प्यासी धरती, प्यासे लोग: जोधपुर की प्यास का पक्का समाधान कब ?

Arvind Kumar Singh

वैसे तो देश में मॉनसून ने अपनी दस्तक दे दी है ,लेकिन राजस्थान अभी भी झमाझम झड़ी का इंतज़ार कर रहा है. चंद रोज़ पहले तक की तस्वीर पेश करती राज्य सभा टीवी की ये ख़ास रिपोर्ट –संपादक

सूर्यनगरी जोधपुर देश में सबसे कठिन जलसंकट वाले इलाकों का प्रशासनिक मुख्यालय है. जोधपुर संभाग में जैसलमेर, बाड़मेर, पाली, जालौर, सिरोही और जोधपुर आते हैं. इनमें सिरोही को छोड़ कर बाकी सभी पांचों जिले अकाल और जल संकट से प्रभावित हैं. जोधपुर जिले की आबादी 22 लाख है और 467 गांव पंचायतें हैं. कई हिस्सों में जल संकट का असर दिख रहा है लेकिन खास तौर पर अकाल से जूझ रहा है. सबसे अधिक संकट पशुओं को है जिनके लिए न तो चारा है, न ही पानी.

Construction,-stone,-Rajasthanपालड़ी मांगलिया गांव पंचायत शहर के नजदीक है. यहां जल संकट का असर साफ़ नज़र आता है. यह गांव पंचायत मारवाड़ की प्राचीन राजधानी मंडोर के काफी करीब है. करीब 10 किमी के दायरे में फैली इस पंचायत में 5300 लोग रहते हैं और इसके आसपास पत्थर खदानें और कारखाने हैं. इनमें कुछ स्थानीय श्रमिकों को काम मिल जाता है. पहले काफी संख्या में काम मिल जाता था लेकिन अब मशीनों का दौर आया है, हाथ के काम की जरूरत नहीं. पत्थर खदानें कितनों को अरबपति बना चुकी हैं. पहाड़ लगातार कटते जा रहे हैं. और जिस इलाके में ये खानें हैं वहां के लोग मजदूर के मजदूर रह गए.

लेकिन गांव की बड़ी आबादी खेती बाड़ी पर ही निर्भर है. गांव के सरपंच मोहन राम चौधरी बताते हैं यहां बड़ी संख्या में जानवर चारे और पानी की कमी से दम तोड़ रहे हैं. ग्रामीणों की ओर से कई बार प्रशासन को जल संकट से अवगत कराया गया लेकिन कोई राहत नहीं मिली. जो संपन्न हैं वे टैंकरों से पानी मंगवा लेते हैं, लेकिन गरीबों का इकलौता सहारा यहां का कभी न सूखने वाला विष्णु कुंड है. बहुत से लोग यहीं से पानी ले जाते हैं. और काफी संख्या में जानवर भी यहीं भटक कर पानी पीने आते हैं.

जोधपुर के कमिश्नर रतन लाहोटी के मुताबिक़ छह में से पांच जिले अकाल की चपेट में है. पिछले साल ओलावृष्टि से भी जोधपुर के 35 और जैसलमेर के 15 गांव प्रभावित हुए थे और किसानों को काफी नुकसान पंहुचा था. केंद्रीय अध्ययन दल ने यहां जायजा लिया था. जोधपुर संभाग में बहुत गरमी होती है और पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों के लोग पानी का महत्व सबसे अधिक समझते हैं. प्रशासन ने टैंकरों से पानी भेजने के साथ गौशालाओं को भी मदद दी है.

भारतीय कृषि अनुंसधान परिषद का एक बेहतरीन संस्थान केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) जोधपुर में ही है. यह दुनिया की बेहतरीन संस्थाओं में है. कृषि वैज्ञानिक डॉ. जे.सी.तरफदार का मानना है कि यहां के शुष्क इलाकों में खेती बाड़ी और पशुपालन चुनौती भरा काम है. इस कारण यहां जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है.

