रिपोर्टर्स डायरी: यूपी का चुनावी मिजाज

Nav Vikram Singh
Varanasi : Samajwadi Party President Akhilesh Yadav, BSP chief Mayawati, Rashtriya Lok Dal (RLD) leader Ajit Singh and other leaders wave at their supporters during an election campaign rally during the ongoing Lok Sabha polls, in Varanasi district of Uttar Pradesh, Thursday,  May 16, 2019. (PTI Photo)

Varanasi : Samajwadi Party President Akhilesh Yadav, BSP chief Mayawati, Rashtriya Lok Dal (RLD) leader Ajit Singh and other leaders wave at their supporters during an election campaign rally during the ongoing Lok Sabha polls, in Varanasi district of Uttar Pradesh, Thursday, May 16, 2019. (PTI Photo)

उत्तर प्रदेश.. 80 सीटों वाला सबसे दिलचस्प सूबा। जहां एक तरफ हरियाणा से मिलती जुलती पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संस्कृति है.. वहीं बिहार की तरह रिवायतें निभाता पूर्वी उत्तर प्रदेश। ऐसे राज्य में चुनावी कवरेज करना दिल्ली के हर रिपोर्टर की प्राथमिकता होती है। और वो अगर उत्तर प्रदेश का ही बाशिंदा हो तो वो ये मौका किसी सूरत में गंवाना नहीं चाहता। मुझे भी मौका मिला दशकों बाद बदले सियासी समीकरण में यूपी की रिपोर्टिंग का। ये ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं कि इस चुनाव में दुश्मनी की हद तक एक दूसरे के विरोधी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी की एकजुटता ने इस प्रदर्शन को रोचक बना दिया है। खैर अब मुद्दे की बात..

यूं तो मैं गाज़ियाबाद लोकसभा क्षेत्र के शहर और गांव में घूम चुका था। प्रियंका गांधी का रोड शो भी कांग्रेस प्रत्याशी डॉली शर्मा के समर्थन में कवर किया। लेकिन एक महीने पहले 10 दिन की उत्तर प्रदेश यात्रा के बाद एक बार फिर दिल्ली से अपना बोरिया बिस्तरा लेकर निकलना हुआ तो वो हुआ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नामांकन के वक़्त।

दिल्ली से लखनऊ और अमेठी तक रास्ते में पोस्टर, बैनर न के बराबर ही दिखाई देते हैं। राजनीतिक दलों पर चुनाव आयोग की नकेल साफ नजर आ रही है। लेकिन मोबाइल खोलने पर डिजिटल मीडिया पर विज्ञापन और सोशल मीडिया पर समर्थकों की भिड़ंत गाहे बगाहे सामने आ ही जाती है। मानो पुराने दिनों के चुनावों के वक़्त का वर्चुअल अहसास हो।  खैर.. मैं अमेठी पहुँच कर अपनी OB वैन से कॉर्डिनेट कर रहा था। तय हुआ स्टेशन पर मुलाकात होगी। अब नॉमिनेशन से एक दिन पहले स्टोरी करना चाह रहा था।  स्टेशन के बाहर अहाते में एक बुजुर्ग बैठे थे उन्होंने पूछ लिया कि कहां से?? लखनऊ से या दिल्ली से?? मैंने कहा दिल्ली से। तो बोले में भी वहीं से सरकारी नॉकरी करके लौटा हूँ। कैमरा, ओबी देखकर जमा हुए लोग अपने आप बोल पड़े कि इस बार कांटे की टक्कर है। हालाँकि भीड़ में कोई कैमरे पर बोलने के लिए राजी न हुआ। लाख कोशिशों के बाद भी कोई भी राजी न हुआ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये लोग क्यों नहीं बोलना चाहते। वैसे ऐसा अक्सर होता है टीवी के रिपोर्टरों के साथ। जब जरूरत हो तब कोई नहीं बोलता। जब जरूरत न हो तो तमाम लोग अपनी बात एक बार बोलना चाहते हैं।

