श्री सुरेन्द्र निहाल सिंह

सुरेंद्र निहाल सिंह पत्रकारिता जगत के उन वरिष्ठ व्यक्तियों में से हैं जिन्होने पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक के समय को गौर से देखा, और दुनिया को दिखाया है।
एस निहाल सिंह का जन्म 30 अप्रैल 1929 में हुआ। पिता गुरुमुख निहाल सिंह जाने माने शिक्षाविद और मां श्रीमती लक्ष्मी देवी गृहणी थी। सुरेंद्र जी के 2 भाई और 4 बहने थी। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुरोध पर गुरूमुख निहाल सिंह जी ने ही बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में राजनीतिक शास्त्र विभाग की नीव रखी। हालांकि बाद में वो सक्रिय राजनीति में भी आये और दिल्ली के पहले मुख्य मंत्री बने।

एस निहाल सिंह की प्रारंभिक शिक्षा बनारस और अहमदाबाद के सेंट जेवियर्स से हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होने अग्रेज़ी में ऑनर्स किया।

पत्रकारिता के सफर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया में अप्रेन्टिसशिप के साथ हुई। इसके बाद उन्होने द स्टेट्समैन में बतौर रिपोर्टर काम करना शुरु कर दिया। अंग्रेजी पर उनकी अच्छी पकड़ और उनकी मेहनत को देखते हुए, पेपर में उन्हे एक कॉलम लिखने को दिया गया.. Yesterday in Delhi. इस कॉलम को पाठको ने काफी पसंद किया। द स्टेट्समैन में रहते हुए ही उन्हे अमेरिका में बॉस्टन के पास मैसेच्यूसेट्स के क्वींसी कॉलेज में फेलोशिप के लिए भेजा गया।

स्टेट्समैन में उन्होने विदेशों में जाकर रिपोर्टिंग की। 60 और 70 के दशक के दौरान इंडोनेशिया, सिंगापुर और वियतनाम जैसी जगहों पर चल रही राजनीतिक उठापटक को उन्होने बखूबी रिपोर्ट किया। उनकी रिपोर्ट्स की ख़ासियत ये रही कि उन्होने घटनाओं के साथ साथ उसकी पृष्ठभूमि से भी हिन्दुस्तानी पाठकों को अवगत कराया। साथ ही उन्होने इन घटनाओं में जबरदस्ती “Indian angle” नही डाला। इसी वजह से उनकी वो रिपोर्ट्स आज भी पत्रकारों के लिए एक “Style Book” जैसी हैं।

इसबीच वो सफलता के पायदानों पर चढ़ते चले गए। पहले वो दिल्ली में स्टेट्समैन के Resident Editor बने और फिर 1975 में आपातकाल लगने के तुरंत बाद उन्हे पेपर का चीफ एडिटर बना कर कोलकाता भेज दिया गया।

1979 में उन्होने द स्टेट्समैन से इस्तीफा दे दिया और 1981 में उन्होने इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक बने। हालांकि रामनाथ गोयनका से वैचारिक मतभेद होने के बाद उन्होने अखबार सवा साल में ही छोड़ दिय़ा।

1982 वो न्यूयॉर्क गए जहां उन्होने कारनेगी एनडावमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस में फेलोशिफ की, जहां उन्होने भारत और सोवियत संघ के संबंधों पर किताब लिखी जो The Yogi and The bear के नाम से प्रकाशित हुई।

इसके बाद को पेरिस गए और यूनेस्कों में फेलोशिप की.. जहां उन्होने The rise and the fall of UNESCO लिखी।

भारत वापस आने पर विजयपत सिंघानिया ने उनसे सम्पर्क किया और एक अखबार निकालने का जिम्मा सौंपा। सिंह साहब ने इस अखबार को लॉन्च करने के लिए एक साल की कड़ी मेहनत की। The Indian Post नाम को ये अखबार लॉन्च भी किया गया, लेकिन सिंघानिया साहब को अखबार का स्वरूप, कारोबारी लिहाज़ से सही नहीं लग रहा था। करीब 3 महीने बाद ही सिंघानिया साहब ने सिंह साहब को खबरों को मसालेदार और हल्का करने की बात कही। सिंद्धान्तो के पक्के सिंह साहब ने विनम्रता के साथ अखबार से दामन छुड़ा लिया।

इसके बाद वो दुबई में खलीज टाइम्स के सम्पादक बने जहां से उन्होने 1999 में इस्तीफा दिया। सिंह साहब आज भी ज्वलंत विषयों पर अखबारों और मैगज़ीन्स में लेख लिखतें हैं।

एस निहाल सिंह ने समय समय पर किताबों के जरिये भी घटनाओं और परिवेशों का विस्तृत उल्लेख किया है। उनकी कुछ ख़ास किताबें हैं Malaysia ..A commentary, Rocky Roads Of Indian democracy, Indian days Indian nights, Ink in my veins और हाल ही में आयी उनकी किताब The Modi Myth.

अगर सुरेन्द्र निहाल सिंह जी की व्यक्तिगत जिंदगी पर नज़र डालें तो कॉलेज के दौरान अभिनय में उनकी बड़ी रूचि थी। उन्होने कई नाटको में लीड रोल किए। उन नाटकों की तस्वीरें और कटिंग्स आप हमारी वेबसाइट पर देख सकतें हैं।

80 के पड़ाव को पार कर चुके सिंह साहब की यादाश्त कभी कभी साथ नहीं देती… मसलन जब हमने उनसे पूछा कि आपने कितनी किताबें लिखीं हैं तो उन्हे गिनती याद नहीं थीं… हालांकि जैसे ही हमने उनकी पत्नी खेर्चेज़ ज़ाइडरवेज़ से पहली मुलाकात के बारे में पूछा… तो उनकी यादाश्त बिजली की तरह तेज़ निकली .. “वो 2 मई 1954 की शाम थी। दिल्ली की डच एम्बेसी की छत पर पार्टी थी और वो उस पार्टी में सबसे खूबसूरत लड़की थीं।“ पहली नज़र का ये प्यार 4 नवम्बर 1957 को शादी के बंधन में बंध गया।

सिंह साहब का दूसरा प्यार है संगीत… उन्हे वेस्टर्न क्लासिकल ख़ास तौर से अच्छा लगता है। बीथोवन और मोत्जार्ट की सिंफनियों का एक बड़ा कलेक्शन उनके घर में देखा जा सकता है।
थोड़े दिनों पहले पत्नी के गुज़र जाने के बाद सिंह साहब के साथी किताबें और संगीत हैं। वो अपनी पूरी लाइब्रेरी पंजाब विश्वविद्यालय को दान कर चुके हैं।

सिंह साहब को पसंद नहीं कि उन्हे एक वृद्ध की तरह देखा जाए.. वो आज भी काफी तेज़ चलते हैं… उनकी बातों जहां इतिहास है तो उनकी आंखों में भविष्य के सपने भी देखे जा सकते हैं।