Jodhpurजोधपुर की स्थापना राव जोधा ने सन् 1459 में की थी. कभी यह देश के महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्रों में था. यहां बना शानदार उमेद भवन पैलेस अकाल में लोगों को रोजगार देने के लिए यहां के पूर्व शासक उमेदसिंह ने 1929 से 1943 के बीच बनवाया था. इंदिरा नहर के पहले इस इलाके में इतना जल संकट था कि औरतें तीन चार किमी दूर से सिर पर मटका रख पानी लाने को विवश थीं. पुरुष भी बैलगाड़ी और ऊंटगाड़ियों में टैंक रख कर पानी लाते. ऊंटों पर पानी के पखाल गधों पर मटकियां, ट्राली पर टैंकर से पानी लाकर घरों की जरूरत पूरी की जाती थीं. यहां अकाल का पुराना ठिकाना बताने वाला यह दोहा खास विख्यात रहा है-:
‘पग पूंगल, घड़ कोटड़ेबाहु बाड़मेर,जाये लादे जोधपुर, ठावौ जैसलमेर’
पश्चिमी राजस्थान का अकाल से पुराना नाता रहा है. इतिहास के तमाम अकाल यहां के दस्तावेजों में दर्ज हैं. कभी गांव उजड़ गए तो कभी लोगो के भूखों मरने की नौबत आ गई. लोगों को याद है कि सन 1956 का अकाल भयावह था. उस समय भूख से करीब 10 लाख लोग मरे. जानवरों की मौत की तो गिनती तक नहीं. लोकगीतों में अकाल को याद करते हुए आज भी औरतें गीत गाती हैं-:
‘छपन्या रे काल, फेर मत आजे म्हारी दुनियां में’
1957 के बाद पूरे प्रांत में भले न हो लेकिन कई जिलों में आज भी आंशिक तौर पर अकाल दस्तक देता रहा है. 1985 और 1988 का अकाल भीषण था. 27 जिले प्रभावित हुए थे . इसी दौरान काम के बदले अनाज योजना शुरू हुई. 1997-98 में 20 जिले और 2002 में यहां पर 26 जिले अकाल की चपेट में आए. लेकिन इस बार के अकाल ने बड़े अकालों की याद दिला दी. अकाल की बड़ी मार उन 12 शुष्क मरुस्थलीय जिलों पर अधिक रहती है जिसके दायरे में राजस्थान का करीब 62 फीसदी भूभाग है. और कहा जाता है कि अकाल मारवाड़ के दरवाजे पर हमेशा खड़ा रहता है. यही सबसे गरम और सबसे सूखा इलाका है. यहाँ साल भर में जितना पानी बरसता है वह देश के कई हिस्सों में एक दिन में बरस जाता है. भूजल सबसे गहराई में है. मरुस्थल का विस्तार जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, पाली बीकानेर, चुरु श्रीगंगानगर, झुंझुनू, जालौर, नागौर और सीकर तक मिलता है. एक भी बारहमासी नदी नही है. 120 दिन की बारिश 10 दिन भी आ जाये तो गनीमत.

Rajasthan-Farmersराजस्थान में किसानों की हालत ठीक नही है. नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) की रिपोर्ट मानती है कि राज्य का 62 फीसदी किसान कर्जदार हो गया है. एक किसान पर औसत कर्ज 40,055 रुपए है.

जोधपुर मंडल में ही पाली की दशा बेहद दयनीय है. जवाई बांध में जल स्तर बहुत कम होने से हाल में जोधपुर से पाली के रोहिट तहसील में 65 गांवों के करीब 3.50 लाख लोगों के लिए पाइप लाइन से पानी भेजने का फैसला लिया गया है. एक दशक पहले भी यही नौबत आयी थी. पाली जिला प्रशासन रेल से पानी मंगवाने की संभावनाएं तलाश रहा है. लेकिन कई इलाकों में निजी कुओं तथा नलकूपों से लाखों लीटर पानी का दोहन टैंकर माफिया कर रहे हैं.

जोधपुर में राजशाही के दौर के एक से एक बेहतरीन तालाब और जलाशय तबाही के कगार पर खड़े हैं. कई कूड़ेदान बन गए हैं. पहले इनका पीने के पानी के लिए उपयोग होता था. लेकिन नयी बयार में ये किसी काम के नहीं रहे. कायलाना, उम्मेद सागर, तखतसागर, लालसागर, शेखावतजी का तालाब, गुलाब सागर, फतेहसागर, रानीसर, पदमसर, बाईजी का तालाब, बिजोलाई तालाब, तुंवरजी का झालरा, सुखदेवजी का झालरा, मायला बाग, सुमनोहर बावड़ी, गोरिन्दा बावड़ी और सूरजकुंड की कमोवेश एक सी दशा है. इनको संजोकर रखा जाये तो ये लोगों को जीवन और रोजगार दोनों दे सकते हैं.