समय की कमी थी तो सोचा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं से ही मिल लेता हूँ। अमेठी कांग्रेस ऑफिस पहुँचा तो पता चला कि काम यहां से नहीं गौरीगंज से चलता है। लेकिन तब तक कांग्रेस के युवा नेता वहां पहुंच गए.. उन्होंने अपने साथियों को इकट्ठा किया और मेरा काम हो गया। लेकिन आम जनता की बाईट नहीं ले पाया। खैर.. अगले दिन कवरेज करना था। और देर शाम हो चुकी थी। अमेठी में रात गुजारने के लिए ठीक ठाक होटल भी नहीं मिला। इसलिए निकल गया सुल्तानपुर जो कि वहां से घंटे भर का रास्ता है। सुबह जल्दी पहुँच सकता हूँ। सुल्तानपुर पहुँचा तो एक फोन आया सर मैं राहुल अमेठी से। मैं अमेठी से किसी राहुल को नहीं जानता था। पशोपेश के बीच उसने बताया कि राज्य सभा टीवी का रेगुलर दर्शक है। मुझे अच्छे से जनता है। मिलना चाहता है और अपने गांव के हालात दिखाना चाहता है। उसने OB के ड्राइवर साहब से मेरा नम्बर लिया था। मैंने अगले दिन मिलने को कहा। मुझे लगा आम जनता से बातचीत हो जाएगी। मौका मिलेगा तो चले चलेंगे। खैर.. अगले दिन हम सुबह गौरीगंज में तैयार थे। रोड शो में समथर्क जुट चुके थे। तय वक़्त निकल चुका था। लेकिन राहुल गांधी अभी नहीं पहुँचे थे। मैं समर्थकों/कार्यकर्ताओं से बात करने लगा।

एक ने दावा किया 5 लाख से जीतेंगे। एक ने प्रधानमंत्री बनने का दावा किया। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता प्रमोद तिवारी भी भीड़ के बीच थे। शायद रोड शो में जिम्मेदार लोगों को कोई संदेश देना था। इसी बीच राहुल गांधी काले रंग की कार में पहुँच गए और रोड शो में उनके लिए तैयार किये गए ट्रक पर चढ़े। थोड़ी देर में उनके साथ बहन प्रियंका गांधी वाड्रा और रॉबर्ट वाड्रा समेत कुछ बड़े कांग्रेसी नेता भी थे। लेकिन जो अटपटा लग रहा था। वो था प्रियंका गांधी के दोनों बच्चों का ट्रक पर होना। आम तौर पर ये बच्चे राजनीतिक गतिविधियों से दूर ही रहते हैं। खैर रोड शो पूरा हुआ। राहुल गांधी नामांकन भर कर लौट गए। मैं राहुल के रोड शो में शरीक एक सज्जन की बाइट ले रहा था। इतने मैं उन सज्जन के खिलाफ आवाज़ आयी। धीरे-धीरे ये कईं हुईं और बुलंद होने लगीं। अब एक तरफ कुछ समर्थक थे। दूसरी तरफ पान, चाय की दुकानों पर बैठे लोग। एक अमेठी के पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस को दोषी मान रहा था तो दूसरा गांधी परिवार के लिए लामबंद था। लेकिन ये मेरी कल्पना से परेय था। मुझे लगता था कि अमेठी में बमुश्किल ही कोई गांधी परिवार के खिलाफ उनके समर्थकों से भिड़ेगा। खास तौर पर जब वो किसी पार्टी से ताल्लुक न रखता हो। मैंने अपने दिमाग मे रेंगते सवाल किया.. क्या ये बहस पहले संभव थी? एक चुपचाप तमाशा देख रहे सज्जन से पूछा। उसका जवाब था कि हरगिज नहीं। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। लोग बनारस के विकास और अमेठी की तुलना करते हैं। ये नज़ारा इन दिनों अमेठी के गांव-गांव में आम है। अमेठी को देखकर समझ आ चुका था कि इस बार राहुल गांधी के लिए अमेठी से अपनी जीत को बरकरार रखना पहले की तरह आसान नहीं होगा। हालांकि अगले दिन रायबरेली पहुँचने पर यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के लिए हालात उतने मुश्किल नहीं दिखाई दिए।

