अस्थिरता की ओर नेपाल

K-P-Sharma-Oliनेपाल में ओली सरकार वित्त विधेयक और दो अन्य बिलों को संसद में पास नहीं करा पाई. इससे साबित हो गया कि वह अपना बहुमत खो चुकी है. वैसे जब नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और संसद में सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस ने समर्थन वापस लेने का एलान किया, तो उसके बाद इसमें कोई शक नहीं बचा था. इसके बावजूद प्रधानमंत्री ओली ने न तो तब इस्तीफा दिया, न ही तीन विधेयकों के गिर जाने के बाद. इसके विपरीत उन्होंने माओवादी पार्टी और नेपाली कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव का इंतजार किया. अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में चर्चा शुरू हो चुकी है . उसके बाद मतदान होने पर ओली सरकार का  गिरना क़रीब क़रीब तय है. समर्थन वापसी की घोषणा से पहले माओवादी नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस और मधेसी पार्टियों के मोर्चे को अपने पक्ष में कर लिया. इससे 598 सदस्यीय सदन में उनके पक्ष में 352 सांसद हो गए (नेपाली संसद 600 सदस्यों की है, लेकिन अभी दो स्थान खाली हैं).

फिर भी ओली इस्तीफा न देने पर अड़े हुए हैं ? दरअसल, इसके पीछे उनकी एक गणना है. उनके समर्थक नेपाली संविधान के अनुच्छेद 298 का हवाला दे रहे हैं. अनुच्छेद में कहा गया है कि “संविधान लागू होने के समय मौजूद मंत्रिपरिषद तब तक सत्ता में रहेगी, जब तक परिवर्तित विधायिका (संसद) एक नई मंत्रिपरिषद का गठन नहीं कर लेती.” ओली समर्थकों के मुताबिक इस भाषा से साफ है कि वर्तमान संसद में सिर्फ एक सरकार ही बन सकती थी. यानी अगर उस सरकार ने बहुमत खोया तो फिर नए चुनाव कराने होंगे.

यानी ओली और उनकी पार्टी नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) दावा है कि अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार के पराजित होने के बाद नए चुनाव होने तक वर्तमान सरकार कार्यवाहक भूमिका में कायम रहेगी. तब तक ओली कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे.अगर ओली अपनी व्याख्या पर अड़े रहे और अविश्वास प्रस्ताव पर हारने के बावजूद इस्तीफा नहीं दिया तो अगले हफ्ते नेपाल में गहरा संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है. तब संसद का बहुमत प्रचंड के नई सरकार बनाने के दावे के साथ होगा. क्या वैसे टकराव की स्थिति में नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ओली को बर्खास्त करेंगी? अनुमान है कि यूएमएल पार्टी बर्खास्तगी जैसे फैसले का कड़ा विरोध करेगी. अंदाजा लगाया जा सकता है कि नेपाल  नई राजनीतिक अस्थिरता एवं अशांति की तरफ बढ़ रहा है.

उल्लेखनीय है कि मधेसियों की समस्याओं का हल अब तक नहीं ढूंढा जा सका है. नेपाल में नया संविधान पिछले सितंबर में लागू हुआ था. मधेसी उससे खफा हुए. उनकी शिकायत है कि संविधान के तहत उन्हें आबादी के अनुपात में राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. इससे उनका सियासी रसूख घटा है. फिलहाल मधेसी प्रचंड के साथ हैँ. प्रचंड ने प्रगतिशील राष्ट्रवाद का नारा उछाल कर मधेसियों और जन-जातियों को अपने साथ करने की कोशिश की है. कुछ समय पहले उन्होंने कहा था कि ओली सरकार बहुमत वाली सरकार है, जबकि जिस संकट में देश है उसे हल करने के लिए सर्व-सहमति वाली राष्ट्रीय सरकार चाहिए. प्रचंड ने कहा- हमारी पार्टी महसूस करती है कि नए संविधन को लागू करने, बाकी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने, मधेसी, जनजातियों और थारू समुदाय के मुद्दों का हल निकालने के लिए राष्ट्रीय सहमति की सरकार बने.

Pushpa-Kamal-Dahal,-Prachanda,-Nepalलेकिन नेपाल में ऐसी कोई सर्व-सहमति नहीं है. उलटे केपी शर्मा ओली ने अपने विरोधियों पर नेपाल की स्थिरता के खिलाफ साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया है. उन्होंने इसके पीछे भारत का हाथ होने का इल्जाम भी मढ़ा. विडंबना है कि ओली को एक समय भारत समर्थक माना जाता था, आज वे भारत पर ऐसा आरोप लगा रहे हैं और जिन प्रचंड को कभी चीन समर्थक माना जाता था, उन पर ऐसा आरोप लगा है. चर्चा है कि सियासी चाल चलने के पहले प्रचंड ने भारत को भरोसे में लिया. शुक्रवार को अविश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए उन्होंने कहा कि नेपाल की विदेश नीति गतिशील एवं प्रगतिशील होनी चाहिए तथा उसे पड़ोसी देशों से संतुलन बनाना चाहिए. इसे ओली की आलोचना माना गया, क्योंकि आम धारणा है कि उनकी सरकार नेपाल की विदेश नीति को चीन के अधिक करीब ले गई है.

यहां याद करना वाजिब होगा कि प्रचंड जब पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे, तब उनकी नीति चीन के पक्ष में झुकी मानी गई थी. इससे भारत-नेपाल संबंधों में तनाव पैदा हुआ था. लेकिन अब कहा जा रहा है कि उनके रुख से चीन खासा चिंतित है, जिसने गुजरे एक साल में नेपाल में पैठ काफी बढ़ाई है.

फिलहाल यह साफ है कि राजशाही खत्म होने के बाद से नेपाल में लगातार जारी संकट अब नए मुकाम पर है. देश नई अस्थिरता के कगार पर है. यह भारत के लिए खास चिंता का विषय होना चाहिए. नेपाल में जब भी अस्थिरता या आंतरिक संकट होता है, वहां की कुछ सियासी ताकतें भारत विरोधी माहौल बना कर  समर्थन बढ़ाने की कोशिश करती हैं. ऐसा फिर हो सकता है. मगर मौजूदा हालात में भारत कुछ करने की स्थिति में है, ऐसा नहीं लगता. बल्कि उसे सीधे दखल की कोशिश करनी भी नहीं चाहिए. भारत के लिहाज से अच्छी बात है कि वहां की दो बड़ी ताकतें- नेपाली कांग्रेस और माओवादी फिलहाल उसके हक में झुके दिखते हैँ. भारतीय दखल से उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है. इसलिए बेहतर नीति यही होगी कि नेपाल के दलों को अपनी समस्या खुद हल करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाए.