बस देखन में छोटन लागे (भारत की परमाणु यात्रा)

Sandeep Yash
File photo: Nuclear Power Plant

File photo: Nuclear Power Plant

नमस्कार, 15 अगस्त यानी हमारा 74वां स्वतंत्रता दिवस निकट है।  इस मौके पर हम कुछ चुनींदा विषयों पर बात कर रहे है। आज चर्चा होगी स्वतंत्र भारत में परमाणु ऊर्जा की यात्रा की और कैसे इसने हमें दुनिया में अनूठी ऊचाईयां दी है। 1947 में भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में दुनिया के नक़्शे पर उभरा। तबसे परमाणु विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हमारी सरकारों की प्राथमिकता रहा है। आइये देखते हैं इस सफर में आये कुछ एहम मुकाम को।

– मार्च 12, 1944 : सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को एक पत्र लिख कर डॉ होमी जहांगीर भाभा परमाणु अनुसन्धान शुरू करने का निवेदन करते हैं

– 1945 : टाटा ट्रस्ट इस काम के लिए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) बनाती है। डॉ भाभा इसके अध्यक्ष बनते हैं।

– 1948 – आज़ादी के तुरंत बाद संविधान सभा Indian Atomic Energy Act पारित करती है।  डॉ भाभा की कमान में परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) बनता है

–   जुलाई 29, 1949 :  Rare Minerals Survey Unit की स्थापना होती है। इसका काम देश में uranium, thorium, zirconium खोजना था। जुलाई, 1998 में इसका नाम बदल कर Atomic Minerals Directorate for Exploration and Research हो जाता है

50 का दशक

– सनद रहे कि भारत इसी दौर में अमेरिका की बारूक योजना का पुरज़ोर विरोध करता है – ये योजना परमाणु ऊर्जा के अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण की पक्षधर थी।

–   1951: भारत में यूरेनियम की पहली खान जादुगुडा में खोजी जाती है।

– 1954: Department of Atomic Energy (DAE) की स्थापना होती है। इसी बरस, 3 जनवरी को BARC, मुंबई अस्तित्व में आता है

आपकी जानकारी के लिए भारत में 1947- 48 में बिजली उत्पादन सिर्फ 4.1 अरब kWh था । सो 50 के दशक में ऊर्जा उत्पादन सरकार की प्राथमिकता रही। इसकी झलक अगस्त, 1955 में जिनेवा में हुई प्रथम International Conference on the Peaceful Uses of Atomic Energy में डॉ भाभा के भाषण में मिलती है जिसमे उन्होंने सभ्यता के विकास को ऊर्जा स्त्रोतों से जोड़ा था। इसी दौरान हुई एक स्टडी में सामने आया था कि देश के भविष्य की ज़मीन परमाणु ऊर्जा पर ही सुनिश्चित की जा सकती है।

–  नतीजतन, अनुसंधान और परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने का काम तेज़ हो गया था।

– डॉ भाभा ने परमाणु विकास कार्यक्रम को तीन चरणों में बांटा था –
1 .  Development of Pressurized Heavy Water Reactors
2 .  Development of Fast Breeder Reactor
3 . Exploitation of vast local thorium resources to address long-term energy needs

– 4 अगस्त, 1956 : एशिया का पहला शोध रिएक्टर APSARA, ट्रॉम्बे, मुंबई में शुरू होता है।  ये 1 MWt का था।

– 1957: Atomic Energy Establishment, Trombay की स्थापना होती है। 1967 में इसे भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) का नाम दिया जाता है।

– 30  जनवरी, 1959 : ट्रॉम्बे में पहली बार लो ग्रेड यूरेनियम का उत्पादन होता है

60 का दशक

– 1960:  40 MW CIRUS रिएक्टर सक्रिय होता है।  ये रिएक्टर  कनाडा से आया था और इसमें Heavy water की आपूर्ति अमेरिका ने की थी।

– 1962 : Atomic Energy Act बनता है

– .1963: तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र को enriched fuel देने के लिए अमेरिका -भारत समझौता होता है। इसी बरस एक और घटना घटती है – Partial Test Ban Treaty वजूद में आती है। इसका मक़सद परमाणु परीक्षणों को भूमिगत या कहें तो ज़मीन के अंदर तक सीमित करना था। परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के हिमायती भारत ने इस संधि का स्वागत किया था।

–  “Peaceful nuclear explosions” (PNEs) के पैरोकार डॉ भाभा अमेरिका जाकर सहयोग मांगते हैं। अमेरिका इंकार कर देता है।

– 1967: जादुगुड़ा, झारखण्ड में Uranium Corporation of India Limited बनाया जाता है और एक यूरेनियम मिल भी।
लगाई जाती है।

– 1968: भारत परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non -proliferation Treaty) को पक्षपातपूर्ण मानते हुए ख़ारिज कर देता है।  इसी बरस DAE के तहत
हैदराबाद में Nuclear Fuel Complex स्थापित किया जाता है।   .

