भारत के तिलक

Sandeep Yash
File photo: Bal Gangadhar Tilak

File photo: Bal Gangadhar Tilak

10 मई, 1857 में आज़ादी की लड़ाई का जब पहला बिगुल बजा तो बाल गंगाधर तिलक एक बरस के थे। इनका जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के एक माध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था।  तिलक इस धरा पर 64 बरस रहे। और अपने 40 बरस के सार्वजानिक जीवन में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को न सिर्फ प्रखर नेतृत्व,आयाम, दिशा और नयी ऊचाइयां दीं बल्कि 1920 के दशक में उसे ऐसे मोड़ पर ला छोड़ा जहाँ से अंग्रेजी हुकूमत के सामने मौजूद हर रास्ता बंद गली में जाकर खत्म होता था। तिलक ने 1 अगस्त, 1920 को मुंबई में देह त्यागी थी और आज देश अपने इस महान राष्ट्रवादी सपूत की 100 वीं पुण्यतिथि मना रहा है।  तिलक का मंतव्य सीधा,साफ़ और सपाट था – स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा। इस अमर नारे ने उस दौर में प्रत्येक भारतवासी को गर्व, स्वाभिमान और एकता का प्रबल सन्देश दिया था,.उर्जित किया था। ब्रिटिश लेखक इग्नाटियस वेलेंटाइन चिरोल ने तिलक को “भारतीय क्रांति का प्रणेता ” बताया था। चलिए संक्षेप में तिलक के सिद्धांतों और योगदान को समझते हैं।

तिलक और राष्ट्रवाद

इतिहासकारों के मुताबिक़ तिलक राष्ट्रवाद के भीष्म पितामह थे।  वो अद्वैत दर्शन के कट्टर समर्थक थे और वेदांत को स्वतंत्र मानवता का आधार मानते थे जिसके अनुसार स्वतंत्रता के बिना कोई नैतिक और आध्यात्मिक जीवन संभव नहीं है। विदेशी साम्राज्यवाद एक राष्ट्र की आत्मा को मारता है और इसलिए तिलक ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनका मानना था कि वेदों और गीता के संदेश राष्ट्र को आध्यात्मिक ऊर्जा और नैतिक बल देने में सक्षम हैं। स्वस्थ और महत्वपूर्ण परंपराओं के लिए भारत की प्राचीन संस्कृति का पुनरुथान आवश्यक है। और सच्चे राष्ट्रवाद का निर्माण पुरानी वैचारिक नींव पर ही संभव हैं। इस पुरानी नीव को वो आध्यात्म राष्ट्रवाद कहते थे। बंकिम चंद्र, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द भी इसी विचार के हामी थे। कह सकते हैं कि तिलक का राष्ट्रवाद का एक व्यवस्थित दर्शन था। वो महसूस करते थे कि भारतीय राष्ट्रवाद की जड़ें सिर्फ पश्चिमी सिद्धांतों की बौद्धिक अपील में ही नहीं बल्कि जनता की भावनाओं और संस्कृति में परिलक्षित होनी चाहिए।

तिलक राजनीतिक और सामाजिक सुधारों के नाम पर भारतीय समाज के आंग्लीकरण के भी विरोधी थे। वे एक मजबूत सांस्कृतिक और धार्मिक पुनरुत्थान की बुनियाद पर राष्ट्रवादी आंदोलन ‘को पोसना चाहते थे। सो उन्होंने महाराष्ट्र में गणपति (पुणे, 1892) और शिवाजी (किला रायगढ़,1894)  त्योहारों के माध्यम से राष्ट्रवाद को जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश की थी। इस कोशिश में उन्हें अपूर्व कामयाबी मिली थी। ये त्यौहार आज भी हर बरस ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं।

स्वराज और स्वदेशी आंदोलन

इतिहासकार, स्वराज के सिद्धांत का प्रणेता शिवा जी महाराज को मानते हैं जो तिलक के प्रेरणास्त्रोत थे। 1895 में तिलक ने स्वराज का प्रचार शुरू कर दिया था। उनका मानना था कि स्वराज, किसी भी सार्थक सामाजिक सुधार से पहले होना ज़रूरी है। उन्होंने लोगों को याद दिलाया था कि शिवाजी भी स्वराज को सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता का आधार मानते थे।  स्वराज का सिद्धांत तिलक के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के साथ पूरी तरह मेल खाता था। उसे मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने 1916 में एनी बेसेंट के साथ होम रूल लीग की शुरुआत की थी। तिलक ने स्वराज के तहत संघीय प्रकार (federal structure) की राजनीतिक संरचना के बारे में भी सोचा था। अपने कार्यक्रम के कार्यान्वन के लिए उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस का उदाहरण चुना था। आपकी जानकारी के लिए तिलक ”nonviolent passive resistance’ के सिद्धांत को भी आगे बढ़ाने वाले थे।

तिलक के राजनीतिक दर्शन में दो खासियतें थीं जो उन्हें उदारवादी विचारकों से अलग  करती थीं।
पहली – जहाँ उदारवादी सहज भाव से लोकतांत्रिक संस्थाओं को लाना चाहते थे वहीं  तिलक तत्काल स्वराज चाहते थे।
दूसरी – जनता को उस सत्ता केंद्र का विरोध करने का सम्पूर्ण अधिकार देने के हामी थे जो वैधता खो चुकी हो।

लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की तिकड़ी भी मशहूर रही।  इन तीनों में  तिलक सबसे मुखर थे। इन्होने ब्रिटिश राज के खिलाफ प्रभावी राजनीतिक कार्रवाई के लिए तीन सूत्री कार्यक्रम राष्ट्र को  दिया – स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा। इसने राष्ट्रवादी शब्दावली को ही बदल कर रख दिया था।

बहिष्कार – जनता को ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के खिलाफ जागरूक कर भारत और विदेशों में ब्रिटिश व्यापारिक हितों को नुक्सान पहुँचाना था। धीरे-धीरे ये राजनीतिक हथियार भी बन गया।

स्वदेशी – 1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में तिलक ने स्वदेशी प्रस्ताव का समर्थन किया था और राष्ट्रवाद की आर्थिक नींव की बुनियाद डाली थी। स्वदेशी आंदोलन जल्द ही राष्ट्रीय उत्थान और देश प्रेम का प्रतीक बन गया था।

राष्ट्रीय शिक्षा – तिलक के मुताबिक़ भारत के शिक्षा तंत्र की जड़े उसकी संस्कृति और परंपरा में होनी चाहिए। वे स्कूलों में भारतीय भाषाओँ के प्रसार, प्रचार के साथ साथ उद्योगिक एवं राजनीतिक शिक्षा के भी प्रबल पक्षधर थे।

तिलक के बहुआयामी व्यक्तित्व के तमाम प्रमाण मिलते है। एक शिक्षक के तौर पर उन्होंने पूना न्यू इंग्लिश स्कूल, द डेकन एजुकेशन सोसाइटी और फर्ग्यूसन कॉलेज की स्थापना में बड़ी भूमिका निभाई थी।  इंडियन नेशनल कांग्रेस में सक्रिय होने से कहीं पहले तिलक ने अपने राष्ट्रवादी विचारों को केसरी (मराठी में) और महरत (अंग्रेजी में) अख़बारों के माध्यम से प्रसारित किया करते थे। दोनों अखबार उन्होंने 1885 में शुरू किये थे। 1890 में उन्होंने औपचारिक तौर पर पर कांग्रेस ज्वाइन की थी। 1905 से 1907 तक और 1917 से 1920 तक उन्होंने इसमें निर्णायक भूमिका निभाई थी । उन्होंने तब आत्मनिर्भरता की वकालत की थी जब कुछ नेता सहानुभूति और समर्थन के लिए ब्रिटिश राज की तरफ देख रहे थे।  उस दौर में कांग्रेस मुख्य रूप से मध्यवर्गीय संगठन हुआ करती थी, तिलक ने इसे निम्न मध्यवर्गीय और साधारण जनता से जोड़ा था।

तिलक ने सनातन को भी व्यापक परिभाषा दी थी।  उनके मुताबिक़ एक हिंदू वह है जो वेदों की शिक्षा को मानता हो और जिसका आचरण स्मृति और पुराण के अनुसार हो।  वे प्राचीन संस्कृत दर्शन के अच्छे जानकार थे और उनका राजनीतिक चिंतन भारतीय विचार और आधुनिक दुनिया के राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक विचारों का संगम था। 1908 के मशहूर trial speech में उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल की राष्ट्रीयता की परिभाषा का उदाहरण दिया था.

उन्हें लोकनायक भी कहा जाता है

1897 में प्लेग से बॉम्बे (अब मुंबई) और पुणे तमाम मौतें हुई थीं।  हालात सरकार के काबू में नहीं रह गए थे।  पुणे के सहायक कलेक्टर ने बीमारी को रोकने के लिए बेहद क्रूर तरीके अपनाये थे।  इनमें घरों को जलाने और यहां तक कि रोगियों को गोली मार देने की घटनाएं शामिल थीं। इसके विरोध में  तिलक ने अपने अखबार केसरी में “भगवद गीता” के हवाले से लेख प्रकाशित किये थे। प्रकाशन के बाद सहायक कलेक्टर और उसके सहायक की हत्या कर दी गई थी। तिलक पर उकसाने का आरोप लगा उन्हें अठारह महीने की सजा सुनाई गई थी। पर जब वो जेल से बाहर आये तो राष्ट्रीय नायक बन चुके थे। उनको लोकमान्य के नाम से पुकारा जाने लगा था यानी “लोगों का प्रिय नेता” .

चलते चलते

– उन्होंने दो पुस्तकें भी लिखी थी – The Arctic Home in the Vedas (1903), Srimad Bhagvat Gita Rahasya (1915)
– उनका पोलिटिकल करियर पुणे से शुरू हुआ था
– उन्होंने Age of Consent Act of 1891 का विरोध किया था
– 1907 के कांग्रेस (सूरत अधिवेशन ) में  नरम दल – गरम दल में विभाजन हुआ था। मौके का फायदा उठा कर ब्रिटिश हुकूमत ने तिलक को 6 बरस के लिए मांडले जेल (बर्मा ) भेज दिया था
–  अप्रैल, 1916 में Indian Home Rule League के गठन के वक़्त उन्होंने अपना अमर नारा – “Swarajya is my birthright and I will have it.” दिया था
– स्वदेशी आंदोलन के दौरान तिलक और जमशेद जी टाटा ने बॉम्बे स्वदेशी स्टोर्स शुरू किये थे
– 2 जनवरी, 2015 को उनके जीवन पर बनी एक फिल्म भी रिलीज़ हुई – लोकमान्य : एक युग पुरुष
– तिलक का पूना पैक्ट में एहम योगदान था

आधुनिक भारत में लोकनायक तिलक के विचार- समाज, सरकार और राष्ट्र – सभी को आलोकित कर रहे हैं