भारत और इंडिया में बंटा चुनाव

Panini Anand

election_awarenessजौनपुर में मीरगंज थाना पड़ता है. नदी और रेल की पटरियों के दरमियान यहां हरिजनों और मुसहरों की बस्ती हैं. हरजपुर और उससे कुछ दूरी पर मुसहर टोला. मुसहर टोला में कुछ दो दर्जन घर और 50 वोट देने योग्य आबादी. बनारस को जाने वाले हाईवे पर ट्रकों के पहिए चटचटाहट करने वाली तीखी आवाज़ के साथ इस बस्ती को झकझोरते चलते हैं. बस्ती में कुछ घरों में एक अदद बल्ब की सुविधा है जिसके लिए तीस रूपया महीना लेता है स्थानीय बिजली अधिकारी. बल्ब से ज़्यादा कुछ नहीं. सब कटिया के सहारे रौशनी के इंतज़ार में अंधेरे से लड़ते हैं. राशन कार्ड कुछेक के पास हैं. हालांकि राशन पूरा मिला हो, ऐसा शायद ही कभी हुआ है. न गेंहू में चमक है और न तराजू में तौल. 35 किलो की तौल घर आकर 25 साबित होती है. गांव की सबसे बुज़ुर्ग महिला बताती है कि ये कार्ड मायावती के शासनकाल में बने थे. इसके पहले या बाद कुछ नहीं. न हैंडपंप, न इंदिरा आवास, न पक्की गली, स्कूल और प्राथमिक चिकित्सा केंद्र तक नहीं. ज़िंदगी किसी कालबेलिया या घुमंतू टोले से कम दुश्वार नहीं.

इस मुसहर बस्ती की ओर हमारी गाड़ी रुकी तो लोगों को लगा कि शायद कोई चुनाव प्रचार करने आया है. हमने अपनी स्थिति स्पष्ट की. बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो पहली बात यह आई कि अभी तक किसी भी पार्टी के किसी व्यक्ति ने इन लोगों से संपर्क नहीं किया है. शहर में किसकी लहर है, या देश में कौन पीएम बनने के लिए व्याकुल है, इन्हें नहीं पता. न इन्हें मालूम है कि घोषणापत्रों से लेकर राजनीतिक मंचों तक किस तरह के वादे किन-किन दलों ने किए हैं. कुपोषण का दंश झेलते बच्चे और उपचार की आस लेकर जीते बुज़ुर्गों के लिए हम किसी कौतुहल से कम नहीं थे. जो युवा और अधेड़ थे, कुरेदने पर उखड़ पड़े. “कौन मुद्दे की बात कर रहे हैं आप लोग. हम जिएंगे तो जानेंगे न दुनिया का राग. यहाँ कोई नहीं है सुध लेने वाला. अभी बारी-बारी आना शुरू होगा वोट के लिए. लेकिन हम वोट नहीं देंगे.”

लेकिन मताधिकार का प्रयोग तो करना चाहिए. ऐसा समझाने की कोशिश पर बात और तल्ख़ हो गई. एक महिला ने काफ़ी नाराज़गी के साथ कहा, “बगल में ठाकुरों के घर हैं. वहाँ अधिकारी लोग आए और फोटो खींचकर ले गए. यहाँ भी तो जन रहते हैं. यहां कोई नहीं आया फोटो खींचने. क्या हम लोगों का कार्ड नहीं बनना चाहिए. बोलिए, कैसे वोट देंगे हम. आधे से ज़्यादा लोगों के पास कोई कागज़ नहीं.”

तो क्या ये लोग हाल-फिलहाल ही यहाँ आकर बस गए जो सरकारी अमले की इनपर कोई नज़र नहीं पड़ी. झुर्रियों से भरे चेहरे वाली आशा कुमारी बताती हैं कि तब कच्ची उमर की थीं, जब इस जगह ठौर बनाया था. आज कमर बकुली की तरह झुक गई है. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितने सावन अधिकारों की बारिश की बाट जोहते बीत गए.

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लेकिन लोकतंत्र के मेले में इस बस्ती के लोगों के पास पहचान के दस्तावेज़ तक नहीं हैं.

दिल्ली से बनारस और फिर जौनपुर तक की यात्रा के दौरान संचार के जितने माध्यम दिखे, सबपर इस बात का प्रचार बहुत व्यापक स्तर पर था कि लोगों को अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए. मोटरसाइकिल के विज्ञापनों से लेकर फेवीकोल तक और न जाने कितने तरह की कंपनियां, उत्पाद मतदान के दायित्वबोध की चाशनी में डुबोकर लोगों के सामने रखे जा रहे हैं. कहीं मानव श्रृंखलाएं हैं. कहीं पोस्टर और रेडियो एफ़एम के विज्ञापन हैं. चुनाव आयोग ने वोटरों को जागरूक करने के लिए खासा खर्च किया है. लेकिन एक तरह से राजनीतिक दलों के प्रचार के दायरे को सीमित करके चुनाव प्रचार और जागरूकता को संचार माध्यमों की परिधि में कस देना देश को दो भागों में बांटता नज़र आता है. जौनपुर शहर में घरों में चहकते चैनलों पर मताधिकार का विज्ञापन है और प्रत्याशियों के वादे-नारे, बहसें. लेकिन इसी शहर के किनारे इन बस्तियों में कुछ ख़बर नहीं है क्योंकि यहां संचार का कोई साधन नहीं है. स्थिति तब और त्रासद नज़र आती है जब हम पाते हैं कि जागरूकता तो दूर, राजनीतिक प्रत्याशियों के नाम तक न जानने वाले इन लोगों के पास पहचान पत्र तक नहीं पहुंच सका है.

तकनीक ने तलवार की धार पर जैसे भारत और इंडिया को तराशकर दो हिस्सों में कर दिया है. मीडिया की पीठ पर बैठकर प्रचार युद्ध भी हो रहा है. जागरूकता भी लाई जा रही है लेकिन जहां मीडिया नहीं है, वहां अंधकार है. अभाव है. उपेक्षा है. देश में वोट प्रतिशत बढ़ा है और इसके लिए पीठ थपथपाई जा रही हैं लेकिन मुसहर बस्ती के लोग इस सफलता को मुंह चिढ़ा रहे हैं. ऐसी कितनी ही बस्तियां और लोग अभी अपने तक प्रचार और जागरूकता के पहुंचने का इंतज़ार कर रहे हैं. विडंबना यह है कि सड़कों, महानगरों से होते हुए ऐसे अभियान अभी पगडंडियों और कच्ची बस्तियों तक पूरे तौर पर नहीं पहुंच पाए है.

तकनीक ने मशीनों के बटनों पर जनादेश उतार दिया है लेकिन अंतिम व्यक्ति की झोपड़ी तक उसका न पहुंच पाना एक तरह का भेदभाव है. अनुचित और अलोकतांत्रिक है. इसकी सुध राजनीतिक दलों को भी लेने की ज़रूरत है और चुनाव आयोग को भी.