बर्नी सैंडर्स की विरासत और हिलेरी क्लिंटन

Philadelphia : President Barack Obama and Democratic Presidential candidate Hillary Clinton wave together during the third day of the Democratic National Convention in Philadelphia , Wednesday, July 27, 2016. AP/PTI

Philadelphia : President Barack Obama and Democratic Presidential candidate Hillary Clinton wave together during the third day of the Democratic National Convention in Philadelphia , Wednesday, July 27, 2016. AP/PTI

हिलेरी क्लिंटन ने, अगर उन्हीं के शब्दों में कहें तो, एक “ग्लास सीलिंग” तोड़ दी है. अगले आठ नवंबर को अमेरिकी मतदाताओं का जरूरी समर्थन वे जुटा पाईं तो संभवतः सबसे बड़ी “ग्लास सीलिंग” को ध्वस्त करने में भी वे सफल होंगी. शब्दकोश में देखें तो “ग्लास सीलिंग” मुहावरे से तात्पर्य उन अदृश्य बाधाओं से है, जो महिलाओं को एक खास स्तर से अधिक ऊंचा उठने से रोके रखती हैं. अमेरिका की राष्ट्रपति बनने का मतलब दुनिया की सबसे ताकतवर इनसान होना है. इस मंजिल से हिलेरी क्लिंटन अब सिर्फ एक छलांग दूर हैँ. इसे वे लगा पाईं, तो अमेरिका में सामाजिक प्रगति के लिहाज से 2016 का राष्ट्रपति चुनाव 2008 की तरह ही ऐतिहासिक महत्त्व का हो जाएगा. 2008 में काली त्वचा का पहला व्यक्ति ह्वाइट हाउस पहुंचा था. उस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी की होड़ बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के बीच हुई थी. तब दोनों में जो जीतता, वह उसकी सफलता का मानव इतिहास में एक मील का पत्थर बनना तय था.

इस बार बात वैसी तो नहीं थी, मगर हिलेरी क्लिंटन के मुकाबले एक ऐसा दावेदार उभरा, जिसने अपने ढंग से अमेरिकी राजनीति को प्रभावित किया है. उल्लेखनीय है कि तकरीबन सौ साल बाद एक ऐसा नेता राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की होड़ में शामिल हुआ, तो जो अपने को घोषित तौर पर सोशलिस्ट कहता है. वरमॉन्ट राज्य से सीनेटर बर्नी सैंडर्स जब इस दौड़ में उतरे, तब उन्हें किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था. मगर आर्थिक गैर-बराबरी, वित्तीय पूंजीवाद के नियंत्रण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर उनके प्रगतिशील एजेंडे ने ऐसा समां बांधा कि उन्होंने हिलेरी क्लिंटन को तगड़ी टक्कर दी. हिलेरी को धीरे-धीरे उनके मुद्दों को अपनाने के लिए विवश होना पडा. मसलन, जब से ट्रांस-पैसिफिक व्यापार समझौता की चर्चा शुरू हुई थी, हिलेरी उसकी समर्थक थीं. सैंडर्स इसके विरोध रहे हैं. उन्हें मिले भारी जन-समर्थन को देखते हुए हिरेली ने सुर बदला. अब वे इस करार की विरोधी हैं. इसी तरह मुफ्त कॉलेज शिक्षा के सैंडर्स के एजेंडे को उन्होंने अपनाया है.

इसके बावजूद यह छवि बरकरार है कि हिलेरी क्लिंटन व्यवस्था (ऐस्टैबलिशमेंट) की उम्मीदवार हैं. वे आज भले खुद को वाम एजेंडे के साथ दिखाने की कोशिश करें, लेकिन बहुत से लोग इस पर यकीन करने को तैयार नहीं हैं. खासकर 1990 के बाद जन्मी वो पीढ़ी, जिसने 74 वर्षीय बर्नी सैंडर्स को अपना आदर्श माना और हजारों की संख्या में ‘बर्नी आर्मी’ में शामिल हुए. हिलेरी क्लिंटन के प्रति अविश्वास का ही परिणाम है कि ‘बर्नी आर्मी’ के एक हिस्से ने ‘बर्नी ऑर बस्ट’ का नारा उछाला. यानी या तो बर्नी सैंडर्स उम्मीदवार हों, वरना वे या तो मतदान नहीं करेंगे अथवा वे किसी अन्य उम्मीदवार को वोट डालेंगे. इस तबके के असंतुष्ट सुर फिलाडेल्फिया में हुए डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में भी सुनाई पड़े, जहां पार्टी ने औपचारिक रूप से हिलेरी क्लिंटन को अपना उम्मीदवार चुना.

