यमन में संकट: वर्तमान स्थिति और वजहें

Abbas Syed

yemen_attacksयमन में चल रहा सत्ता संघर्ष नया नहीं है. अरब स्प्रिंग आंदोलन का असर यमन में भी देखने को मिला. सालों सत्ता पर काबिज रहे अब्दुल्ला अली सालेह को 2012 में सत्ता छोड़नी पड़ी. पिछले ढाई साल में वहां दूसरे राष्ट्रपति के देश छोड़कर भागने की नौबत आई है. राष्ट्रपति मंसूर हादी किसी तरह से जान बचाकर सऊदी अरब भागने में कामयाब रहे. हौथी विद्रोहियों ने जिस तेजी से पहले देश की राजधानी सना और फिर देश की आर्थिक राजधानी अदन पर कब्जा किया है, उससे साफ है कि उन्हें यमनी सेना का भी समर्थन हासिल है.

हौथी विद्रोहियों से चल रहा संघर्ष एक दशक पुराना है. हौथी उत्तरी हिस्से के शिया अल्पसंख्यक हैं. यहां की दो तिहाई आबादी में विश्व समुदाय की मदद की जरूरत है. ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार है. शिक्षा और रोजगार बड़ी समस्या है. हौथी विद्रोहियों अपने प्रांत की स्वायत्तता और बराबरी के हक के लिए लड़ रहे हैं. उनका आरोप है कि देश के राजनीतिक नेतृत्व भ्रष्ट्राचार में डूबा है, जिसकी वजह से देश राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा, सभी मामलों में बर्बादी के कगार पर खड़ा है. गरीब देश होने की वजह से इसे खाड़ी सहयोग परिषद में भी शामिल नहीं किया गया.

हौथी विद्रोहियों का सना और उसके बाद राष्ट्रपति मंसूर हादी के गढ़ अदन पर कब्जे के बाद सऊदी अरब की चिंता बढ़ना लाजिमी था. सऊदी अरब को सबसे ज्यादा खतरा हौथी शिया विद्रोहियों से है, जिनका प्रभाव सऊदी अरब की सीमा तक आ पहुंचा है. मध्य एशिया में यमन दो समुदायों के वर्चस्व का आखाड़ा बन चुका है. एक गुट का नेतृत्व सऊदी अरब कर रहा है. अरब राष्ट्र मंसूर हादी को आगे कर यमन में अपने वर्चस्व को बचाए रखना चाहते है. विद्रोही हौथी समुदाय का ताल्लुक शिया समुदाय से है. जिसे कथित रुप से ईरान का समर्थन हासिल है.

सऊदी अरब पश्चिम एशिया में ईरान के बढ़ते प्रभाव से चिंतित है. ईरान का बढ़ते प्रभाव से सऊदी राजशाही को सीधे खतरा है. देश के पूर्व इलाके में शिया काफी तादाद में हैं और अकुत तेल भंडार हैं. सऊदी अरब को डर है कि ईरान अगर यमन में भी अपनी जड़ें जमा लेता है, तो आने वाले वक्त में उसकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी. सऊदी अरब बार-बार आरोप लगाता रहा है कि हौथी विद्रोहियों को ईरान और लेबनान के हिजबुल्लाह से मदद मिल रही है. बहरीन और सऊदी अरब में भी शिया विद्रोह के पीछे सऊदी अरब ईरान का ही हाथ मानता है. तेहरान पश्चिम एशिया में महाशक्ति बनने के अपने ऐजेंडे पर काम कर रहा है. पहले से ही सीरिया, लेबनान और इराक में ईरान की मज़बूत उपस्थिति है. ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए सऊदी अरब इराक और सीरिया में आतंकियों को मदद देता रहा है.

यमन की जंग सऊदी अरब के लिए अब अस्तित्व का सवाल बन चुकी है. जिसकी वजह से दस देश के साथ मिलकर सऊदी अरब यमन में विद्रोहियों के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है. इस अभियान में जॉर्डेन, मोरक्को, मिस्र, सूडान और पाकिस्तान भी सऊदी अरब के साथ है. सऊदी अरब ने यमन में विद्रोहियों पर सैन्य कार्रवाई के लिए अपने 100 लड़ाकू विमान और डेढ़ लाख सैनिकों को जंगी मैदान में उतारा है. सऊदी अरब अगर यमन के मोर्चे पर नाकाम होता है तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते है. यमन में सऊदी अरब की नाकामी बहरीन और सऊदी अरब में शिया विद्रोहियों के हौंसले बुलंद करेगी.

सऊदी हमलों के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच संभावित परमाणु क़रार को रोकने की बेचैनी भी है. अगर यह क़रार होता है तो ईरान मध्य पूर्व में सबसे बड़ी आर्थिक, राजनीतिक और सैनिक ताक़त बन जाएगा. यमन के बहाने सऊदी अरब अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका पर भी दबाव बनाकर इस परमाणु समझौते को रोकना चाहता है.

यमन का सामरिक महत्व भी है. यमन का बंदरगाह शहर अदन मध्य एशिया में व्यापार का अहम मार्ग है. ज्यादातर तेल और गैस अदन की खाड़ी से ही होकर गुजरता है. तनाव के चलते खाड़ी देशों में तेल का उत्पादन प्रभावित होगा, जिसका दुनियाभर के बाज़ारों पर असर लाजिमी है. कच्चे तेल में फिर से तेज़ी आने से डॉलर पर दबाव बढेगा. इसका असर अमेरिकी बाज़ार पर नज़र आ रहा है, जहां कारोबार में नरमी देखने को मिली हैं. इसके अलावा एशियाई और यूरोपीय बाज़ारों में भी मंदी छाई हुई है. भारतीय शेयर बाज़ारों पर भी इसका असर देखने को मिल रहा है.