महात्मा बुद्ध: करुणा और प्रेम के प्रतीक

Ritu Kumar
File Photo: Lord Buddha Statue

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महात्मा बुद्ध ने कहा है “ मेरे पास आना, लेकिन मुझसे बंध मत जाना। तुम मुझे सम्मान देना, सिर्फ इसलिए कि मैं तुम्हारा भविष्य हूँ। तुम मेरे जैसे हो सकते हो, मैं इसकी सूचना हूँ। तुम मुझे सम्मान दो, यह तुम्हारा बुद्धत्व को ही दिया गया सम्मान है। लेकिन तुम मेरा अंधानुकरण मत करना, क्योंकि तुम अंधे होकर मेरे पीछे चले तो बुद्ध कैसे हो पाओगे। बुद्धत्व तो खुली आँखों से उपलब्ध होता है, बंद आँखों से नहीं। बुद्धत्व तभी मिलता है जब तुम किसी के पीछे नहीं चलते, खुद के भीतर जाते हो।“

करीब ढाई हजार साल पहले कहे गए महात्मा बुद्ध के ये शब्द आज भी पूरी मानव जाति को जीवन का मूल्य और जीने की कला सीखा रहा है। यह उनके विचार और दर्शन की महत्ता ही थी जो भारत तक ही सीमित न रह कर पूरी दुनिया में फैल गई। प्रेम और करुणा का जो संदेश  बुद्ध ने दिया वह आज भी मानवता को आलोकित कर रहा है।

दरअसल ईसा पूर्व छठी सदी के उतरार्द्ध में मध्य गंगा के मैदानों में अनेक धार्मिक सम्प्रदायों का उदय हुआ लेकिन जो प्रसिद्धि, महत्व और लोकप्रियता गौतम बुद्ध और बौद्ध धर्म को मिली वह किसी और को नसीब नहीं हुई…. और इसकी वजह थी महात्मा बुद्ध के विचार और उनके द्वारा चलाए गए धर्म की उदारता… जो थोड़े ही वक्त में लाखों-करोंड़ों लोगों के बीच लोकप्रिय हो गया। महात्मा बुद्ध ने न केवल भारत के बल्कि संपूर्ण एशिया के धार्मिक विचारों और भावनाओं को क्रांतिकारी रूप से प्रभावित किया।

वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन 563 ईस्वी पूर्व कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी- जिसकी पहचान उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में पिपरहवा से की गई है- में शाक्य नामक क्षत्रिय कुल में पैदा हुए सिद्धार्थ को तत्कालीन समाज में फैली दुख और पीड़ा ने इतना व्यथित कर दिया कि उन्होंने राजसी जीवन का त्याग कर दिया। यहां तक कि अपनी पत्नी और सोये हुए पुत्र को छोड़कर सत्य की खोज और संसार को दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए घर से निकल गए। महाभिनिष्क्रमण की यह घटना उनके जीवन के 29वें साल में घटी। गौतम बुद्ध ने हर कदम क्रांतिकारी विचारों का प्रादुर्भाव किया। ज्ञान प्राप्ति के भारतीय परंपरा जिनमें भोजन त्याग कर आत्म दमन करने पर ज्यादा जोर रहा है उसे बुद्ध ने अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जो कुछ भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है वह स्वस्थ शरीर में एक स्वस्थ मस्तिष्क के जरिए ही प्राप्त किया जा सकता है। उस युग में भारत के लिए यह धारणा बिलकुल नई थी। सात वर्षों तक भटकते रहने के बाद 35 साल की उम्र में बोध गया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद सिद्धार्थ बुद्ध यानि प्रज्ञावान कहलाने लगे। वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्धत्व की प्राप्ति होने से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना गया। यह भी एक संयोग ही है कि चालीस साल तक लगातार उपदेश देते रहने के बाद वैशाख पूर्णिमा के दिन हीं ईस्वी पूर्व 483 में 80 साल की आयु में कुशीनगर- जिसकी पहचान आज के देवरिया जिले के कसिया नामक गांव से की जाती है- में उन्होंने शरीर का त्याग कर दिया। यह घटना इतिहास में महापरिनिर्वाण के रूप में दर्ज है।

बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद उनका पहला सवाल स्वयं से था कि “ मैं पूर्णतया सुखी क्यों नहीं हूँ?”  होता था। यह एक आत्मनिरीक्षणात्मक प्रश्न था। यह स्पष्ट रूप से उस आत्मविस्मरणशील मूर्तरूप जिज्ञासा से गुणात्मक रूप से बहुत अलग प्रश्न था। जिसके साथ थेल्स और हेराक्लिटस उस दौर में संसार की समस्याओं पर विचार कर रहे थे। इन सब के बीच भगवान बुद्ध ने स्वयं को नहीं भुलाया। उन्होंने ‘स्व’ पर ध्यान केंद्रित किया और इसे खत्म कर देने का प्रयास किया। उन्होंने शिक्षा दी कि सभी दुखों का कारण मनुष्य की तृष्णा है। जब तक मनुष्य अपनी तृष्णा पर विजय नहीं प्राप्त कर लेता तब तक उसका जीवन कष्टमय है और उसका अंत दुख। जीवन के तृष्णा के तीन प्रमुख रूप हैं जो निर्वाण की प्राप्ति में अवरोधक हैं। इनमें से पहला है भूख की इच्छा, लालच और ऐंद्रिकता के सभी रूप। दूसरा है व्यक्तिगत और अंहकारी अमरता की इच्छा और तीसरा है व्यक्तिगत सफलता की इच्छा, सांसारिकता और धन लोलुपता। जीवन के दुख और संताप से उबरने के लिए तृष्णा के इन सभी रूपों से उबरना होगा। जब ये इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं तब ‘स्व’ पूरी तरह से नष्ट हो जाता है और तभी आत्मा की शांति, निर्वाण और परम सत्य की प्राप्ति होती है। भगवान बुद्ध ने इन तृष्णाओं यानि इच्छाओं से उबरने के लिए अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया।

बुद्ध ने बुद्धत्व की प्राप्ति की बाद अपने ज्ञान का प्रथम प्रवचन सारनाथ के नजदीक मृगदाव में दिया। यह उपदेश ‘धर्म चक्र परिवर्तन’ कहलाया जो बौद्ध मत की शिक्षाओं का मूल बिंदू है। महात्मा बुद्ध के उपदेशों और बौद्ध धर्म के विचारों को त्रिपिटकों में समाहित किया गया। सुतपिटक में बुद्ध के धार्मिक विचारों और वचनों का संग्रह किया गया है। वहीं विनय पिटक में बौद्ध संघ के नियम लिखे गए जबकि अभिधम्मपिटक में बौद्ध दर्शन की विवेचना की गई है। इसके साथ ही प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत जिसे महात्मा बुद्ध ने शिक्षा का सार कहा उसका भी बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। इनके अलावा जातक कथाएं जिनमें बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएं हैं, अश्वघोष की रचनाएं जैसे बुद्धचरित, सौदरानन्द, सारिपुत्र, प्रकरण, नागसेन का मिलिंद पन्हों और बुद्ध घोष का विसुद्धमग्ग में भी बौद्ध दर्शन और बुद्ध के कथनों की विवेचना की गई है।

दरअसल महात्मा बुद्ध बड़े व्यवहारिक सुधारक थे। उन्होंने अपने समय की वास्तविकताओं को खुली आँखों से देखा। वे उन निरर्थक वाद-विवादों में नहीं उलझे जो उनके समय में आत्मा यानि जीव और परमात्मा यानि ब्रह्म के बारे में जोरों से चल रहा था। उन्होंने अपना सारा ध्यान सांसारिक समस्याओं के निदान में लगाया। जीवन मरण के चक्र से मनुष्य को मुक्ति दिलाने में लगाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न अत्यधिक विलास करना चाहिए और न अत्यधिक संयम ही। इस तरह उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाने की राय दी। यही वजह है कि बुद्ध अपने समकालीन तमाम अन्य दार्शनिक संप्रदायों से अलग प्रतीत हुए और जनसामान्य को सबसे अधिक भाए भी।

बुद्ध ने ईश्वर और आत्मा को नहीं माना। उन्होंने सृष्टि का विश्लेषण कारणवाद के आधार पर किया जिसमें विवेक पर आधारित तर्क की प्रधानता थी। यह एक तरह से भारत के धर्मों के इतिहास में क्रांति थी। हालांकि यह धर्म काफी उदार और जनतांत्रिक भी था। जिसमें सत्य, अहिंसा, प्रेम और करुणा पर काफी जोर था। भगवान बुद्ध ने यथार्थ के सही स्वरूप को पहचान कर मनुष्य को अपनी पूरी मानवीय क्षमताओं का विकास करने और जीवन मरण के चक्र से छुटकारा पाकर मुक्ति प्राप्त करने के सरल, सहज और सुगम राह दिखाई। बुद्ध की सीखाई शिक्षा ने अहिंसा और जीवमात्र के प्रति दया की भावना जगाकर न केवल मनुष्य बल्कि पशुओं के प्रति भी अपने प्रेम को उजागर किया। प्रचीनतम बौद्ध ग्रंथ सुत्तनिकाय में गाय को भोजन, रूप और सुख देने वाली यानि ‘अन्नदा वन्नदा सुखदा’ कहा गया है। उन्होंने भलाई करके बुराई को भगाने और प्रेम करके घृणा को भगाने का प्रयास जीवन भर किया और यही उपदेश दुनिया को दिया, जो आज भी बेहद प्रांसगिक है।