बदल रहा है अफ़्रीका

Akhilesh Suman

Ernest-Rwamucyo-Rwanda

High Commissioner of Rwanda to India, Ernest Rwamucyo

अफ़्रीका को लेकर भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक पहल करते हुए 26 से 29 अक्टूबर, 2015 तक दिल्ली में इंडिया अफ़्रीका फ़ोरम समिट का आयोजन किया है. इसका पहला समिट 2008 और दूसरा समिट 2011 में हुआ था. लेकिन इस समिट की खासियत यह है कि इसमें पहली बार अफ़्रीका के सभी 54 देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकारों के प्रमुखों को आमंत्रित किया गया है. इसके अलावा इस सम्मेलन में सभी अफ़्रीकी देशों के विदेश मंत्री और वाणिज्य मंत्रियों को भी अलग से बुलाया गया है.

वैसे तो अफ़्रीका का नाम आते ही अक्सर लोगों के मन में गरीबी, भुखमरी और हिंसा की तस्वीरें घुमड़ने लगती हैं. लेकिन यह आधुनिक अफ्रीका की सूरत नहीं है. अब अफ़्रीका बदल रहा है और इसी बदलते अफ़्रीका के साथ भारत को जोड़ने के लिए ही इस शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया है.

54 देशों वाला महाद्वीप अफ़्रीका, भारत के क्षेत्रफ़ल से नौ गुना बड़ा और भारत की समुद्री सीमा से सीधे लगा हुआ है. एक तरफ़ अफ़्रीका पश्चिमी एशिया से जुड़ता है, वहीं यह यूरोप को भी छूता है. महाद्वीप के एक तरफ़ दक्षिण अफ़्रीका है तो दूसरी तरफ़ सोमालिया, तीसरी तरफ़ मिस्र, लीबिया और अल्जीरिया, चौथी तरफ़ मोरक्को है, जहां से घूमते हुए हम अंगोला और नामीबिया होते हुए दक्षिण अफ़्रिका आ जाते हैं. इस महाद्वीप में जंगल हैं, तो रेगिस्तान भी. साथ ही यह खनिज से भरपूर है.

आज के अफ़्रीका की एक और पहचान है उसकी युवा शक्ति. औसत उम्र के लिहाज से यह महाद्वीप भारत से भी अधिक नौजवान है और यहां की मध्य आयु है मात्र 19 साल जबकि भारत की मध्य आयु 27 साल है.

अफ़्रीका की ये खासियत ही एक समय उनकी परेशानी का कारण बना था. यूरोपीय देशों ने अफ्रीका के ज्यादातर देशों को उपनिवेश बना कर उनका आत्म-विश्वास तोड़ डाला था. लंबे समय तक वहां के लोग अपने मामलों में भी यूरोप पर निर्भर रहे. इस दौर ने उन्हें अपनी संस्कृति से अलग किया. समाज में फ़ूट पड़ी जिस वजह से हिंसा और प्रति-हिंसा अफ्रीकी जिंदगी का हिस्सा बन गई.

1960 से 1990 के बीच अफ़्रीकी देश आज़ाद हुए. लेकिन अफ़्रीका की ज़मीन और उससे संसाधनों पर कब्जा बनाए रखने के लिए अफ़्रीकियों को आपसी लड़ाई में फ़ंसाए रखने की चालें चली जाती रहीं. लेकिन वो बुरा दौर भी चला गया.

Andre-Sanra-Benin

Ambassador of Ghana to India, Andre Sanra Benin

रवांडा को ही ले लीजिए. हुतु और तुत्सी समुदायों की लड़ाई में 1994 में तीन महीनों के अंदर 10 लाख लोगों की हत्या हुई. अनुमानों के मुताबिक दो लाख लोगों ने कत्लेआम में शिरकत की. लेकिन उसके बाद जिस तरह रुवांडा ने खुद को संभाला वह अफ़्रीका के नवजागरण की मिसाल है. उन्होंने पश्चिमी अदालतों में जाने की बजाय सामाजिक अदालते लगाईं जिसे गचाचा कहा जाता है. गांव-गांव में स्थानीय लोगों की इस तरह की अदालतें वहां लगाई गईं. लोगों ने अपने जुर्म कबूल किए… और एक साल के अंदर पूरा समाज फ़िर से साथ रहने को तैयार हो गया. आम कानूनी अदालतें लगतीं तो मामलों का निपटारा करने में 100 साल लग जाते. भारत में रवांडा के राजदूत अर्नेस्ट गोमूचो कहते हैं कि आज रुवांडा में बच्चे पढ़ रहे हैं. उन्हें मुफ़्त लैपटॉप दिया जा रहा है. पुराने लड़ाकों को पुनरुत्थान के काम में लगाया गया है.

