भगीरथ प्रयास

Sandeep Yash
File photo: Plasma therapy for coronanirus

File photo: Plasma therapy for corona virus

नमस्कार, कोरोना वायरस ने हमें जीवन भर याद रहने वाले कई सबक दिए हैं। जैसे, ये वाद, वो वाद, आवश्यक विवाद – यानी ऐसी हर सोच और विचार जो लम्बे समय तक हमें सिर्फ सीमित करते रहे है -इस दौर ने उन्हें बबूल के जंगलों में जा फेका है। मतलब साफ़ है – कि अब नया सोचो, सबका सोचो और कर गुज़रो। तो पहला बुनियादी सबक ये है कि अगर इस महामारी का स्थायी और सुरक्षित इलाज पाना है तो हमें वैश्विक स्तर पर सहयोग और विश्वास बढ़ाना होगा।

फिलहाल इसकी शुरुआत चिकित्सा अनुसंधान से हो रही है। इस वक़्त इंग्लैंड के विश्व प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के नेतृत्त्व में कोविड-19 वैक्सीन बनाने पर काम ज़ोरों पर है। इस महायज्ञ में अमरीका के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ और भारत के सीरम इंस्टिट्यूट सहित पांच और अंतराष्ट्रीय संस्थान शामिल हैं।

आपकी जानकारी के लिए कोविड-19 या SARS-CoV-2 को पहली बार चीन के वुहान शहर में दिसंबर 2019 में पता चला था। 11 मार्च 2020 को WHO ने COVID-19 को महामारी घोषित कर दिया। पर इसकी वैक्सीन डिजाइनिंग पर ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय, जेनर इंस्टिट्यूट की टीम ने 10 जनवरी 2020 से ही काम शुरू कर दिया था। सरल भाषा में कहें तो ये वैक्सीन- चिंपांजी के एक सामान्य कोल्ड वायरस का कमजोर संस्करण है जिसे कोरोनवायरस में पाए जाने वाले स्पाइक प्रोटीन के जीन में डाला गया है।

अभी पिछले महीने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के रॉकी माउंटेन लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने ऑक्सफोर्ड वैक्सीन की खुराक छह रीसस मकाक बंदरों को दी थी। फिर इन बंदरों को कोरोना वायरस के संपर्क में रखा गया। जहाँ बगैर इस खुराक के बन्दर बीमार हो रहे थे वही ये छह बन्दर 28 दिनों बाद भी स्वस्थ पाए गए।

फिलहाल तीन महीनो की मशक्कत के बाद बनी इस वैक्सीन को पहली बार, अप्रैल 23 को 2 वालंटियर्स को लगाया गया है। इनमें एलिसा ग्रानटो नाम की महिला वैज्ञानिक भी शामिल है। इस वैक्सीन को तैयार करने वाली टीम का नेतृत्व प्रोफेसर सराह गिल्बर्ट कर रही है। इनके मुताबिक़ मई के मध्य तक 500 वालंटियर्स को ये टीका लगाने की योजना है। इसके बाद परीक्षण में शामिल होने की आयु 55 से 70 बरस की जाएगी। और आखिर में इस प्रयोग में 70 बरस से ज़्यादा के वालंटियर्स होंगे। फेज 3 में परीक्षण का विस्तार किया जायेगा। इसमें इस मई के अंत तक 6000 से ज़्यादा वालंटियर्स के शामिल होने की उम्मीद है। इन परीक्षणो के नतीजे इस बरस सितम्बर तक आ जायेंगे। अगर वो उम्मीद के मुताबिक़ रहे और विनियामक यानी Regulator से तत्काल अनुमति मिलती है तो अक्टूबर तक बड़ी मात्रा में वैक्सीन के डोस बाज़ार में होंगे। आत्मविश्वास से भरी प्रोफेसर गिल्बर्ट कहती हैं कि इन परीक्षणो का मक़सद ये साबित करना है ये वैक्सीन न केवल सुरक्षित है बल्कि काम भी करती है। आपको बता दें कि इस महत्वपूर्ण मिशन की रफ़्तार बढ़ाने और इस महामारी का निदान ढूंढने के लिए प्रोफेसर गिल्बर्ट की टीम को मार्च, 2020 में इंग्लैंड के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ रिसर्च और यूके रिसर्च एंड इनोवेशन से करीब 21 करोड़ रुपयों का अनुदान मिला था।

दूसरी ओर, वैश्विक स्तर पर चल रहे इस महायज्ञ में भारत का प्रतिनिधित्व पुणे का सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया (SII) कर रहा है। इंस्टिट्यूट इस वैक्सीन के 6 करोड़ डोज़ तैयार करने की तैयारी युद्धस्तर पर कर रहा है। आपकी जानकारी के लिए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया दुनिया में टीके यानी vaccine बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी है। इंस्टिट्यूट के मुख्य कार्याधिकारी अदार पूनावाला कहते हैं कि अगर प्रयोग सफल रहे तो ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय द्वारा विकसित की जा रही इस वैक्सीन के एक डोज़ की कीमत भारत में मात्र 1 हज़ार रुपये रखी जाएगी और ये सितम्बर /अक्टूबर तक बाजार में आ जाएगी।

इसी तरह, हैदराबाद की भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड और अमरीका की फलुजेन कंपनी के साथ एक इन्फ्लूएंजा वैक्सीन पर आधारित टीका विकसित कर रही है। इसके साथ रेमेडिसविर और फेविपिरवीर जैसी दवाइयों से भी उत्साहजनक नतीजे मिल रहे हैं। कई प्लाज्मा थेरेपी आधारित परीक्षण भी चल रहे हैं जिनमें कोविड -19 से उबरे रोगियों का प्लाज्मा बीमारों को दिया जा रहा है। साथ ही मलेरिया का इलाज करने वाली हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल भी रोगनिरोधक के रूप में किया जा रहा है

इनके अलावा कुछ और भारतीय कम्पनिया कोविड-19 खिलाफ चल रहे वैश्विक प्रयासों में शामिल हैं – जाइडस कडीला, बायोलॉजिकल ई, भारत बायोटेक, भारतीय इम्यूनोलॉजिकल और मायनवैक्स।

ये भी गौर करनी वाली बात है कि कोरोनावायरस का विस्फोट हुए अभी कुछ ही महीने हुए हैं पर इसके प्रसार को रोकने, टीकों को पहचानने और विकसित करने के लिए 150 परियोजनाएं हरकत में आ चुकी हैं। लेकिन इनमें ब्रिटिश और जर्मन सहित कुल 5 ही ऐसी योजनाएं हैं जो इंसानो पर परीक्षण के स्टेज तक आ पहुंची हैं।

जाते जाते – तो इस सामूहिक भगीरथ प्रयास का सिर्फ एक लक्ष्य है – कोविड -19 जैसी महामारी का स्थायी इलाज ढूढ़ना। पर जानकार कहते हैं इसमें सफलता पाने के बाद भी वैश्विक स्तर पर चल रहे ऐसे प्रयासों को चलते रहना चाहिए। क्यूंकि चिकित्सा विज्ञान जैसे गतिशील, महंगे और बारीक विषय पर कोई भी देश अकेले काम नहीं कर सकता। और- केवल सामूहिक वैज्ञानिक प्रयास ही मानव जाति की रक्षा कर सकते हैं।