म्यांमार में लोकतंत्र के पेंच

Aung-San-Suu-Kyi

File photo of Aung San Suu Kyi

दशकों तक सैन्य शासन का दंश झेलने वाले म्यांमार में अब लोकतंत्र का उदय हो चुका है। आंग सान सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) ने देशवासियों की उस अधूरी आस को पूरा कर दिया है, जो लंबे वक्त से उन्हें बेचैन किए थी। हालांकि तय नहीं   है कि राष्ट्रपति कौन होगा। संसद के निचले सदन की 168 सीटों पर चुनावों में 138और ऊपरी सदन की 330 सीटों में 255 स्थानों पर एन एल डी ने विजय प्राप्त की है । इस  लिहाज से  दोनों सदनों में उन्हें भारी बहुमत प्राप्त है। 

यक़ीनन सूकी राष्ट्रपति पद की श्रेष्ठ्तम उम्मीदवार हैं लेकिन संवैधानिक प्रावधान उन्हें इजाजत नहीं देते। म्यांमार के संविधान का आर्टिकल-59 (एफ) कहता है कि कोई भी व्यक्ति जिसका जीवनसाथी या संतान विदेशी नागरिक हो, वह राष्ट्रपति नहीं बन सकता । सूकी ने ब्रितानी नागरिक से शादी की थी और उनके बच्चों के पास ब्रिटेन का पासपोर्ट है। फिलहाल सूकी के सामने दो विकल्प नजर आते  हैं।  या तो संविधान में बदलाव किया जाए या फिर किसी विश्वस्त को राष्ट्रपति बनाकर सत्ता की चाबी अपने पास रखी जाए।

संवैधानिक बदलाव का विकल्प थोड़ा मुश्किल इसलिए भी है कि क्योंकि संसद में अब भी एक चौथाई सीटें सेना के पास हैं और सेना कभी नहीं चाहेगी कि उसकी जड़ों को हिलाने वाली नेता प्रत्यक्ष रूप से देश की बागडोर संभाले। हां, यदि दोनों पक्षों के बीच  कोई समझौता हो जाए तो बात अलग है।

वैसे राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहे म्यांमार में सेना ने एक और चौंकाने वाला कदम उठाया है। सेना प्रमुख जनरल मिन आंग लैंग को पांच साल का सेवा विस्तार देने का फैसला किया गया। उप-सेना प्रमुख को भी विस्तार दिया जाएगा। दूसरी तरफ, सेना की संसदीय चुनाव में जबर्दस्त सफलता हासिल करने वाली आंग सान सू की के साथ सत्ता हस्तांतरण पर बातचीत भी चल रही है।

म्यांमार के मौजूदा  कानून के तहत सेना प्रमुख की अधिकतम उम्र सीमा 60 वर्ष है। जल्द ही वह भी 60 वर्ष के होने वाले हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जनरल मिन पांच और वर्षों के लिए कमांडर-इन-चीफ की कमान संभालेंगे। सेना की तिमाही बैठक में इसका फैसला लिया गया। इसका मतलब यह  कि संक्रमण काल से  गुजर रहे म्यांमार में सेना की बागडोर जनरल मिन के ही हाथों में रहेगी जो सू की से सत्ता हस्तांतरण पर बातचीत कर रहे हैं। यह स्पष्ट नहीं कि इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी या कानून में बदलाव की जरूरत है कि नहीं।

म्यांमार के वर्तमान राष्ट्रपति थेन सेन का कार्यकाल मार्च में खत्म हो रहा है, लिहाजा स्थितियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए सूकी के पास अभी कुछ वक्त है। म्यांमार की संसद 17 मार्च को नए राष्ट्रपति का चुनाव करेगी। नए राष्ट्रपति 1 अप्रैल को पद संभालेंगे।

म्यंमार में राष्ट्रपति चुनने का तरीका ये है कि संसद के दोनों सदन तथा सेना एक-एक नाम पेश करेंगे। तीनों नामों को 664 सदस्यों वाली संसद में वोटिंग के लिए रखा जाएगा। जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे, वह राष्ट्रपति बनेगा। शेष दोनों उपराष्ट्रपति होंगे।

