संसद के मॉनसून सत्र में सरकार के अच्छे दिन नहीं

Shyam Sunder

PM-and-Sushma-2सरकार बेशक अच्छे दिन लाने का दावा करे लेकिन मॉनसून सत्र में उसके अपने अच्छे दिन नज़र नहीं आ रहे हैं. बीजेपी ने व्यापम घोटाले और ललित मोदी मामले में शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे या सुषमा स्वराज के इस्तीफ़ा लेने से मना कर दिया है. इसके बाद यह साफ़ है कि मॉनसून सत्र को चलाने के लिए कोई बीच का रास्ता निकलना अब नामुमकिन है. मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस व्यापम मामले पर लगातार हमलावर है. पार्टी के बड़े नेता और प्रवक्ता लगातार प्रैस कॉंफ्रेंस कर रहे हैं. पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी साफ कह चुके हैं कि कांग्रेस पार्टी संसद में इन मुद्दों को ज़ोर शोर से उठाएगी. राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आज़ाद भी कह चुके हैं कि संसद चलाने की पूरी ज़िम्मदारी सरकार की है.

सरकार की तरफ से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद चलाने में सहयोग की अपील की है. उन्होने कहा कि वो विपक्ष की मांग पर हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार हैं. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों के इस्तीफ़े की ऐसी शर्त रख दी है जिसको पूरा करने को बीजेपी तैयार नहीं है.

इस सत्र में सरकार कई अहम बिल पास करना चाहती है. जीएसटी और भूमि अधिग्रहण के अलावा श्रम सुधारों से जुड़े कई अहम बिल भी एजेंडे में शामिल हैं. इसके अलावा जुवैनाईल जस्टिस बिल को राज्यसभा से पास कराना है.

विपक्ष के अलावा अपने कुछ सहयोगियों का साथ ना मिलने से भूमि अधिग्रहण बिल को सरकार फ़िलहाल ठंडे बस्ते में डालने को तैयार है. इस बिल पर स्लैक्ट कमेटी की रिपोर्ट सत्र के पहले सप्ताह में ही आनी थी. लेकिन अब कमेटी संसद से और समय मांग सकती है. अलबत्ता जीएसटी संविधान संशोधन बिल पर सरकार को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के समर्थन की ख़बर हैं. लेकिन जो हालात नज़र आ रहे हैं यह बिल भी अधर में ही लटक सकता है.

श्रम सुधार क़ानूनों पर भी सरकार की तरफ से पहल की गई है. इस सिलसिले में वित्त मंत्री अरुण जेटली के नेतृत्व वाले मंत्री समूह ने ट्रेड यूनियन के नेताओं से मुलाक़ात की. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन के नेताओं को चाय पर बुलाया. लेकिन इन मुलाक़ातों में कोई हल नहीं निकल पाया. ट्रेड यूनियन अभी भी 2 सितंबर को एक दिन की हड़ताल पर जाने के अपने फ़ैसले पर क़ायम हैं. इन ट्रेड यूनियनों में आरएसएस की ट्रेड यूनियन बीएमएस भी शामिल है.

Shivraj-Singh-Chouhanस्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आए नरेन्द्र मोदी के लिए राज्यसभा में कठिन चुनौती है. जंहा सरकार कांग्रेस पार्टी को याद दिला रही है कि जो विधेयक सरकार पास कराना चाहती है, असल में उनमे से अधिकतर विधेयक यूपीए के हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी का कहना है कि यूपीए 2 के ज़माने में बीजेपी ने संसद में अवरोध को लोकतंत्र का अहम हिस्सा बताया था.

नरेन्द्र मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण और दूसरे अहम बिलों पर फ़िलहाल अध्यादेशों से काम चलाने को तैयार है. सरकार अभी संसद के संयुक्त सत्र बुलाने के पक्ष में राय नहीं बना पाई है. हालांकि कई बार सरकार की तरफ से एसे संकेत दिए ज़रूर गए हैं. संसद के संयुक्त सत्र में तकनीकी चुनौतियों के अलावा अगले चार साल के लिए विपक्ष से टकराव तय कर लेने का ख़तरा भी शामिल है.

लेकिन अगर सरकार संसद में क़ानून नहीं बना पाती है तो भी उसके लिए मुश्किल है. सरकार का ईड़ ऑफ डूइंग बिज़नेस और मेक इन इंडिया के नारे क़ानून में बदलाव के बिना संभव नहीं हैं. सरकार अध्यादेशों का सहारा ले सकती है. लेकिन अध्यादेशों से उस पॉजिटिव बिजनेस सैंटीमेंट को लंबे समय तक बरक़रार रखना संभव नही है, जिसका दावा बीजेपी ने 2014 की जीत के बाद किया था.