेहद प्रदुषित हो गया है .

रिपोर्ट के मुताबिक छह राज्यों के 35 जिलों में सात करोड़ से ज्यादा लोग इसके असर में हैं. संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे ज्यादा 20 प्रभावित जिले उत्तर प्रदेश में पाए गए, जबकि असम के 18, बिहार के 15, हरियाणा के 13, पश्चिम बंगाल के आठ और पंजाब के 6 जिलों में आर्सेनिक की मौजूदगी बड़ी समस्या बनी हुई है .

पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, बंगाल के सभी अस्पताल और दिल्ली के एम्स तक में आर्सेनिक पीड़ित लोगों की भीड़ बता देती है कि हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं. आर्सेनिक प्रभावित पानी से कैंसर, लिवर फाइब्रोसिस, हाइपर पिगमेंटेशन जैसी लाइलाज बीमारियां हो रही है. गर्भ में पल रहे बच्चे तक इससे अछूते नहीं हैं .

भूमिगत जल में आर्सेनिक की मौजूदगी ने खाद्य श्रृखला पर भी असर डाला है. इस क्षेत्र की मछलियों में अच्छा खासा आर्सेनिक पाया गया है और चावल में आर्सेनिक की मौजूदगी को लेकर मीडिया में कई रिपोर्ट आ चुकी है. पालतू जानवरों पर आर्सेनिक के असर को लेकर ना कोई जांच हुई है ना ही ये सरकारों की प्राथमिक सूची में शामिल हैं.

गंगा के किनारों पर फैल रहा आर्सेनिक का आतंक भी बाजार की नजर से बच नहीं पाया है. यहां बोतल बंद पानी एक बड़ी इंडस्ट्री बनकर उभरा है. बीस लीटर की एक बोतल के लिए बीस रूपए चुकाने होते हैं . इस बोतलबंद पानी के लिए कोई मापक और किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं है. लोग इस भरोसें में पानी खरीद रहे है कि पैसे के बदले मिल रहा ये पानी शायद आर्सेनिक मुक्त हो . ऐसा नहीं है कि सरकार आंखें मुंदे हुए है. आर्सेनिक रिमुवल प्लांट , पाइप लाइन जैसे कई उपाए किए गए लेकिन भ्रष्टाचार और रखरखाव के अभाव में उन्होने दम तोड़ दिया.

राज्य सरकारें हैंडपंप लगाने के लिए पूरी तरह ठेकेदारों पर निर्भर हैं. सरकारी कारिंदों को ये भी नहीं पता होता कि कोई हैंडपंप निर्धारित सीमा तक खोदा गया है या नहीं . एक बार प्लांट लगाने के बाद ठेकेदार दोबारा गांव का रूख भी नहीं करते, हालांकि मैंटेनेन्स की जिम्मेदारी उन्ही की है.

वास्तव में ये परंपराओं की ओर लौटने का वक्त है. विज्ञान इस मुद्दे पर एकमत है कि कुएं के पानी में आर्सेनिक नहीं पाया जाता. कुएं के पानी में आक्सीजन का प्रवाह ज्यादा रहता है और सूर्य की रोशनी पानी में आर्सेनिक को टिकने नहीं देती.

आर्सेनिक से पीड़ित लाखों की आबादी को देखकर लगता है मानों कोई श्राप काट रहे हों. लोगों ने अपने बाप दादाओं की जमीन को छोड़कर दूसरी जगह बसना शुरु कर दिया है. युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही और त्वचा पर असर के चलते लड़कियों की शादियां नहीं हो रही और अपने मस्त गांव की गलियों में खेलते बच्चे जानते ही नहीं कि जहर उनके जीवन को छीन रहा है.