‘बर्नी ऑर बस्ट’ खेमे के पास ऐसे एक विकल्प के रूप में ग्रीन पार्टी की उम्मीदवार जिल स्टीन हैं. जिल चरम वाम एजेंडे के साथ राष्ट्रपति चुनाव के मैदान में उतरने को तैयार हैं. ये आशंका गहरी है कि जिल स्टीन कुछ वैसी ही हानिकारक भूमिका निभा सकती हैं, जैसा साल 2000 में राल्फ नैडर ने अदा की थी. उपभोक्ता अधिकारों के लिए अपने संघर्ष के लिए मशहूर नैडर तब ग्रीन पार्टी के उम्मीदवार थे. उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर तकरीबन तीन प्रतिशत वोट हासिल किए. यह डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एल गोर की हार का कारण बना.

बर्नी सैंडर्स की विशेषता है कि उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर रहते हुए संघर्ष किया. अपने मुद्दों के लिए जन समर्थन जुटाया. इससे हिलेरी क्लिंटन पर लेफ्ट मुद्दों को अपनाने के लिए दबाव बढ़ा. बाद में सैंडर्स के समर्थकों को लेकर एक कमेटी बनी, जिसने राष्ट्रपति चुनाव के लिए पार्टी प्लैटफॉर्म (चुनाव घोषणापत्र) तय किया है. परिणास्वरूप डेमोक्रेटिक पार्टी आज अधिक वाम रूझान वाली लगती है. हिलेरी क्लिंटन अब जीतेंगी तो उन्हें इसी एजेंडे के साथ काम करना होगा. दूसरी तरफ नैडर के चरमपंथी रुख से जॉर्ज बुश जूनियर के राष्ट्रपति बनने का रास्ता साफ हुआ था, जिसके दुष्परिणामों से दुनिया अब परिचित है. स्टीन और ‘बर्नी ऑर बस्ट’ खेमे के वैसे ही रुख का नतीजा डोनाल्ड ट्रंप की जीत के रूप में सामने आ सकता है. ट्रंप का जो अवसरवादी, गैर-जिम्मेदार और पूर्वाग्रहों को भड़काने वाला चेहरा सामने है, उससे खुद जाहिर है कि उनके ह्वाइट हाउस पहुंचने के क्या खतरे हैँ.

क्या हिलेरी क्लिंटन इस खतरे से अपने देश और बाकी दुनिया को बचा पाएंगी? इस सवाल का उत्तर इस पर निर्भर करता है कि वे किस हद तक ‘बर्नी ऑर बस्ट’ खेमे का विश्वास जीत पाती हैं. बर्नी सैंडर्स ने उनका खुला समर्थन किया है, इससे उनकी चुनौती कुछ आसान हुई है. लेकिन फिलाडेल्फिया सम्मेलन में जैसे नजारे देखने को मिले, उससे साफ है कि इसके एक बड़े हिस्से का भरोसा अभी उनमें नहीं है. यह खेमा राजनीति एवं सत्ता की परंपरागत कार्यशैली में बदलाव चाहता है. वह चाहता है कि वॉशिंगटन स्थित सरकार एक प्रतिशत धनी लोगों के हित में नहीं, बल्कि 99 फीसदी आम लोगों के लिए में काम करे. हिलेरी क्लिंटन के सामने चुनौती यह भरोसा बंधाने की है कि राष्ट्रपति के रूप में वे इस भावना के अनुरूप काम करेंगी.

इस पूरे घटनाक्रम का संदेश यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी और मोटे तौर पर पूरे अमेरिका की राजनीति के चरित्र में भारी बदलाव आया है. मध्यमार्गी राजनीति के दिन फिलहाल लद गए हैँ. गोलबंदी वाम और दक्षिणपंथी धुरियों पर है. बर्नी सैंडर्स वाम झुकाव के प्रतीक बने हैं. इस रूप में उन्होंने 2016 के चुनाव पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है. इसीलिए अगर हिलेरी क्लिंटन जीतीं तो “ग्लास सीलिंग” टूटने के लिहाज से वह ऐतिहासिक और अति महत्त्वपूर्ण घटना होगी, लेकिन इतिहास में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव की कथा बर्नी सैंडर्स की चर्चा के बिना अधूरी रहेगी.