बर्मा से म्यांमार बने इस दक्षिण एशियाई मुल्क में पिछले कुछ साल में काफी कुछ बदला है, खासतौर पर देश का आंतरिक नक्शा, जिसे दुरुस्त करना नई सरकार के लिए आसान नहीं होगा। सेना के खिलाफ बगावत में सूकी का साथ देने वालों के बीच ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो सैन्य विचारधारा को आत्मसात कर चुके हैं। सेना की दमनकारी नीतियां जिनके लिए अनुकूल रहीं, उन्हें लोकतंत्र की आजाद ख्याली पचने वाली नहीं है, और ये अस्थिरता को बढ़ावा देने का कारण बन सकती है।

ये देखना दिलचस्प है कि सेना कितने समय तक आदेशों पर अमल कर पाती है। सन 1842 से 1948 तक म्यांमार अंग्रेजों के अधीन रहा और 1962 से सेना ने उसे अपनी जद में ले लिया। इस दौरान मानवाधिकारों के हनन की गूंज पूरे विश्व में सुनाई दी। 90 के दशक में आंग सान सूकी उम्मीद की किरण के रूप में सामने आईं। उन्होंने नेशनल लीग फॉरडेमोक्रेसी का गठन किया। 1990 में हुए चुनावों में उनकी पार्टी को सफलता  मिली, लेकिन सैन्य शासकों ने नतीजों को नकाराते हुए उन्हें नजरबंद कर दिया। सूकी को 15 साल तक सेना ने अपनी निगरानी में रखा। अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच उन्हें 2010 में रिहा किया गया, मगर सेना ने हर संभव प्रयास किया कि किसी न किसी आरोप में उन्हें फिर नजरबंद कर दिया जाए। 2011 में जब म्यांमार में अर्धसैन्य सरकार का गठन हुआ, तब लगा कि सेना अवाम के फैसले को स्वीकारने के लिए तैयार है। मगर सरकार में अधिकांश पद सैन्य अधिकारियों को देकर सेना ने मंशा स्पष्ट कर दी। ऐसे में यह मान लेना कि म्यांमार हमेशा के लिए सैन्य शासन से मुक्त हो गया है, थोड़ा मुश्किल है।

वैसे भारत के लिए म्यांमार के करीब जाने का ये सबसे माकूल समय है।  यूं तो सैन्य शासन के दौरान भी नई दिल्ली के रंगून से रिश्ते अच्छे थे, लेकिन उनमें कभी कभी खिंचाव दिखता था। इसका फायदा चीन को भी मिलता रहा । 
बर्मा के पश्चिमी प्रांत अरकांस में प्राकृतिक गैस के व्यापक भंडार का जितना लाभ भारत को मिलना चाहिए था, उतना उसे कभी नहीं मिला। इसका मुख्य कारण 1980 में म्यांमार की फौजी हुकूमत के खिलाफ बगावत करने वालों को भारतीय समर्थन था। उस दौरान म्यांमार सरकार ने आरोप लगाया था कि भारत विरोधियों को धन और मंच दोनों मुहैया करा रहा है। तब से सैन्य शासकों के मन में भारत को लेकर कटुता पैदा हो गई। हालांकि भारत ने कभी म्यांमार के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया। म्यांमार के साथ भारत की सीमा 1600 किमी लंबी है। हमारा समस्याग्रस्त पूर्वोत्तर क्षेत्र बर्मा की सीमा से लगा है। इस लिहाज से म्यांमार सरकार का हमारे अनुकूल होना बेहद जरूरी है। आंग सान सूकी का भारत से पुराना रिश्ता रहा है। उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से पढ़ाई की है और उनकी मां भारत में राजदूत भी रह चुकी हैं। इसलिए संभावना इस बात की ज्यादा है कि सूकी भारत के हितों को तवज्जो देंगी। भारत की भी कोशिश होनी चाहिए कि इस पड़ोसी मुल्क में लोकतांत्रिक बदलाव कायम रहे।