आने वाले चरणों मे मतदान की कवरेज के लिए आगरा पहुँचा। एक ढाबे पर टैक्सी चालक और छात्र गप्प लड़ा रहे हैं। एक ने कहा आगरा से सांसद रहे राम शंकर कठेरिया इस बार यहां से लड़ते तो पक्का गठबंधन जीत जाता। लेकिन एसपी सिंह बघेल यहां अच्छा प्रभाव रखते हैं। मैंने अपना सवाल वहां बैठे लोगों पर उछाला। ये सवाल उत्तर प्रदेश में ही नहीं पूरे देश के लिए यक्ष प्रश्न है। और इसका सही जवाब खोजने की कोशिश की जा रही है। सवाल था कि क्या सपा-बसपा और आरएलडी का वोटर एकजुट हो पायेगा? क्योंकि अगर इनका वोट शेयर सम्मिलित होता है तो निश्चित ही गठबंधन ज्यादातर सीटों पर काबिज़ होगा। वहां बैठे एक टैक्सी वाले ने कहा कि देखो भइया.. पहले पार्टी का कैंडिडेट मायने रखता था। उसकी जाति, पार्टी की जातिगत वोट बैंक को साधा जाता था। लेकिन अब तस्वीर अलग है। हालांकि ये जवाब मेरे सवाल का नहीं था। मैं अपने सवाल के जवाब की तलाश में था। फिरोजाबाद घूमते हुए मुझे शिवपाल यादव की ताकत का अहसास हो गया था। लोग बता रहे थे कि बहुत मेहनत कर रहें हैं वो। विधायक से लेकर कार्यकर्ताओं की एक बड़ी फ़ौज उनके पास है। फिरोजाबाद में ही नहीं बल्कि 5, 6 सीटों पर मजबूती से लड़ रही है प्रगतिशील समाजवादी पार्टी। मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया कि गठबंधन की वो ताक़त जिससे बीजेपी हाशिये पर चली जाय। मुलायम सिंह यादव के परिवार से ही उस पर  चोट हो रही है।

Sonbhadra: Prime Minister Narendra Modi waves at the crowd as Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath and other BJP leaders look on, during an election campaign rally for the Lok Sabha polls, in Sonbhadra, Saturday, May 11, 2019. (PTI Photo)

Sonbhadra: Prime Minister Narendra Modi waves at the crowd as Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath and other BJP leaders look on, during an election campaign rally for the Lok Sabha polls, in Sonbhadra, Saturday, May 11, 2019. (PTI Photo)

फिरोजाबाद से एटा निकल गया। अपने गृहनगर कासगंज भी पहुँचा। ये वही कासगंज है जो 26 जनवरी 2018 को तिरंगा यात्रा में हुई हिंसा के चलते सुर्खियों में आया था। कासगंज आज भी उस बच्चे चंदन की मौत का मातम मनाता है। कल्याण सिंह का क्षेत्र माना जाता है। उनके पुत्र राजवीर सिंह मैदान में हैं। जिस दिन मैं एटा में था उसी दिन प्रधान मंत्री मोदी की रैली होनी थी। पूरा एटा बीजेपी समर्थकों से पटा हुआ था। लेकिन कई बुजुर्ग महिलाएं भी मैदान के बाहर खड़े होकर प्रधानमंत्री को सुनने का इंतज़ार कर रहीं थीं। मैंने पूछा अम्मा क्यों खड़ी हो अंदर चली जाओ। लेकिन भीड़ की वजह से वो अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं। किसी पास के गांव से आयी थी। मोदी की आवाज़ सुनने। एक युवा से मैंने पूछा राजू भइया (राजवीर सिंह) ने कैसा काम किया है। वो बोला मुझे नहीं लगता कि कोई भी उपलब्धि है जो बताई जा सके। लेकिन एक छोटे से अंतराल के बाद बोला। मोदी को जिताना है तो वोट देना ही पड़ेगा। ये सिर्फ एटा नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में जहां भी मैं घूमा हर जगह यही हाल था। हर सीट पर मानो खुद प्रधानमंत्री लड़ रहें हों। हद तो तब हो गई जब मुलायम दद्दा को अपना सब कुछ मानने वाले भी प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की पैरवी करते मिले। वो भी मैनपुरी के ही कुछ यादव लड़के। ये आश्चर्य ही है कि 5 साल में किसी के प्रति भरोसा न सिर्फ बरकरार हो बल्कि उसमें इजाफा ही समझ में आ रहा है।

