विश्व धर्म संसद में सनातन

Sandeep Yash
Vivekananda on the platform at the Parliament of Religions, September 1893

Vivekananda on the platform at the Parliament of Religions, September 1893

जब भी भारत की प्राचीन सभ्यता और स्वाभिमान की बात होती है तो स्वामी विवेकानंद की शिकागो स्पीच का हवाला ज़रूर दिया जाता है। ये स्पीच उन्होने 11  सितम्बर, 1893 को विश्व धर्म संसद में भारत और सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए दी थी।  यह दुनिया भर के धर्मों का पहला जमावड़ा था।

कम ही लोग जानते हैं कि स्वामी जी को यहां तक पहुंचने में तमाम कांटे हटाने पड़े थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में इसकी 125 वीं जयंती पर खूब कहा था कि ” 9/11, 2001 का ज़िक्र तो अक्सर होता है लेकिन 1893 में एक और 9/11 हुआ था जिसे भारत बड़े गर्व से याद करता है ” तो आज इस उदात्त सम्बोधन की 128 वीं सालगिरह पर यादों के कुछ पन्ने पलटते हैं।

शिकागो संसद से पहले इन्हें मूल नाम नरेन्द्रनाथ दत्त और धार्मिक नाम सच्चिदानंद के तौर पर जाना जाता था।
नरेन्द्रनाथ की अध्यात्म यात्रा इन्हें रामकृष्ण परमहंस तक ले आयी थी।
मुक्ति लेते वक़्त रामकृष्ण ने अपनी सम्पूर्ण आध्यात्मिक एवं सनातनी विरासत नरेन्द्रनाथ को सौंप दी थी।


इसके बाद नरेन्द्रनाथ देश भ्रमण पर निकल पड़े और वेदांत का प्रचार करने लगे।
ये वो दौर था जब शिक्षित भारतीय पश्चिम की चमक दमक में लिप्त हो अपनी प्राचीन विरासत भूलते जा रहे थे।
तब नरेन्द्रनाथ ने विदेश जाकर सनातन विचारधारा का प्रचार करने की सोची।
इसी दौरान शिकागो में होने वाली विश्व धर्म संसद की सूचना मिलने पर इन्होने वहा जाने का निश्चय किया।
पर भारत से शिकागो की यात्रा में काफी पैसे लग रहे थे जो इनके पास नहीं थे।
यहाँ इनकी मदद की राजस्थान की खेतड़ी रिसायत के राजा अजीत सिंह ने।
राजा अजीत सिंह सहित कई शुभचिंतकों ने इस ऐतिहासिक यात्रा का खर्च उठाया था।

यहां एक दिलचस्प बात, जयपुर स्टेशन तक नरेन्द्रनाथ को विदा करने आये खेतड़ी नरेश ने सवाल किया था कि अमरीका में वो किस नाम से अपना परिचय देंगे।  नरेन्द्रनाथ के पास इसका जवाब नहीं था। इस पर खेतड़ी नरेश ने स्वामी विवेकानंद नाम सुझाया जो नरेन्द्रनाथ को रास आया था । और इस तरह जन्मा था वो  विराट आध्यात्मिक, सनातनी सूर्य जो आज भी भारत का नाम विश्वपर्यन्त आलोकित कर रहा है।

खैर, तो 31 मई, 1893 को ये समुद्र के रास्ते बम्बई से रवाना हुए और जुलाई के पहले हफ्ते अमरीका पहुंच गए।
पर धर्म संसद शुरू होने में समय था और शिकागो की कड़क ठण्ड और महंगाई से ये काफी परेशान हो गए थे।
इस दौरान इन्हें रेल के डिब्बे में सोना पड़ा था, खाने के लिए भीख तक मांगनी पड़ी थी।
फिर खर्च बचाने के लिए स्वामी जी शिकागो से बोस्टन चले आये थे।
एक समस्या और थी, इनके पास इस संसद में हिस्सा लेने के लिए कोई आधिकारिक अनुमति भी नहीं थी।
इस समस्या का निराकरण किया था हारवर्ड विश्विद्यालय के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट ने।
बोस्टन में स्वामी जी को आश्रय दिया था केट सनबॉर्न ने।
स्वामी जी संसद शुरू होने से एक दिन पहले शिकागो वापस आ गए थे।
अगले दिन इतिहास बनने वाला था।

11 सितम्बर को दोपहर में माँ सरवती का ध्यान कर इन्होने अंग्रेजी में अपना सम्बोधन कुछ ऐसे शुरू किया था।

”It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. I thank you in the name of the most ancient order of monks in the world; I thank you in the name of the mother of religions, and I thank you in the name of millions and millions of Hindu people of all classes and sects.”

30 वर्षीय स्वामी जी के भाषण समापन के बाद उठी तालियों की लहर को रुकने में दो मिनट लगे थे। अख़बारों की कतरने बताती है की कैसे स्वामी जी और भारत -दोनों ही इस धर्म संसद के सिरमौर होकर उभरे थे। संसद के समापन सत्र में इन्होने मानव कल्याण के लिए धार्मिक सहिष्णुता और संयम को केंद्र में रखा था।

”If the Parliament of Religions has shown anything to the world, it is this: It has proved to the world that holiness, purity and charity are not the exclusive possessions of any church in the world, and that every system has produced men and women of the most exalted character. In the face of this evidence, if anybody dreams of the exclusive survival of his own religion and the destruction of the others, I pity him from the bottom of my heart, and point out to him that upon the banner of every religion will soon be written in spite of resistance: “Help and not fight,” “Assimilation and not Destruction,” “Harmony and Peace and not Dissension.”

जानकार इस कालजयी सम्बोधन की खासियतें कुछ ऐसे बताते हैं – धर्म को तार्किक शक्ति और विज्ञानं से जोड़ना, छवियां ईश्वर एवं सत्य तक पहुंचने का मार्ग भर हैं, सभी धर्मों के प्रति स्नेह, सम्मान होना, धर्मिक आस्था का विश्लेषण करना और ये कि एक बहुसांस्कृतिक विरासत उदार राष्ट्रवाद का प्रतीक है ।

जाते जाते
स्वामी जी ने इस पूरे दौरे में केसरिया वस्त्र ही पहना था। अज्ञानतावश, स्थानीय लोग इनका मज़ाक उड़ाते थे।  यहाँ एक ऐसे ही प्रसंग से चर्चा समाप्त करते हैं। हुआ ये कि पार्क में टहलते वक़्त इन्हें एक महिला ने रोका और व्यंग कस्ते हुए इनसे भद्र लोक की पोशाक पहनने को कहा।  स्वामी जी ने बड़ी शालीनता से इस धृष्टता का जवाब दिया था ”आपकी संस्कृति में भले भद्र लोक की पहचान एक दर्जी तय करता हो पर भारत में इसकी पहचान सदचरित्र से होती है। उस महिला के पास फिर इसका कोई जवाब नहीं था।

देश को एक अमिट विरासत देकर स्वामी जी ने मात्र 39 बरस की उम्र में 4 जुलाई, 1902 (बेलूरमठ) को महासमाधि ले लिए थी।