प्यासी धरती, प्यासे लोग: जूझ रहा है जैसलमेर

Arvind Kumar Singh

Drought,-water-crisis,-irrigation,-farmer,-rainfall,-monsoonsभारत पाक सीमा के बेहद करीब स्वर्णनगरी जैसलमेर का घंटियाली गांव भयानक अकाल और जल संकट की मार झेल रहा है. जैसलमेर के 114 गांवों पर इस बार अकाल की भारी मार पड़ी है. आदमी तथा पशु सभी बेहाल हैं. घंटियाली गांव तनोट पंचायत के तहत आता है . भारत पाक युद्ध के दौरान इस गांव तक पाकिस्तानी सेना पहुंच गयी थी. गांव के चारों तरफ रेत का समंदर फैला हुआ है. मीलों दूर तक न दूसरा गांव है न हरियाली.

देश में कई इलाकों में मानसून ने अब तक दस्तक दे दी है लेकिन यहां अभी भी सूरज बरस रहा है. पचास से अधिक तापमान के बीच गांव में दिन काटना कितना कठिन होगा जहां आजादी के इतने सालों के बाद भी न बिजली है, न पानी और न सड़क.घंटियाली 100 घरों का है. रेगिस्तान के इस इलाके में ऐसे गांव छोटे नहीं माने जाते . खेती-बाड़ी नाम को है. बकरी भेंड़ और दुधारू जानवरों के सहारे गांव के लोग जिंदा रहते हैं. औरतें और बच्चियां एक किलोमीटर दूर से पानी लाती हैं. किसान मगसिंह बताते है कि 1500 जानवरों की दशा बहुत खराब है. सरकार ने गांव की सुध नहीं ली है न ही राहत पहुंची है. लोगों के लिए पानी नही है तो पशुओं को कहां से पिलाएं. सावित्री कंवर की शिकायत है कि पशुओं के लिए चारे का इंतजाम नहीं है . कई जानवर दम तोड़ चुके हैं.

घंटियाली के पास ही विख्यात तनोट माता के मंदिर का रास्ता है. देश के तमाम हिस्सों से लोग वहां दर्शन के लिए जाते हैं. लेकिन दिक्कतों पर किसी की निगाह नहीं जाती. औरतों की मांग है कि गांव में कमसे कम एक नल और शौचालय बन जाये तो उनका जीवन कुछ सरल हो जाएगा. देखा जाये तो यह मांग बहुत बड़ी नही है.

Water-canal,-irrigationगांव में हम चालीस मिनट बिता कर लौटने को हुए तो देखा कि हमारा वाहन रेत में धंस गया है. लोगों की पदचाप से हमने जिसे रास्ता मान लिया था, वह दरअसल रास्ता था नहीं. फिर भी हमारी गाड़ी गांव तक पहुंच गयी. लेकिन थोड़ी ही देर बाद रेत में फंस गयी. गनीमत थी कि सवा घंटे की मशक्कत के बाद गांव वालों की मदद से हम निकल सके अन्यथा रेतीले गांवों में तो लोग भी नहीं मिलते .

जैसलमेर जिले में भारत में सबसे कम बारिश होती है. सबसे अधिक तापमान भी इसी जिले का होता है. इसे नाते इसे अकाल का घर कहा जाता है. यहां जीवन बेहद कठिन है. फिर भी जैसलमेर में एक से एक शानदार धरोहर हैं और दुनिया भर से पर्यटक यहां आते हैं.

जैसलमेर जिले की आबादी सात लाख है और पशुओं की 33 लाख. करीब 38,392 वर्ग किलोमीटर में फैला जैसलमेर देश के सबसे बड़े जिलो में से एक है. इसका आकार करीब केरल राज्य के बराबर है. लेकिन यह जिला रक्षा के लिहाज से बहुत अहम है. इसी ज़िले के पोकरण में परमाणु परीक्षण हुआ था. भारतीय सेना, वायुसेना और बीएसएफ के महत्वपूर्ण केंद्र यहां हैं.

बेहद कठिन हालात वाले थार के रेगिस्तान में अधिकतर आबादी छोटे-छोटे गांवों और ढाणियों में ही रहती है. जिले की पाकिस्तान से लगी सीमा 471 किमी है और यहां कोई बारहमासी नदी नहीं हैं. रोजी-रोटी का जरिया नहीं और अधिकतर लोग खेती पर ही जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं. दूर-दूर तक स्थाई व अस्थाई रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले आंधियों के समय अपना स्थान बदलते रहते हैं. बारिश हो गयी तो कुछ जगहों पर पीने लायक पानी एकत्र हो जाता है और इसी से काम चलता है. अधिकांश कुंओं का जल खारा है.

Livestock-cattle-cows-water-shortageलेकिन शायद इसीलिए लोगों ने जल संचय के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के जीवन का हिस्सा बना लिया है. अकाल को मात देता खड़ा जैसलमेर का गड़ीसर तालाब आज भी शान के साथ पानी से लबालब है. जैसलमेर के प्रवेश पर यह शानदार तालाब रावल गडसीसिंह ने सन् 1340 ई. में बनवाया था. तब इसकी सुरक्षा के लिए खास बुर्ज भी बने. इसी के पानी पर 1965 तक जैसलमेर जिंदा रहा.आज भी तालाब और उसका पानी कायम है.

