भूमि अधिग्रहण विधेयक पर कशमकश में सरकार

Shyam Sunder

modi_narendraभाजपा और सरकार में भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर कशमकश की स्थिति है. मंगलवार देर रात तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के बड़े नेताओं और मंत्रियों के साथ इस मसले पर मंत्रणा की. इसी सप्ताह हुई भाजपा आरएसएस की बैठक में आरएसएस नेताओं ने भाजपा को इस मसले पर सावधानी से आगे बढ़ने की सलाह दी थी. आरएसएस ने भाजपा को आगाह किया है कि भूमि अधिग्रहण बिल पर आगे बढ़ने की कीमत पार्टी को बिहार और दूसरे विधानसभा चुनाव में चुकानी पड़ सकती है.

रात क़रीब दस बजे तक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी 7 आरसीआर पर प्रधानमंत्री के साथ बैठक में रहे. पार्टी भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक पर दुविधा में है. ये विधेयक लोकसभा में तो पास हो गया है लेकिन राज्यसभा में सरकार के पास इसे पारित कराने के लिए संख्याबल नहीं है. लेकिन भाजपा और सरकार के लिए चिंता सिर्फ़ संख्याबल ही नहीं है. उसकी चिंता ये है कि उसके बारे में किसान विरोधी धारणा बन रही है.

संसदीय कार्य राज्य मंत्री, मुख़्तार अब्बास नक़वी ने इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा कि देश में एक कनफ्यूज़न का माहौल पैदा करने की कोशिश की गई है. हम इसे ध्वस्त करेंगे. सरकार व्यापार नहीं कर रही है, वो पहले होता था. नरेन्द्र मोदी खुद कमज़ोर तबके से आते हैं, किसानों के नुकसान के बारे में वो सोच भी नहीं सकते.

भाजपा ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को भूमि अधिग्रहण बिल पर पार्टी की स्थिति स्पष्ट करने के लिए अभियान चलाने को कहा है. ख़ासतौर पर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं से पार्टी उम्मीद कर रही है कि वो ग्रामीण भारत में लोगों को ये समझाएं कि भूमि अधिग्रहण में बदलाव किसानों के हित में हैं. इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी और दूसरे दलों के मुख्यमंत्री और राज्य सरकार इस मसले पर क्या कहते रहे हैं इस बात को भी अभियान में बताया जाए.

सरकार इस मसले पर आसानी से घुटने भी नहीं टेकना चाहती. लेकिन ये भी जानती है कि ये मसला बेहद संवेदनशील है. पार्टी के कई बिरादराना संगठन भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के पक्ष में नहीं हैं. पार्टी के भी कई बड़े नेता ये कहते सुने गए हैं कि लोकतंत्र में कई बार बहुमत के सामने पीछे हटना पड़ता है.

भूमि अधिग्रहण संशोधन के मसले पर भाजपा परसेप्शन की लड़ाई में फंस गई है. पार्टी को चिंता है कि इस मसले पर उसकी छवि किसान और ग़रीब विरोधी की बन रही है. दूसरी तरफ चिंता ये भी है कि पीछे हटने से कंही मजबूत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि ना बिगड़ जाए.