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Sandeep Yash
File photo: Corona  Warriors maintaining social distancing

File photo: Corona Warriors maintaining social distancing

”ओह रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में , सागर मिले कौन से जल में ,कोई जाने न ” आप इस पुराने गाने में गूढ़ जीवन दर्शन भी तलाश सकते हैं और ”Spirit of Enquiry” का बोध भी। यही बोध ही है जो मानव जाति को कोरोना वायरस को मिटाने पर आमादा कर रहा है, हमारे शरीरों से और उससे कहीं ज़्यादा हमारे दिलो -दिमाग से। फिलहाल भारत में इसकी वैक्सीन बनाने के लिए इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी और ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट जैसे शीर्ष संस्थान युद्धस्तर पर काम कर रहे है। हाल ही में हमारे वैज्ञानिकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बताया कि कैसे 30 वैक्सीन्स विकास के अलग अलग चरणों में है। कुछ तो ट्रायल स्टेज तक पहुंच गयी हैं। कुल मिला कर हमारे वैज्ञानिक 3 योजनाओं पर काम कर रहे हैं।  पहला – मौजूदा दवाइयों में ही इलाज ढूंढना, दूसरा – नयी दवाइयों की खोज करना , तीसरा – पेड़ -पौधों के अर्क में एंटी-वायरल गुणों की जांच करना।

ये तो रही भारत की बात, पर विदेशों में बसे भारतीय मूल के डॉक्टर और वैज्ञानिक भी इस जंग में पूरी ताक़त झोके हुए हैं। कुछ एक का ज़िक्र करते हैं।  कमलेन्द्र सिंह, अमरीका के मिसौरी विश्विद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।  हाल ही में इनकी टीम ने कंप्यूटर ऐडेड ड्रग डिज़ाइन की मदद से रेमेडिसविर, 5-फ्लूरोरासिल, रिबाविरिन और फेविपिरवीर के असर की जांच की। ये सभी चार दवाएं कोरोनोवायरस के मानव शरीर में प्रसार को रोकने में कामयाब सिद्ध हुईं। इस दिशा में ये टीम और गहन शोध कर रही है। बकौल कमलेन्द्र सिंह, इनका मक़सद डॉक्टरों को COVID-19 के संभावित उपचारों के लिए विकल्प देना और पीड़ित रोगियों के स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाना है।

फराज ज़ैदी अमेरिका के फिलाडेल्फिया में विस्टार इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। यह संस्थान बायोमेडिकल रिसर्च में जाना माना नाम है। इनकी टीम एक ऐसी पद्धति पर काम कर रही है जो एक विशेष विद्युत् उपकरण के माध्यम से DNA वैक्सीन सीधे मरीज़ की नसों में पहुचायेगी। आम तौर पर इंजेक्शन द्वारा दी गयी डोज़ को शरीर के एन्ज़ाइम्स नष्ट कर देते हैं। इस केस में वैक्सीन देने के बाद मानव शरीर प्रोटीन बनता है जो फिर T -सेल और B -सेल बना कर संक्रमण से लड़ता है। विशेषज्ञ इस पहल से अच्छे परिणाम की उम्मीद रख रहे हैं।

मुथु वेलयप्पन ऑस्ट्रेलिया में पीएच.डी.कर रहे हैं। हाल ही में इन्होने एक वीडियो देखा जिसमे कुछ लोग छींकने और खांसने के बाद लिफ्ट के बटन छू रहे थे। इसके घातक परिणाम हो सकते हैं। इसके निवारण के तौर पर इन्होने एक स्मार्ट सुरक्षा कुंजी या safety key बनायीं है जो उपयोगकर्ता को अपने हाथों से छुए बिना दरवाजे खोलने और यहां तक कि बटन दबाने की सहूलियत देती है। मुथु का ये आविष्कार एक सरल 3 डी प्रिंटेड टूल पर आधारित है जिसे बनाने में 2 घंटे लगते हैं और प्रत्येक टूल की लागत लगभग 50 से 60 सेंट या 30 रुपये आती है।

डॉ असीम मल्होत्रा इंग्लॅण्ड की नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) के फ्रंटलाइन मेडिक्स में से एक हैं। ये साक्ष्य आधारित चिकित्सा या evidence based medicine,के प्रोफेसर भी हैं।  डॉक्टर मेहरोत्रा मोटापे और ख़राब जीवनशैली जनित बीमारियों और कोरोना वायरस से हुई मौतों के बीच ”सीधा सम्बन्ध” होने की थ्योरी पर काम कर रहे हैं। प्रमाण के तौर पर ये अमेरिका, यूके और इटली जैसे पश्चिमी देशों में इस महामारी से हुई तमाम मौतों को गिनाते हैं जिनमें डायबेटिज़ -टाइप 2, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग का बड़ा हाथ रहा है।

परहेज के तौर पर, डा मेहरोत्रा हमें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों या पैकेज्ड फ़ूड से दूर रहने की सलाह देते हैं क्योंकि इनमें चीनी, स्टार्च, अस्वास्थ्यकर तेल और preservatives भरे होते हैं। ”जीवनशैली में बदलाव” को अपना मिशन बनाने वाले इस शख्स के मुताबिक़ ये कोरोना वायरस के खिलाफ एक कारगर हथियार हैं। पर इस पैमाने पर डा  मेहरोत्रा भारत के वर्तमान हालात को कोई ख़ास अच्छा नहीं मानते।  तो जनाब, इसे चेतावनी के रूप में लीजिये – क्यूंकि हमारे यहाँ जीवनशैली से पनपी बीमारियों के लिए हम और हमारी लापरवाही ही ज़िम्मेदार है।

तो हम ऐसे तमाम उदाहरण गिना सकते हैं जहां प्रवासी भारतीय सोते -जागते इस विकट चुनौती का हल ढूंढने में लगे हैं। पर इतना ही नहीं,हम संस्थागत तौर पर भी इस मोर्चे पर जी जान से जुटे हुए हैं।  वो सब जानेंगे अगले अंक में।

पार्ट 2