खैर अब बारी बुंदेलखंड और सेंट्रल यूपी की थी। तो हम पहुँचे कानपुर। एक उजड़े से शहर से लगने वाले कानपुर में ज्यादातर पुरानी फैक्टरियों के खंडहर ही दिखाई देते हैं। मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट की रौनक लाल इमली जैसी फैक्टरियों के बंद होने के साथ ही खत्म हो गयी। लाखों बाहरियों को रोजगार मुहैया कराने वाले शहर के अपने ही बाशिंदे रोजी रोटी के लिए शहर छोड़ रहें हैं। कांग्रेस के नेता श्रीप्रकाश जायसवाल बड़े सियासी रसूख वाले नेता हैं। कांग्रेस और गठबंधन में मुस्लिम वोट के लिए रस्साकशी दिखाई देती है। कुछ मुस्लिम से बात करने के बाद लगा वो श्रीप्रकाश जायसवाल पर ज्यादा भरोसा जता रहें हैं। क्योंकि उनके पास गैर मुस्लिम वोट भी ज्यादा बड़ी तादाद में है। यहां से झांसी जाने का फैसला किया। जब कानपुर की तरफ से आप बुंदेलखंड में प्रवेश करेंगे तो सबसे पहले कालपी पड़ेगा। सदियों से यहां हाथ कागज उद्योग चला आ रहा है। बुनकरी का काम भी होता है। लेकिन विकास के नाम पर सब कुछ सिर्फ कागज़ी ही लगता है। यहां के बारे में कहा जाता है कि यहां जाम में फसे तो घंटे, 2 घंटे या दिन भर से ज्यादा लग सकता है। जिलाधिकारी मन्नान अख्तर की पहल पर ओवरब्रिज बनने का विवाद का निपटारा कर लिया गया है। शायद कुछ महीनों में यहां जाम से निज़ात मिल जाएगी।

कालपी से आगे बढ़ने पर उरई आता है। जिला जालौन का मुख्यालय। शहर में घुसने से पहले ही आपको दाहिनी तरफ बंद पड़ी कई फैक्ट्रियां दिखाई देंगी। इन फ़ैक्टरी में काम करने वालों को मजबूरन महानगरों का रुख करना पड़ा। क्योंकि खेती का भरोसा नहीं, काम मिलता नहीं.. तो पलायन ही जिंदगी जीने का आखिरी रास्ता बचता है। यहां के मजदूर दिल्ली की सड़कों पर मिल ही जाते हैं। पहले काम के बाद आस पास अपने गांव में पहुँच जाते थे। लेकिन अब दिल्ली में सर छुपाने के लिए मकान का किराया कम बुन्देलखंडियो के बस की बात है। आगे बढ़ें तो राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त के गांव चिरगांव होते हुए आप झांसी पहुँचते हैं। दरअसल झांसी एक ऐसी जगह है जहां साहित्य के क्षेत्र में मैथलीशरण गुप्त, वृन्दावन लाल वर्मा, महावीर प्रसाद द्विवेदी और खेल में हॉकी के जादूगर ध्यानचंद जैसे दिग्गजों की जन्मभूमि या कर्मभूमि रही है। क्रांति के बारे में जगजाहिर है कि रानी लक्ष्मीबाई ने 1857 का बिगुल यहीं से फूंका था। पूरे बुंदेलखंड में जगह जगह पर किले, आल्हा, अचरी गाते गायक मिल जाएंगे। पहली नज़र में पिछड़े से दिखने वाले इस इलाके का गौरवशाली अतीत रहा है। हालांकि अब झांसी और पूरे बुंदेलखंड के कई गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़कें  बनी हैं। कच्चे मकानों की जगह ज्यादातर पक्के मकानों ने ले ली है। लेकिन जीवन स्तर में खास बदलाव नहीं दिखता। ये शायद ऐसा अभागा इलाका है जिसके लोग विकास के नाम पर दिल्ली,नोएडा देखकर वापिस आ जाते हैं। यहां के लिए एलान हुआ था कि डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर पहुँचेगा तो तस्वीर बदलेगी। लेकिन शायद वो यूपी की ब्यूरोक्रेसी में लगी जंग की भेंट चढ़ा हुआ है।

