विपदा में सामूहिक जतन

Sandeep Yash
File photo: Healtworkers urging people to stay at home to fight against Corona

File photo: Healtworkers urging people to stay at home to fight against Corona

आज एक वाकये से कहानी शुरू करते हैं। ये बताता है कि किसी भी आपदा में आम आदमी यानी हमारी आपकी भूमिका कितनी एहम हो जाती है। कहानी शुरू होती है इसी बरस जनवरी महीने के अंत में जब कोरोना वायरस का प्रसार अपने पहले चरण में था। चीन के पडोसी देश दक्षिण कोरिया में भी घबराहट फ़ैल रही थी। फिर स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने एक ट्रैन स्टेशन के कॉन्फ्रेंस हाल में 27 जनवरी को 20 से अधिक चिकित्सा कंपनियों के प्रतिनिधियों की मीटिंग बुलाई। इनसे तत्काल  ऐसे टेस्ट किट बनाने को कहा गया जो कोरोना वायरस का पता लगा सके। अधिकारीयों ने कंपनियों से regulatory approval जल्द दिलाने का वादा किया।

हालांकि, रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ उस वक़्त दक्षिण कोरिया में कुल चार ज्ञात मामले थे। 27 जनवरी की बैठक के एक हफ्ते बाद ही एक कंपनी के diagnostic test को मंजूरी मिल गयी। बाकी लाइन में थीं। फरवरी के अंत तक ये देश अपने ड्राइव-थ्रू स्क्रीनिंग केंद्रों और रोज़ हजारों लोगों का परीक्षण विकसित करने की क्षमता के लिए दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहा था। आपकी जानकारी के लिए ट्रेन स्टेशन में हुई बैठक के सिर्फ सात हफ्ते बाद 290,000 से अधिक कोरियाई नागरिक स्वतः अपना परीक्षण करा चुके थे।  इनमे से 8,000 से अधिक संक्रमित पाए गए थे। तो जनाब कोरोना वायरस इस देश में बेकाबू नहीं हो पाया। एक और दिलचस्प बात, दक्षिण कोरिया और अमरीका में पहला केस एक ही दिन।  पर वहा सारे संसाधन होते हुए भी हालात कैसे बदतर होते गए, वो भी विश्व बिरादरी के लिए ज़रूरी सबक है।

इतना ही नहीं, इन्ही हालातों में दक्षिण कोरिया ने आम चुनाव भी सफलता पूर्वक करा डाले। इस देश के नागरिक, विपदा और चुनाव – दोनों ही हालात में देश के लिए एक दूसरे का दामन पकडे नज़र आये। सन्देश साफ़ था कि आम जनता की भागीदारी हो तो कोई भी राष्ट्र किसी भी विकट चुनौती को परास्त कर सकता है – कोरोना वायरस को भी।

एम्स के निदेशक डॉ  रणदीप गुलेरिया के हालिया बयान को इसी नज़र से देखा जाना चाहिए। इन्होने अपील की है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग टेस्ट कराने आगे आएं। पर ऐसा हो नहीं रहा है -क्यों ?

क्यूंकि ऐसे कई किस्से सामने आये हैं जहाँ कोरोना महामारी से मुक्त हुए मरीजों को अछूत माना जा रहा है। पडोसी, मित्र और यहाँ तक कि करीबी रिश्तेदार भी पुरसाहाल लेने का साहस नहीं कर रहे है। ये अवांछित व्यवहार ऐसे परिवारों को भय और घोर मानसिक कष्ट दे रहा है।  और दूसरों को हतोत्साहित कर रहा है।  विडम्बना ये है यही ठीक हुए मरीज़ बड़ी संख्या में अपना प्लाज्मा देकर दूसरे मरीज़ों को संजीवनी भी दे रहे हैं। तो ये लोग उम्मीद और विजय का प्रतीक हैं न कि डर और नफरत के। इनके साथ ही इस बदसुलूकी का शिकार वो लोग भी हो रहे हैं quarantine में रहे हैं पर जिनके टेस्ट नेगेटिव आये हैं।

विशेषज्ञों की माने तो समाज के एक तबके के इसी निंदनीय व्यवहार से डरे हुए लोग टेस्ट कराने आगे नहीं आ रहे हैं। संक्रमित मरीज भी डॉक्टर के पास बिलकुल अंतिम वक़्त पर आ रहे हैं जिससे मृत्यु दर बढ़ रही है। बकौल डॉक्टर गुलेरिया इस महामारी से ग्रसित 80% रोगियों में हल्के लक्षण होते हैं, 15% को ऑक्सीजन थेरेपी से ठीक किया जा सकता है और सिर्फ 5% को ही वेंटिलेटर की ज़रुरत पड़ती है।