जैसलमेर में सदियों तक घी दूध तो आसानी से मिल जाता था लेकिन पानी नहीं. अब वैसी बात तो नहीं है लेकिन गर्मी में संकट बढ जाता है. शहरों से बुरी हालत देहातों की होती है,जहां दूर-दराज से पानी लाना पड़ता है. अधिकतर गांवों की नाडिय़ां और तालाब सूख जाने के बाद हाहाकार है. जलदाय विभाग की ओर से 25 टैंकरों के सहारे 82 गांवों और 205 ढाणियों में पीने का पानी भेजा जा रहा है. लेकिन एक टैंकर दो चक्कर लगाए तो भी एक सप्ताह में पूरे गांव और ढाणियों तक नहीं पहुंच पाता. अनेक गांव और ढाणियां दुर्गम हैं और परिवहन के साधनों की पहुंच से दूर.

राज्य सभा टीवी से बातचीत में जैसलमेर के पूर्व विधायक और भाजपा के बड़े नेता सांग सिंह जिले की उपेक्षा की शिकायत करते हैं. वे कहते हैं कि अकाल से हालत बहुत खराब है. खेती और पशुधन पर ही लोग जिंदा हैं औऱ कोई उद्योग धंधा नही है. जैसलमेर शहर में पर्यटन गतिविधियों से कुछ लोगों को रोजगार मिल जाता है. लेकिन अंदरूनी इलाक़ों की हालत खराब है. अगर थार पारकर देसी गाय की नस्लों को प्रोत्साहित कर पशुपालन को मजबूती दी जाये तो जीवन कुछ बेहतर हो सकता है. वे यहां की जटिल हालात में आसानी से रह लेती हैं औऱ सुबह शाम मिला कर 24 से 25 लीटर दूध देती हैं. खेती में इलाका बहुत पिछड़ा हुआ है.

जैसलमेर जिला भाजपा अध्यक्ष जुगलजी व्यास कहते हैं कि अकाल जैसलमेर ज़िले का सौतेला भाई है. वर्षों से लोग अकाल को झेलकर जी रहे हैं. अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में यहां कुछ काम हुए थे. लेकिन यहां योजनाओं को आगे बढ़ाने की जरूरत है.

जैसलमेर जिले की भारत-पाकिसान पर तापमान 55.9 डिग्री तक चला जाता है. सीमा सुरक्षा बल के जवान बेहद कठिन ड्यूटी देते हैं. गरमी तो इतनी पड़ती है कि रेत पर पापड़ सिक जायें. अब तस्वीर बदली है लेकिन पहले और दुश्वारियां थीं. ऊंट से जैसलमेर से सरहद तक का सफर तीन दिन में तय होता था. 1966 से 1973 तक इलाके में तैनात रहे बीएसएफ के रिटायर अधिकारी चंदनसिंह बताते हैं कि तब हालात बहुत खराब थी लेकिन आज कई सुविधाएं हैं. फिर भी इस गरमी में यहां रहना किसी युद्ध से कम नहीं. पहले तो कहावत ही थी कि पाणी महंगा, घी दूध सस्ता. आदमी अनाज का जुगाड़ भी कर ले लेकिन पानी कहां से लाये और उसके बिना काम कैसे चलेगा. अकाल बहुत विकराल पड़ता था लेकिन इंदिरा गांधी नहर से कई जगह तस्वीर बदली है और शहर को भी इसी से पानी मिल रहा है.

कम लोगों को पता है कि भारत में टिड्डी दलों का पहला हमला जैसलमेर की तरफ से ही होता है. इसी नाते यहां 1939 में टिड्डी दलों पर नियंत्रण के लिए दफ्तर खुला था. ये दफ्तर आज भी है और चौबीस घंटे चौकसी रहती है. भारत में 1992 में इनका बड़ा हमला हुआ था. फिर 2011 में हमला हुआ लेकिन हालत नियंत्रण में आ गया. काफी साजो सामानों से लैस है यहां का केंद्र.

लेकिन जैसलमेर में अभी भी कई दिक्कतें हैं. यहां की जमीनी हकीकत अलग है और एक व्यक्ति पर तीन से पांच जानवर हैं. आपदा राहत में औसत दो और केवल गायों को ही मदद का प्रावधान है. बड़े अफसरों को महीने भर में 2100 किमी तक की यात्रा की मंजूरी है. लेकिन जिला मुख्यालय से एक से दूसरे छोर की दूरी 230 किमी तक है. पांच छह दौरे में कोटा पूरा हो जाता है. जैसलमेर में सरकारी अमला भी कम है. स्वीकृत से 30 से 40 फीसदी तक ही तैनात है. इससे प्रशासन मे काफी दिक्कत आती है. जैसलमेर की भदारिया गौशाला में 24,020 जानवर हैं,जिनमें सबसे अधिक बैल हैं. बैल इस इलाके में आपदाओं के दौर में सबसे उपेक्षित रहते हैं. इतने उपेक्षित कि बेचने पर 100 रुपए में भी खरीदने को कोई तैयार नही. चारा पानी की दिक्कतों में लोग लावारिस छोड़ देते हैं.

जैसलमेर के अतिरिक्त जिलाधिकारी भगीरथ शर्मा का दावा है कि जिला प्रशासन ने राहत के कई कदम उठाए हैं. टैंकरों से पानी की व्यवस्था की गयी है, हैंडपंप अपडेट कराए गए है और नयी स्कीम के तहत गांवों में आरओ भी लगे हैं. अकाल प्रभावित गांवों में चारा डिपो मंजूर हुए हैं और गौशालाओं को अनुदान दिया जा रहा है. जो भी संसाधन हमें मिल रहा है उसका बेहतर उपयोग हो रहा है. वे मानते हैं कि आपदा राहत में जैसलमेर जैसे जिलों के लिए अलग रणनीति की जरूरत है.