प्यासी धरती, प्यासे लोग | बाड़मेरः राहत का इंतजार

Arvind Kumar Singh
Photo: RSTV

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जैसलमेर की तरह ही देश के सबसे कठिन इलाकों में एक है बाड़मेर. यह 16 सालों का 14वां अकाल झेल रहा है. यहां सबसे बुरी दशा ग्रामीण इलाकों की है. हर तरफ किसानों में बेचैनी और छटपटाहट है. वैसे अकाल या सूखा यहां के लिए नया नहीं है और न ही जल संकट. किसानों की नजर फिलहाल सुकाल या बारिश की तरफ लगी है. बारिश में भी देरी हो रही है और राहत में भी.

बाड़मेर जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर बायतु पंचायत में हालात चिंताजनक लगे. इसके तहत 11 गांवों की सात हजार आबादी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है. करीब 400 जानवर दम तोड़ चुके हैं.पशुपालक गहने गिरवी रख अपने पशुओं को बचाने की जंग लड़ रहे हैं. कई लोग पशुओं के साथ पलायन कर चुके हैं. पानी का इंतजाम करते करते महिलाएं बेहाल हैं.

किसान नेता खेताराम चौधरी कहते हैं कि किसी सरकारी मुलाजिम ने न गांव की खबर ली, न पशुधन बचाने का इंतजाम हुआ. अफसरों का दरवाजा खटखटाने के बाद बड़ी मुश्किल से टैंकर से पानी आया लेकिन वह ऊंट के मुंह में जीरा है. पहले अप्रैल में ही पशु कैंप लग जाते थे . चारा पानी का इंतजाम हो जाता था. लेकिन इस बार तो मांग करने पर भी नहीं लगा. पशु मिट्टी तक खाने को विवश हैं और बीमारियोँ की चपेट में हैं. किसान हीरा सिंह राजपूत बताते हैं कि पहले मनरेगा से टांके बन गए थे जिनकी बदौलत पशु जिंदा रह सके. लेकिन अब भूमाफिया की तरह जल माफिया पनप रहा है. न दाम तय है न कोई नियम.

यहां साल में एक दो बारिश होने पर बाजरा, तिलहन औऱ घासफूस उग आता है. इस बार तो बाजरा तक नहीं हुआ. इस कारण चारे का भयानक संकट है. अकाल के दिनों में हरियाणा और मध्य प्रदेश से चारा आ जाया करता था लेकिन ये राज्य खुद अकाल झेल रहे हैं. रेगिस्तान का कल्पवृक्ष खेजड़ी ही चारे का बड़ा सहारा है. मगर खेजड़ी के पेड़ पुराने हैं और उन पर चढ़ने से डालें टूट रही हैं. औरतें रोज घायल हो रही हैं. पानी की तरह चारे का इंतजाम औरतों के जिम्मे ही है.

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गांव के आसपास के पुराने जलस्त्रोत, तालाब और कुएं सूख गए हैं. जलापूर्ति के लिए बनी टंकी में आठ साल से पानी नहीं आ रहा है. गनीमत है कि खाद्य सुरक्षा के तहत बीपीएल लोगों को अनाज मिल पा रहा है. नहीं तो भुखमरी की नौबत आ चुकी थी. अकालग्रस्त गांवों में चयन प्रक्रिया को लेकर भी कई शिकायतें हैं.

बाड़मेर जिले में छोटे गांवों और ढाणियो की दशा और खराब है. फतेहगढ़ से थोड़ा पहले रेत से घिरे निवासर में 70 घर और आबादी करीब 400 है. लोग पेयजल के लिए छह किमी का सफर करने को मजबूर हैं. बाड़मेर जिला कभी अकाल का घर और अफसरों के लिए कालापानी माना जाता था. इंदिरा गांधी और नर्मदा नहर से उसकी यह पहचान टूटी . राजस्थान का यह दूसरा सबसे बड़ा जिला है. इसकी 270 किमी सीमा पाकिस्तान से लगती है. आबादी 26 लाख से अधिक है और 14 तहसीलों के तहत 2712 गांव हैं. इनमें से 2206 गांव अकाल से जूझ रहे हैं. इनको सूखाग्रस्त घोषित करने के अलावा ठोस राहत नहीं मिली है. 2015 में भी 1400 गांव अकाल से प्रभावित हुए थे. जिले में 680 गांवों में तो करीब सारी फसलें नष्ट हो चली हैं. बाड़मेर में मौसम की प्रतिकूलता और भयानक तापमान के नाते खेती और पशुपालन बहुत कठिन है.

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कभी बाड़मेर से होकर मध्य एशिया का व्यापारिक मार्ग जाता था. तब यह व्यापार का बड़ा केंद्र था. मार्ग बंद हुआ तो हालत खराब होने लगी. हाल में यहां तेल और लिगनाइट भंडार मिला तो रोजगार की नयी उम्मीदें जगी हैं. लेकिन अभी यहां की 82 फीसदी आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है. तमाम गांवों को जिला मुख्यालय तक पहुंचने के लिए 180 किमी लंबा सफर तय करना प़ड़ता है. बाड़मेर के अतिरिक्त जिलाधिकारी ओपी बिश्नोई मानते हैं कि संकट है. लेकिन जिले में 1647 प्वाइंट्स पर टैंकरो से पेयजल भेजा जा रहा है. सभी 51 गोशालाओं को अनुदान दिया गया है. लेकिन जिले में 5.50 लाख बड़े पशु हैं. अनुदान की सूची में केवल 21,961 पशु आ पाये हैं. 14 पशु शिविरों को भी मंजूरी मिली है जिसमें 28,000 पशु लाभान्वित होंगे. यहां समाज की ओर से संचालित कुछ गौशालाएं बेहतरीन काम कर रही हैं . इनमें श्रीगोपाल गौशाला, बाड़मेर प्रमुख है. 1998 में स्थापित इस गौशाला में इस समय 1115 जानवर हैं. यहां थार पार कर सिंधी नस्ल के सुधार की कोशिशें भी चल रही है. लेकिन अकाल के दिनों में पशुपालन कठिन काम है. हर परिवार के पास पशु हैं और पशुपालन ही अकाल की ढाल है. लेकिन महंगाई बढ़ रही है और पशुपालन कठिन होता जा रहा है. लोग जैसे तैसे पशुपालन कर रहे हैं.

खुद बाड़मेर जिला मुख्यालय तक में जल संकट है. कई मोहल्लों में सप्ताह में एक बार पानी आता है. पानी कब आएगा इसका दिन और समय निश्चित नहीं है. पानी सप्लाई महज पंद्रह मिनट से आधा घंटे तक होती है और कम प्रेशर की समस्या अलग है. इस नाते तमाम लोग निजी टैंकरों से पानी मंगवाने को विवश हैं. जलापूर्ति के अभाव में अधिकांश घरों में टांके खाली पड़े हैं.

मरुभूमि में पेयजल की समस्या सदियों पुरानी है. पानी न सिर्फ खारा है बल्कि उसमें फ्लोराइड भी अधिक है. इस बार अकाल में कई इलाके परेशान हैं. जिला प्रशासन का कहना है कि यहाँ ढाणियां छितरी बसी हैं और व्यवस्थित गांव कम हैं. जहां तक संभव है टैंकरों से पानी भेजा जा रहा है. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है संचार और दूरी की. कई इलाकों में न मोबाइल नेटवर्क है न सड़क. प्रधानमंत्री सड़क योजना से तमाम गांव जुड़े लेकिन ढाणियों तक यह योजना नहीं पहुंच पायी है.