शरीयत कोर्ट को क़ानूनी दर्जा नहींः सुप्रीम कोर्ट

RSTV Bureau

muslim_indiaसुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने एक अहम फ़ैसले में कहा कि शरीयत अदालतों को कानूनी मान्यता नहीं है, और कोई भी शरीयत कोर्ट तब तक किसी व्यक्ति के बारे में फ़तवा जारी नहीं कर सकता जब तक व्यक्ति खुद ही किसी दारुल क़ज़ा के पास न जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमे कोई संदेह नहीं कि ऐसी अदालतों का कोई कानूनी दर्जा नहीं है. न्यायालय ने कहा कि कुछ मामलों मे शरीयत अदालतों ने ऐसे फ़ैसले जारी किए है जो मानवाधिकारों का उल्लघंन करते है.

सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष लोगों के ख़िलाफ़ शरीयत कोर्ट द्वारा दिए गए फ़ैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कोई भी धर्म बेगुनाह लोगों को प्रताड़ित करने की इजाज़त नहीं देता है.

जस्टिस सीके प्रसाद की बेंच ने कहा कि किसी बेगुनाह को सज़ा देना सभी धर्मों के ख़िलाफ़ है. कोर्ट ने कहा कि फ़तवा किसी शख़्स के मौलिक अधिकारों और निजता को क्षति पहुंचा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला दिल्ली के एक वक़ील विश्व लोचन मदन की याचिका पर दिया है. लोचन मदन ने अपनी याचिका में दारुल क़ज़ा एवं दारुल इफ़्ता जैसी संस्थाओं द्वारा इस तरह की अदालते चलाने को चुनौती दी थी. ये अदालतें मुस्लिम समाज के सामाजिक एवं धार्मिक मामलों में दखल रखती हैं.

सभी पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा यह बात पहले ही कही जा चुकी है कि फ़तवा महज़ एक राय है. किसी व्यक्ति पर कोई फ़तवा थोपने का किसी मुफ़्ती के पास कोई अधिकार नहीं है.

गौरतलब है कि शरीयत के फ़ैसले को हमेशा से चुनौतियां मिलती रही हैं. बोर्ड ने कहा कि यदि फ़तवा किसी व्यक्ति पर उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ थोपा गया है तो वह व्यक्ति फ़तवे के ख़िलाफ़ कोर्ट जा सकता है.