तो इस दशक तक भारत में दो रिसर्च रिएक्टर और 4 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर्स थे।  ये वो दौर था जब भारत, चीन से पराजित होने के बावजूद परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के सिद्धांत से तत्काल तो नहीं हटा था। पर डॉ भाभा ने ”निवारक” के तौर पर परमाणु बम कार्यक्रम पर तवज्जो देने की वकालत ज़रूर की थी। फिलहाल अब तक हमारी संस्थाओं – AEC और DAE को अंतराष्ट्रीय सहयोग मिल रहा था।

70  का दशक

– सितम्बर,1970 : देश में पहली बार थोरियम से यूरेनियम 233 अलग करने में सफलता हासिल होती है।

– 1971 : भारत -पाक युद्ध होता है। अमेरिका, चीन पाक के पक्ष में खड़े होते हैं। पर भारत की विराट जीत होती है और परमाणु नीति पर सोच बदलती है।

– सितंबर 1972: प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र का दौरा करने के बाद आधिकारिक तौर पर परमाणु परीक्षण को मंजूरी देती हैं।

May 18, 1974: हमारी परमाणु यात्रा नए युग में प्रवेश करती है। पोखरण (राजस्थान) में शांतिपूर्ण भूमिगत परमाणु प्रयोग होता है।  इस प्रयोग के वास्तुकार प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ राजा रमन्ना और उनकी 75 वैज्ञानिकों की टीम थी। इस प्रयोग में ट्रॉम्बे के CIRUS रिएक्टर की केंद्रीय भूमिका थी। विशेषज्ञों के मुताबिक़ भारत का ये फैसला पश्चिमी देशों के अनुचित हस्तक्षेप और अपमानजनक रवैय्ये का जवाब था।

– इस टेस्ट के तुरंत बाद पश्चिमी देश भारत पर परमाणु हथियारों के प्रसार का आरोप लगाते हुए सभी वित्तीय और तकनीकी मदद रोक देते हैं। इसमें परमाणु ऊर्जा के उत्पादन से जुडी सामग्री भी शामिल थी।

– इसी टेस्ट के बाद पश्चिमी परमाणु शक्तियों ने Nuclear Supplier Group (NSG) बनाया था जिसका मक़सद परमाणु तकनीक और संसाधन के प्रसार पर अंकुश लगाना था।

–  1977 : पर सारे प्रतिबंधों और मुश्किल हालातों में भी भारत का परमाणु कार्यक्रम अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ता जाता है।  इसी बरस ट्रॉम्बे में सबसे बड़ा
परमाणु संयंत्र- ध्रुव रिएक्टर बनता है।

80  का दौर

-1982: फ्रांस, तारापुर रिएक्टर्स को ईधन (low-enriched uranium) देने को तैयार हो जाता है।  ये सप्लाई पहले अमेरिका से आती थी

– October 18, 1985: कलपक्कम में Fast Breeder Test Reactor (FBTR) काम शुरू कर देता है

– 1987 : Nuclear Power Corporation of India Limited की स्थापना होती है। भारत अब यूरेनियम को किसी भी वांछित स्तर तक enrich करने की
क्षमता पैदा कर चुका था।

– 1988: भारत -पाक के बीच एक दूसरे के परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला न करने का समझौता होता है। इसी बरस कुडनकुलम में रूस- दो 1,000 मेगावाट  रिएक्टर बनाने पर सहमत हो जाता है।

– March 12, 1989: Narora Atomic Power Station में उत्पादन शुरू होता है।

90  का दौर

–  दिसंबर 1990: अमेरिका,  भारत को सुपर कंप्यूटर निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे देता है।

-1991: भारतीय नौसेना -परमाणु संचालित पनडुब्बी परियोजना पर काम शुरू करती है।

– जून 1994: IAEA के सुरक्षा मानकों के तहत भारत पहली बार (व्यावसायिक तौर पर) दक्षिण कोरिया को 100 टन heavy water एक्सपोर्ट करता है।

– जनवरी 1995: झारखंड में नरवापार यूरेनियम खदान में काम शुरू होता है।

– 1996 : Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty (CTBT) की बात होती है।  इसका लक्ष्य सभी परमाणु अस्त्र के प्रयोगो /  विस्फोटों पर प्रतिबन्ध लगाना था। इसे लागु करने के लिए 44 देशों के हस्ताक्षर ज़रूरी थे। भारत ने इसकी शर्तों को ख़ारिज कर दिया था।