खैर.. उमा भारती की सीट पर नए उम्मीदवार के साथ अब बीजेपी इसलिए भी उत्साहित दिखाई दे रही हैं क्योंकि सपा से बुंदेलखंड के मुलायम सिंह कहलाने वाले नेता चंद्रपाल सिंह यादव को टिकट नहीं मिला। जालौन में कई बार सांसद रह चुके भानु प्रताप वर्मा से लोग नाराज़ हैं कि किसी से मिलते जुलते नहीं। लेकिन जो उनके पक्ष में जाता है.. वो है उनकी ईमानदार छवि। जालौन से आगे बढ़ने पर अकबरपुर, कानपुर देहात में जरूर गठबंधन की निशा सचान मजबूत मानी जा रहीं हैं। बीजेपी के पूर्व नेता की पत्नी को बीजेपी के वोटों में सेंध के  साथ ही इलाके का कुर्मी वोट बैंक और गठबंधन की ताकत उनके पक्ष में हैं। चौथे चरण के बाद जब हम लखनऊ पहुँचे तो यहां का मिज़ाज पहले जैसा ही है। बीजेपी की सेफ सीट मानी जाने वाले लखनऊ में आश्चर्यजनक तौर पर मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा तबका बीजेपी का समर्थक है। आम तौर पर जो पूरे प्रदेश में माना जा रहा है वो ये कि जो बीजेपी को हराता दिखेगा उसे मुस्लिम वोट करेगा। लेकिन लखनऊ बाकी इलाकों से अलग है। साथ ही यहां से उम्मीदवार गृह मंत्री राजनाथ सिंह की छवि और हर तबके से उनका जुड़ाव बीजेपी के लिए बढ़त बनाता है। लेकिन लखनऊ से सटे मोहनलाल गंज में मामला उलट है। यहां गठबंधन और बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है।मोहनलाल गंज ग्रामीण क्षेत्र है। लेकिन यहां लिंगानुपात देश के कई हिस्सों से ज्यादा बेहतर है। दिलचस्प ये भी है कि इस सीट पर रिकॉर्ड 8 बार महिला सांसद चुनी जा चुकी हैं। वैसे तो पंसकुरा और इंदौर की लोकसभा सीटों ने भी आठ बार महिला सांसद चुनी हैं, पर ये हर बार गीता मुखर्जी और सुमित्रा महाजन रहीं.लेकिन मोहनगंज में जो महिलाएं चुनी गई वो किसी बड़े सियासी रसूख वाली नहीं रहीं। बल्कि यहां अलग अलग महिलाएं भी चुनी गईं। हालाँकि इस बार यहां महिला के चुने जाने की उम्मीद कम ही है। क्योंकि मुख्य मुकाबले में शामिल किसी दल ने महिला को उम्मीदवार नहीं बनाया है। रायबरेली और अमेठी की बात तो हम पहले ही कर चुके हैं।

Amethi: Congress General Secretary Priyanka Gandhi Vadra waves at the supporters during an election campaign roadshow for the Lok Sabha polls, in Amethi constituency, Wednesday, May 1, 2019. (PTI Photo)

Amethi: Congress General Secretary Priyanka Gandhi Vadra waves at the supporters during an election campaign roadshow for the Lok Sabha polls, in Amethi constituency, Wednesday, May 1, 2019. (PTI Photo)

अब अयोध्या जाने का मन बनाया। अयोध्या जहां से पैदा हुई रामलहर ने बीजेपी को सत्ता के शिखर तक पहुँचाया। लखनऊ से अयोध्या जाते हुए ज़्यादा नहीं.. डेढ़ घंटे का समय लगा। चमचमाती हुई सड़कों से उतर कर जब आप अयोध्या  पहुचते हैं.. और अगर आप पहले यहां आएं हैं.. तो अयोध्या कुछ अलग लगेगी। योगी सरकार ने यहां राम पेढ़ी पर दीवाली को भव्य तरीके से मनाने का फैसला लिया था। जिसके चलते यहां सब रंगा पुता और व्यवस्थित दिखाई देता है। सरयू की धाराओं में भी रौनक सी दिखाई देती है। एक चाय की दुकान पर चुस्की लेते हुए मैंने पूछा कि क्या माहौल है चुनाव का? इतने में वहां बैठे दो दोस्त जिनमें से एक बीजेपी और एक गठबंधन समर्थक था वो भिड़ गए। जब बहस गरम हो गयी तो चाय वाले ने हल्के से अंदाज़ में जज की भूमिका निभाते हुए कहा कि कांग्रेस के पुराने प्रदेश प्रमुख निर्मल खत्री गठबंधन का वोट काट रहे हैं..जेपी के लल्लू सिंह से लोग नाराज़ हैं। लेकिन वो किनारे पर सही जीत ही जायेंगे। अयोध्या में था सोचा देखूं आखिर जो 3 दशकों से भारतीय राजनीति की धुरी बना हुआ है वो राम जन्मभूमि किस हालात में है। तपती दोपहर  किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलने में बाद हम पहुँचे जन्मभूमि के पहले गेट पर। बदकिस्मती से दर्शन के लिए गेट बंद थे। 1 बज रहा था 2 बजे तक इंतजार करना था। एक दक्षिण भारतीय की लड्डुओं की दुकान ठीक गेट के बाहर थी। उससे बातचीत होने लगी। मैंने उससे कहा कि धार्मिक स्थल जैसा महसूस नहीं हो रहा यहां। न घंटे, न भजन कीर्तन वो भी उनकी जन्मभूमि जो कि देश के बहुसंख्यकों के आराध्य हैं। वो दक्षिण भारतीय बोला कि चिंता मत करिए चुनाव हो जाने दीजिए बीजेपी सरकार बन जाने दीजिये। अयोध्या बदल जाएगी। मैंने पूछा क्यों? वो बोला मंदिर बन जायेगा। मैंने मन में सोचा इतने विश्वस्त तो शायद बीजेपी वाले खुद भी नहीं होंगे।