वैसे आपकी जानकारी के लिए, छुआछूत, बीमारियों और मौत का सदियों पुराना रिश्ता है। हम आज भी इनसे उतने ही भयभीत रहते हैं जितना हज़ार बरस पहले थे। लांसेट पत्रिका में छपे एक लेख के मुताबिक़ पिछली सहस्त्राब्दी की शुरुआत में ऐसा ही डर कुष्ठ रोग से था। तब इसे यौन रोग माना जाता था। 19 वीं शताब्दी में सिफिलिस भी इस फेहरिस्त से आ जुडी, हालांकि 1940 आते आते इसका इलाज मिला और लोगों का भय मिटा। 80 के दशक में ऐसा ही डर एड्स को लेकर जन्मा। कैंसर और टीबी को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है। इन सभी बीमारियों ने देश-दुनिया, समाज, जाति और धर्म की लकीरें मिटा कर मौत बांटी। और जो बच गए उनका जीवन छुआछूत ने दूभर कर डाला।

“Twelve Diseases that Changed our World, a history of microbiological research into causes of disease” के लेखक इरविन शर्मन कहते हैं कि अपने शोध के दौरान उन्हें बार-बार रोगियों के सामने खड़ी दीवारें देखीं। वो कहते हैं कि “संक्रमित रोगियों के बहिष्कार और उनसे बचने की प्रवृत्ति सारी दुनिया में है। इसके चलते रोगी उपचार से परहेज करते हैं, संक्रमित समूह या समुदाय का पूर्वाग्रहों का शिकार होना आम बात है, कई बार तो उन्हें हिंसा तक का शिकार बनाया जाता है” .

तो कोरोना वायरस जैसी महामारी से कैसे जूझा जाए, कैसे इस कठिन समय में आम आदमी का डर दूर कर इंसानियत को ज़िंदा रखा जाए। एक गाइडलाइन् से कुछ मोटी मोटी बातें आपसे साझा करते हैं। इसे UNICEF और WHO ने बनाया है।

कोविड -19 क्यों छुआछूत के घेरे में है ?
1) यह एक नयी बीमारी है जिसके बारे में हमें पूरी जानकारी नहीं है, शोध में रोज़ नए तथ्य सामने आ रहे हैं
2) हम अज्ञात से डरते हैं
3) उस डर को ‘दूसरों’ के साथ जोड़ना आसान है

इस तस्वीर को हम कैसे बदल सकते है ?
1 सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सही, सटीक और सरल शब्दों में तथ्य साझा करें
2 .लक्षित तबके तक सन्देश भेजने के लिए प्रभावशाली सामाजिक हस्तियों का इस्तेमाल करें
3 .इन लोगों को नायक बनायें – इस महामारी से उबरे लोग, स्वास्थ्य कर्मी, पुलिस कर्मी, साइंटिस्ट वगैरह
4 .अपनी लिखावट में सभी सामाजिक समुदायों के संघर्ष, सहयोग, समर्पण को जगह दें
5 .व्यक्तिगत सूचनाओं और पड़ताल के बजाये संक्रमण के रोकथाम के तरीकों, लक्षणों और स्वास्थ्य की देखभाल जैसी सकारात्मक जानकारी परोसें

तो आज कोरोना जैसी महामारी और उससे जुडी छुआछूत को भी एक जंग के रूप में लेकर परास्त करना होगा। इसके प्रति जागरूकता बढ़ रही है। भारत सहित तमाम देशों की सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और स्वास्थ्य संस्थानों ने ऐसी बीमारी से जुड़े कलंक को ख़त्म करने का अभियान चलाया है।  इसमें पोस्टर प्रदर्शन, रेडियो और टेलीविजन कार्यक्रम, सोशल मीडिया शामिल हैं। वैसे आपकी जानकारी के लिए भारत में 1955 में ही आर्टिकल 17 के तहत अस्पृश्यता या छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है और आज किसी भी रूप में इसका अभ्यास निषिद्ध है। अस्पृश्यता से उत्पन्न कोई भी स्थिति निश्चित तौर पर कानूनन अपराध होगी। जान लीजिये।

आखिर में, सरकार का सीधा सन्देश है – न छुआछूत करिये और न बढ़ावा दीजिये। ये एक बीमारी ही तो है और ये देश ऐसे तमाम कालों से गुज़र चुका है, उबर  चूका है। आपको ये भी समझना होगा कि भारत जैसे विशाल देश में प्रत्येक व्यक्ति का टेस्ट शायद संभव न हो, तो अगर कोरोना के लक्षण दिखें तो स्वतः हस्पताल जाकर टेस्ट कराएं। इस आपदा से निबटने के लिए पिछले एक महीने में देश के अस्पतालों में 3. 5 गुना और आइसोलेशन बेड्स में 3 .6 गुना वृद्धि हुई है। तो सरकार और संसाधन उपलब्ध हैं, तैयार हैं। आप अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे कत्तई न हटें,  दक्षिण कोरिया ताज़ा उदहारण है की ताली दोनों हाथों से ही बजती है। और विपदा सामूहिक जतनो से कटती है।