ऐसी ही कहानी अफ़्रीका के तकरीबन सभी देशों की है. ये देश तेजी से अपनी शक्ल बदल रहे है. भ्रष्टाचार और सियासी दांव-पेंच वहां भी हैं लेकिन वे भी भारत की तरह उबरने की कोशिशों में हैं, और यह सब कुछ हो रहा है लोकतंत्र के दायरे में. मसलन, बेनीन को ही लीजिए. इसकी राजधानी पोर्टो नोवा ऊपरी तौर पर भारत के ही किसी शहर जैसा दिखता है. 1 अगस्त 1960 को यह आज़ाद हुआ. अफ़्रीका में सबसे पहले आजाद होने वाले देशों में यह एक था. आजादी के बाद तीस साल तक यह गृह युद्ध में फ़ंसा रहा. लेकिन बेनिन के राजदूत का कहना है कि पिछले 25 साल से यहां स्थिर लोकतंत्र है.

अब अफ़्रीकी लोग अपने-अपने देशों का पुनर्निर्माण कर रहे हैं. अफ़्रीकी आवाम ने इतिहास से काफी कुछ सीखा है. उन्होंने जाना है कि आज की दुनिया में तरक्की करनी है तो आपस में सहयोग जरूरी है. उन्होंने आसियान जैसा अपना एक खास मॉडल बनाया है.

आसियान की तरह अफ़्रीकन यूनियन इस महाद्वीप के सभी देशों को जोड़ने वाली संस्था के रूप में सामने आई है. इसके ज़रिए ये देश एक समूह के रूप में दुनिया से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं. इसके माध्यम से जहां वे शांति के लिए सामूहिक हस्तक्षेप करते हैं, वहीं विकास के लिए मिलने वाली सहायता का भी संचालन करते हैं.

अफ़्रीकन यूनियन के अलावा इन देशों ने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग संगठन भी बनाए हैं. इससे वे दुनिया की बड़ी ताकतों से सामूहिक तालमेल बनाने में कामयाब हुए हैं.

राजीव भाटिया, दीपक वोरा, एच एच एस विश्व्नाथन और विरेन्द्र गुप्ता जैसे अनेक भारतीय राजदूतों ने अफ़्रीका में अपनी सेवाएं दी हैं. उन सभी का कहना है कि उपनिवेशवाद का दर्द भारत ने भी झेला है, लेकिन अफ्रीका की कहानी कहीं ज्यादा दर्दनाक है. वे अफ़्रीका के नक्शे का हवाला देते हैं कि 1885 में प्रशा यानी जर्मनी के तत्कालीन प्रधानमंत्री बिस्मार्क की पहल पर हुई बर्लिन कांफ़्रेंस में 16 यूरोपीय देशों के राजनयिकों के साथ एक टेबल पर बैठ कर पेंसिल से अफ़्रीकी देशों की सरहद खींच दी गई. उनकी जनसंख्या और विभिन्नताओं का ख्याल बिलकुल नहीं किया. ऐसी औपनिवेशिक नीतियों के कारण अफ़्रीका में लंबे अरसे तक कबीलाई लड़ाइयां चलीं. अब इस महाद्वीप के लोग विविधता में एकता का सबक ले चुके हैं. एक-दूसरे से झगड़ने के बजाय वे अब मिलजुल कर टकराव का हल ढूंढने में लगे हैं. वे तो सीमाओं को फ़िर बदलने की बजाय यथास्थिति को मानकर नए सिरे से अपने अपने देश के विकास में ध्यान लगाना चाहते हैं.

अब महाद्वीप में राजनीतिक स्थिरता है तो अफ़्रीकी देशों ने दुनिया भर के देशों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं. उन्हें वे अपने विकास में सहभागी बना रहे हैं. विदेशी फ़ंड भी किस देश में कितना और किस क्षेत्र में खर्च होगा, इसे वे सामूहिक रूप से तय करते हैं. अफ़्रीकी देशों ने अब शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जैसे मूलभूत क्षेत्रों पर ध्यान दिया है. वहां भारी निवेश हो रहा है. भारत भी अफ़्रीका के इस विकास यात्रा का सहभागी बनना चाहता है.