2 बजे जब गेट खुले तो और हैरानी हुई। इतनी सुरक्षा जांच पहले मेरी कभी नहीं हुई। सभी श्रद्धालुओं को 4 सुरक्षा घेरो से निकलना पड़ता है। पिंजरेनुमा रास्ते से अंदर जाना होता है। कुछ लोग जय श्री राम तो बोल रहे थे। लेकिन कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। चलते चलते वो तिरपाल आ गयी जिसके अंदर मूर्तियां रखी हैं। इस वक़्त मैं ये सोच रहा था कि यही वो जगह है जिसकी वजह से पूरा देश में आंदोलन खड़े हुए। मन में कई सवाल कौंध रहे थे। जैसे हिंदुओ को इसी जगह क्यों मंदिर बनाना है। मुस्लिम क्यों एक जगह नहीं दे सकते आखिर देश में कितने मंदिर तोड़ कर मस्जिदें बनाई गईं है। इन्हीं सवालों के बीच मैं बाहर निकल आया। ये वो सवाल हैं जो आम जनमानस के मन में हमेशा उठते हैं। लेकिन इनका जवाब किसी के पास नहीं। अब अयोध्या से निकलकर लखनऊ वापसी थी..कारण..अगले चरण की तैयारी। लेकिन एक बात यहां जरूर कहना चाहता हूं। देश के ज्यादातर राज्यों में चुनाव कवर किये हैं। लेकिन यूपी के नेताओं की तरह वादाखिलाफी नहीं देखी। जनता से नहीं पत्रकारों से भी। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया संभालने वालों की तरफ से बार बार भरोसा दिलाया गया कि साक्षात्कार के लिए..बाकी प्रदेशों में अक्सर हां या ना में जवाब मिल जाता है। खास तौर पर राज्य सभा टीवी के चलते प्राथमिकता भी मिलती है। लेकिन यूपी में हालात अलग हैं। अब बारी थी अगले यानी छठवें चरण की। सुल्तानपुर में खेत में आराम करते हुए कुछ किसानों से बात की। अपनी समस्याओं से अलग हटकर किसान राजनीतिक चर्चा में आ गए। एक ने कहा कि फूल ही निकलेगा

दूसरा बोला कि यहां कबहुँ कौनो औरत नहीं जीती हैं। कुल मिलाकर नतीजा ये निकला कि मुख्य मुक़ाबला गठबंधन और बीजेपी में ही है। सुल्तानपुर से प्रतापगढ़ होते हुए हम पहुँचे प्रयागराज। हाल ही में संपन्न हुए कुम्भ के निशान यहां देखने को मिलते हैं। आज भी एलईडी की रौशनी में रात को भी संगम के किनारे गुलजार रहते हैं।  देर रात तक लोग स्नान, पिकनिक, जॉगिंग करते हैं। रीता बहुगुणा जोशी उत्तर प्रदेश में पर्यटन मंत्री हैं तो उनकी छवि बेहतर हुई है।

अब देखना ये दिलचस्प होगा कि देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाला पूर्वांचल सांतवे चरण में क्या फैसला करता है। एक बात जो इस पूरी कहानी का निचोड़ है.. कि बीजेपी के लिए हालात पिछली बार की तरह नहीं हैं। लेकिन गठबंधन जिस उम्मीद से बना था वो भी पूरी होती नहीं दिखती। दोनों के सभी समर्थक हुक्मे हाकिम की तामील नहीं कर रहें। वहीं कांग्रेस अगर इस बार भी बेहतर प्रदर्शन नहीं करती तो उत्तर प्रदेश में पार्टी के हाथ से बचा कुचा जनाधार भी खिसक जाएगा।