– May 11, 13, 1998 : पोखरण रेंज, राजस्थान में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए जाते हैं। इसमें fission और fusion devices शामिल थे।  इस टेस्ट को ”ऑपरेशन शक्ति” नाम दिया जाता है। परीक्षण की सफलता के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि ”अब भारत एक समर्थ परमाणु शक्ति बन चुका है”

– 1998 : इन परीक्षणों के बाद अमेरिका सहित पश्चिमी देश फिर से भारत पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाते हैं। रूस भारत का साथ देता है।

– नवंबर 1998: भारत संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव पेश कर एक ऐसी संचार व्यवस्था की वकालत करता है जो परमाणु अस्त्रों को गलती से चलने पर रोके।

–  नवंबर 1998: अमेरिका – परमाणु या मिसाइल गतिविधियों में शामिल भारत के सरकारी, अर्धसैनिक और निजी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाता है।

– दिसंबर 1998: प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संसद में भारत के परमाणु सिद्धांत को परिभाषित करते है – ये दो तत्वों पर केंद्रित था।
1 . A small but credible deterrent
2. No-first-use policy.

– 1999: अमेरिका, भारत के खिलाफ लगे प्रतिबंधों को हटाना शुरू करता है।

सन  2000 का दशक

– May 2001 : अमरीका और NSG के सदस्यों के विरोध के बावजूद रूस, तारापुर संयंत्र के लिए परमाणु ईंधन भेजता है।

– दिसंबर 2001: भारत और अमेरिका -सैन्य सहयोग फिर शुरू होता है।

– नवंबर 2002: U.S.-India High Technology Cooperation Group बनता है।

– दिसंबर 2002: भारत, परमाणु ऊर्जा उत्पादन में यूरेनियम के विकल्प के रूप में थोरियम को आगे बढ़ने के लिए कार्यक्रम शुरू करता है

– जनवरी 2003: परमाणु और सामरिक बलों के प्रबंधन के लिए देश में Strategic Forces Command (SFC) की स्थापना होती है।

– जनवरी, 2003  भारत अपने आठ-सूत्री परमाणु सिद्धांत (Nnuclear Doctrine.) को दुनिया के सामने रखता है
1) नो-फर्स्ट-यूज़ पोस्चर (No -First -Use Posture)
2) परमाणु कमान प्राधिकरण के तहत जवाबी हमले का अधिकार सिर्फ नागरिक राजनीतिक नेतृत्व को
3) एक भरोसेमंद न्यूनतम निवारक का निर्माण और रखरखाव
4) गैर -परमाणु देशों के खिलाफ परमाणु हथियारों का उपयोग नहीं
5) रासायनिक और जैविक हमलों के खिलाफ परमाणु हथियार एक ठोस विकल्प
6) निर्यात पर सख्त नियंत्रण
7) Fissile Material Cut-off Treaty (FMCT) में भागीदारी
8) परमाणु परीक्षण के अधिकार को अक्षुण रखना

– अप्रैल 2005: भारत पहली बार Convention on Nuclear Safety (CNS)  की समीक्षा बैठक में भाग लेता है और नतीजों पर मोहर लगाता है।

– May 2005: U.N.Security Council Resolution 1540 के प्रस्तावों के मुताबिक़ भारत Weapons of Mass Destruction and Their Delivery
Systems Bill पास करता है

– अगस्त 2005: भारत और पाकिस्तान परमाणु दुर्घटना के जोखिम को कम करने के लिए हॉटलाइन स्थापित करने पर सहमत होते हैं।

– सितंबर 2005: फ्रांस, भारत के साथ अंतरराष्ट्रीय असैन्य परमाणु सहयोग की ज़रुरत पर बल देता है।

– फरवरी 2006: DAE सचिव अनिल कोकोडकर देश की रणनीतिक ज़रूरतों के मद्देनज़र Dhruva and CIRUS units को IAEA के दायरे से बाहर रखने की वकालत करते हैं।

– दिसंबर 2006: अमेरिका-भारत शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सहयोग अधिनियम पर हस्ताक्षर होते हैं।  ये दोनों देशों के बीच सिविल परमाणु प्रौद्योगिकी साझा
करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

– अगस्त 2008: IAEA और भारत के बीच Agreement for the Application of Safeguards to Civilian Nuclear Facilities पर समझौता होता है।

– 2010 : देश में Nuclear Liability Act बनता है जो परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1962 में संशोधन कर इस क्षेत्र में निजी निवेश की अनुमति देता है।

तो ये पूरा दशक गवाह रहा कि  कैसे भारत के संयम, अनुशासन, ज़िम्मेदार व्यवहार और दृह निश्चय ने दुनिया का नजरिया बदलना शुरू कर दिया था।

