मॉनसून सत्र में सरकार लाएगी श्रम सुधार विधेयक?

Shyam Sunder

Factory-Labour-Indiaनरेन्द्र मोदी सरकार मॉनसून सत्र में श्रम क़ानूनों में बड़े बदलावों को संसद से पास कराना चाहती है। सरकार की योजना 44 अलग अलग क़ानूनों को अलग अलग श्रेणी के हिसाब से चार कोड में बदलने की है। चार श्रेणियों में वेतन, औद्योगिक विवाद, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षा एवं कल्याण हैं। सरकार प्रस्तावित वेज और इंडस्ट्रीयल रिलेशन कोड को सार्वजनिक कर चुकी है।

वेज कोड में सरकार न्यूनतम वेतन क़ानून, 1948, वेतन भुगतान क़ानून, 1936, बोनस भुगतान क़ानून, 1965 और समान वेतन क़ानून, 1976 को मिलाकर एक कोड बनाना चाहती है। यानि सरकार की कोशिश है कि उद्योग मे वेतन से जुड़ी अलग अलग परिभाषाओं और क़ानूनों को एक सरल क़ानून में बदला जाए।

इसी तरह औद्योगिक विवाद कोड में सरकार ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926, औद्योगिक रोज़गार एक्ट, 1946 और औद्योगिक विवाद एक्ट, 1947 का विलय करना चाहती है।

16 अक्टूबर 2014 को श्रमेव जयते कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी सरकार की मंशा स्पष्ट करते हुए कहा था कि वो मजदूरों का पूरा ख़्याल रखेगी। लेकिन साथ ही उन्होने कहा कि मेक इन इंडिया को कामयाब बनाना ही होगा। सरकार का कहना है कि भारत के पेचीदा और सख़्त क़ानून उस दौर की ज़रुरत थी जब उद्योग और मजदूरों के बीच भरोसे की कमी थी। उन्होने कहा कि मेक इन इंडिया की क़ामयाबी के लिए श्रम क़ानूनों में सुधार ज़रूरी हैं।

सरकार की प्राथमिकता पर फ़िलहाल औद्योगिक विवाद से जुड़े क़ानूनों में बदलाव का है। इन क़ानूनों के तहत दो अहम बदलाव हैं जिन पर सरकार और उद्योग का ज़ोर है। पहला है मजदूरों की सीमा 100 से बढ़ा कर 300 करना। अभी श्रम क़ानूनों के तहत कोई भी एसी फैक्ट्री या उद्योग जिसमें मजदूरों की संख्या 100 से ज़्यादा है उसको फैक्ट्री या उद्योग बंद करने से पहले सरकार से अनुमति अनिवार्य है। सरकार क़ानून में बदलाव कर इस सीमा को 300 मजदूर तक ले जाना चाहती है। दूसरा अहम बदलाव है यूनियन बनाने का अधिकार। फ़िलहाल किसी भी उद्योग में सात मजदूर मिलकर यूनियन बना सकते हैं। इसके अलावा मजदूर यूनियन किसी भी केन्द्रीय यूनियन से खुद को जोड़ सकती थीं। सरकार यूनियन बनाने के लिए मजदूरों की संख्या की अनिवार्यता बढ़ाना चाहती है।

यही वो मसला है जिस पर केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और सरकार के बीच टकराव है। आरएसएस से जुड़े भारतीय मजदूर संघ भी इस मुद्दे पर खुल कर सरकार का विरोध कर रहा है।

बीएमएस के महासचिव के. वृजेश उपाध्याय कहते हैं “ सरकार इंडस्ट्रीयल डिस्पयूट एक्ट में एसे बदलाव करना चाहती है जिसके बाद मजदूर यूनियन बनाना असभंव हो जाएगा।“
सीपीएम से जुड़ी सीटू का कहना है कि अगर सरकार बहुमत के दम पर श्रम क़ानूनों में बदलाव संसद में पास भी करा लेते हैं तो ट्रेड यूनियन इन बदलावों को ज़मीन पर लागू नहीं होने देंगी।

सीटू के महासचिव तपन सेन कहते हैं “ मज़दूर निहत्था नहीं बैठा है। अगर सरकार श्रम क़ानूनों में बदलाव थोपती है तो हम फैक्ट्रियों में विरोध करेंगे।“

श्रम क़ानूनों में बदलाव की दिशा में अहम कदम उठाते हुए सरकार ने पहले से ही उद्योगपतियों को 16 केन्द्रीय श्रम क़ानूनों से छूट दे दी।

सरकार की श्रम क़ानूनों में बदलाव की मंशा से उद्योग उत्साहित है। लेकिन अब उद्योग चाहता है कि सरकार इस दिशा में निर्णायक कदम उठाए। उद्योग का कहना है कि इन बदलावों पर मजदूर संगठनों की आशंका बेबुनियाद है।

फ़िक्की के महानिदेशक अरबिंद प्रसाद कहते हैं “मजदूरों से जुड़े क़ानूनों में बदलाव मेक इन इंडिया से जुड़े व्यापक बदलावों का हिस्सा हैं जो देश में उद्योग को बढ़ावा देने के लिए ज़रुरी है।”

वो कहते हैं “उद्योग हायर एंड फ़ायर का अधिकार नहीं चाहता, लेकिन वो इतनी छूट ज़रुर चाहता है कि वक्त की ज़रुरत के हिसाब से वो अपनी फैक्ट्री में बदलाव कर सके।“

सरकार का कहना है कि फ़िलहाल श्रम क़ानूनों में इन अहम बदलावों पर सरकार, उद्योग औऱ केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के बीच बातचीत चल रही है। लेकिन ट्रेड यूनियन कहती हैं कि एसी बातचीत का कोई मतलब नहीं है जिसमे सरकार अपनी राय बदलने के लिए तैयार नहीं है।

राजस्थान के बाद बीजेपी की महाराष्ट्र सरकार भी श्रम क़ानूनों में कई अहम बदलाव कर चुकी है। लेकिन कई अहम बदलाव ख़ासतौर पर थ्रैशहोल्ड यानि मजदूरों की सीमा बढ़ा कर 300 करने से जुड़े बदलाव को वो लागू नहीं कर पा रही है। इसकी वजह है भारतीय मजदूर संघ और शिवसेना का विरोध।

संसद के मॉनसून सत्र में मजदूरों से जुड़े क़ानूनों में बदलाव से संबधित बिल पास कराने पर सरकार विकल्प तौल रही है। इस सिलसिले में सरकार ने सत्र शुरू होने से पहले एक सम्मेलन बुलाया है। इस सम्मेलन में सरकार, उद्योग और मजदूरों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।