भारतेन्दु हरिश्चंद

Sandeep Yash
Bharatendu Harishchandra

Bharatendu Harishchandra 

क्या ये संजोग भर है कि इतिहास रचने वाली तमाम शख्सियतें बड़ी कम उम्र में दुनिया से बिदा हो गयीं।आदि शंकराचार्य (32  बरस), स्वामी विवेकानंद, (39 बरस), जेम्स प्रिन्सेप (40 बरस), जॉन कीट्स (26 बरस), सिकंदर (33 बरस ) और मार्टिन लूथर किंग (39 बरस) जैसे नाम इस फेहरिस्त में आते हैं। पर एक नाम और है – ”भारतेन्दु” हरीश चंद का।  इन्हें आधुनिक हिंदी का पितामह कहा जाता है। एक गद्यकार, कवि, नाटककार, व्यंग्यकार,उपन्यासकार, पत्रकार और चिंतक के तौर पर इनकी ज़िन्दगी लम्बी न सही, पर बड़ी ज़रूर थी।

हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का युग भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। इनका जन्म 9 सितम्बर, 1850 को काशी में हुआ था। 10 बरस की उम्र तक इन्होने अपने माता -पिता को खो दिया था। भारतेन्दु ने सिर्फ 18 वर्ष की उम्र में ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका निकाली थी।  इस पत्रिका में उस दौर के वक्त के जाने माने लेखकों की रचनाएं छपा करती थीं।

जानकारों के मुताबिक़ ग़ुलामी के उस दौर में भारत भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, अलगाववाद, जातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याओं के अजगर पाश में था। पर  साहित्य का फलक इनको प्रतिबिंबित न कर आध्यात्म, भक्ति और प्रेम से जुड़ा था। तो संवेदनशील भारतेन्दु ने इन हालातों से जूझने के लिए लेखों, कविताओं और नाटकों को हथियार बनाया था। इन्होने साहित्य को मानवता और तर्क से जोड़ा, अपनी संस्कृति और भाषा पर गर्व करना सिखाया, बेड़ियों में कैद स्त्री विमर्श को आवाज़ दी। नीचे दी इनकी रचना स्त्री की घुटन को उजागर करती है।

परदे में क़ैद औरत की गुहार
लिखाय नाहीं देत्यो पढ़ाय नाहीं देत्यो।
सैयाँ फिरंगिन बनाय नाहीं देत्यो॥
लहँगा दुपट्टा नीको न लागै।
मेमन का गाउन मँगाय नाहीं देत्यो।
वै गोरिन हम रंग सँवलिया।
नदिया प बँगला छवाय नाहीं देत्यो॥
सरसों का उबटन हम ना लगइबे।
साबुन से देहियाँ मलाय नाहीं देत्यो॥
डोली मियाना प कब लग डोलौं।
घोड़वा प काठी कसाय नाहीं देत्यो॥
कब लग बैठीं काढ़े घुँघटवा।
मेला तमासा जाये नाहीं देत्यो॥
लीक पुरानी कब लग पीटों।

अपने साथी साहित्यकारों से वो दुनिया के प्रपंच पर लिखने को कहते थे ताकि सड़ी -गली रीतियों और सदियों से बोझ बनी प्रवृत्तियों को खत्म कर कुछ नया सृजित किया जा सके। भारतेन्दु सहज और सरल भाषा के भी पक्षधर थे। इन्होने बालाबोधनी, कविवचन सुधा और हरिश्चंद्र मैगजीन जैसी पत्रिकाओं का  प्रकाशन और संपादन किया। 1873 से इन्होने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ में संस्कृत और फ़ारसी शब्दों का मेल करना शुरू किया था। आगे चल कर इसी मिलन से एक नयी और मुक्त लेखन शैली – हिंदुस्तानी, वजूद में आयी।  इसे बाद में मुंशी प्रेम चंद ने अपनाया और परिष्कृत किया था। बतौर कवि, इन्होने 21 काव्यग्रंथ, 48 प्रबध काव्य और तमाम मुक्तक रचे थे। ये गद्य खड़ी बोली में लिखते थे और कविता ब्रज भाषा में।

भारतेन्दु को आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी थियेटर का अग्रज भी कहा जाता है। 1867 में भारतेन्दु जी ने बांग्ला नाटक विद्यासुंदर का खड़ी बोली में अनुवाद किया था। यहां से शुरू हुए सफर ने आगे हिंदी नाटक विधा में तमाम आयाम जोड़े थे। अपने छोटे से जीवन में इन्होने कुल 17 नाटक रचे थे।  इनमें मौलिक और अनुवाद -दोनों शामिल हैं।

भारतेन्दु- संस्कृत, पंजाबी, मराठी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती भाषाओँ के भी जानकार थे। इनकी कर्मठता और प्रतिभा का सम्मान करते हुए 1880 में इन्हें ‘भारतेंदु` की उपाधि से नवाज़ा गया। विद्वान्, 1857 से 1900 तक के काल को भारतेन्दु युग की संज्ञा देते हैं।

गऱीबी, ग़ुलामी और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करनी वाली इस बुलंद शख्सियत ने 6 जनवरी 1885 को असमय अंतिम सांस ली।  देश और विशेष तौर पर हिंदी साहित्य हमेशा इनका ऋणी रहेगा।