-सन 2010 से आगे

– दिसंबर 2012: भारत, तारापुर रिएक्टर को IAEA safeguards.के सुपुर्द कर देता है।

– सितंबर 2014: ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच यूरेनियम की आपूर्ति को लेकर समझौता होता है। भारत और रूस के बीच कम से कम 12 अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण को लेकर भी सहमति बनती है।

– – फरवरी 2015: भारत छह परमाणु ऊर्जा पनडुब्बियों के निर्माण को मंजूरी देता है।

–  मार्च 2018 तक देश के 7 परमाणु ऊर्जा केंद्रों में 22 रिएक्टर्स काम कर रहे थे।  इनकी कुल उत्पादन क्षमता 6780 मेगावाट है।  ये अभी करीब 30 GWh बिजली पैदा कर रहे हैं।  6 रिएक्टर्स अभी निर्माणाधीन हैं जिनसे भविष्य में 4300 मेगावाट बिजली उत्पादन होने की उम्मीद है।
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तो एक नज़र

– भारत के परमाणु कार्यक्रम के दो लक्ष्य हैं – ऊर्जा उत्पादन और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निवारक तैयार करना।
–  Indian Atomic Energy Commission इस सेक्टर का नीति निर्धारक है
–  कुडनकुलम केंद्र की परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता सबसे अधिक है (2000 मेगावाट)
–  भारत में परमाणु ऊर्जा   -थर्मल, हाइड्रोइलेक्ट्रिक और अक्षय स्रोतों के बाद बिजली का चौथा (2 %) बड़ा स्रोत है।
– 2024 तक देश में परमाणु ऊर्जा उत्पादन 14.6 GWe करने का लक्ष्य है
– देश में यूरेनियम के मात्रा सीमित है।  इसका निर्यात रूस, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटाइना, नामीबिया और कज़ाख़स्तान जैसे देशों से किया जाता है।
– पर दुनिया का कुल 13 % थोरियम भारत में मौजूद है और जो इस सेक्टर के लिए दीर्घकालीन ऊर्जा स्त्रोत है
– 2005 में हुआ India–United States Civil Nuclear Agreement.भारत के लिए फायदेमंद रहा
– परमाणु हमले को अधिकृत करने का एकमात्र अधिकार Civilian Nuclear Command Authority के अगवा प्रधानमंत्री को है।
– सूत्रों के मुताबिक़ वर्तमान में भारत  करीब 135 परमाणु अस्त्र बनाने की क्षमता रखता है।
–  भारत की पृथ्वी और अग्नि श्रेणी की मिसाइल परमाणु अस्त्र ढोने की क्षमता रखती है
– जनवरी 2014; बहादुरगढ़, हरियाणा में Global Centre for Nuclear Energy Partnership (GCNEP) की स्थापना हुई।  इसका लक्ष्य इस सेक्टर में
अंतराष्ट्रीय सहयोग आमंत्रित करना और बढ़ाना है।

विशेषज्ञों के मुताबिक़ 1998 के परमाणु परीक्षणों ने भारत के प्रति दुनिया का नजरिया बदल डाला – इस परीक्षण से भारत को तीन सन्देश देना था
1 . 1974 के पर्रीक्षण से आया डाटा पुराना हो चुका है। निवारकों की नयी डिज़ाइन को भी परखना था
2 . भारत अब एक परमाणु हथियार संपन्न देश था और दुसरे देशों के साथ जुड़ाव की शर्तें उसके अनुकूल होनी चाहिए
3 . अप्रसार के मुद्दे पर विश्व बिरादरी से अपने बेदाग़ रिकॉर्ड पर मोहर लगवा कर देश का कद बढ़ाना था।
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जाते जाते …

तो कह सकते हैं की हमारी 74 बरस लम्बी परमाणु यात्रा लचीली, व्यवहारिक और मजबूत रही। हर दशक में तय लक्ष्य भेदती रही  – अपनी शर्तों पर।  दुनिया का नजरिया हमने कैसे बदला इसका प्रमाण तत्कालीन प्रधानमत्री अटल बिहारी बाजपेयी की 1997 में UN के उद्बोधन में मिलता है।  उन्होंने इस बैठक में परमाणु हथियार विकसित करने में भारत की प्रेरणा को स्पष्ट किया:था।

“मैंने राष्ट्रपति क्लिंटन से कहा कि जब मेरी तीसरी आंख सुरक्षा परिषद के कक्ष के दरवाजे को देखती है तो यह थोड़ा संकेत देता है कि इसमें केवल आर्थिक शक्ति या परमाणु हथियार रखने वालों को ही अनुमति दी जाती है।’

अगले ही बरस भारत ने पोखरण -2 को शानदार तरीके से अंजाम दिया था। और लाचारी के बंधन चिन्दी चिन्दी होकर कहीं बहुत पीछे फना हो गए थे।

इस बार बस इतना ही