सबला

Sandeep Yash
New Delhi: Mountaineers Tashi Malik and Nungshi Malik receive 'Nari Shakti Puraskar 2019' on International Women's Day from President Ram Nath Kovind as Union Minister Smriti Irani looks on, at Rashtrapati Bhavan Cultural Center in New Delhi, Sunday, March 8, 2020. The Malik sisters became the first twin sister to conquer Mount Everest in 2013 and are holders of 6 Guinness World Record. (PTI Photo)

File Photo

नमस्कार, स्वतंत्रता दिवस से जुडी इस सीरीज में आज चर्चा करेंगे महिला सशक्तिकरण की। अक्सर कहा जाता है कि एक सभ्यता, उसकी प्रगति और उसकी कमियों को समझने का सबसे अच्छा तरीका है उस समाज से जुडी महिलाओं की स्थिति को समझना।  भारतीय महिलाओं ने एक बेटी, पत्नी और माँ  के रूप में अपनी भूमिका को संतुलित करते हुए ऋग वैदिक काल में ऋषियों और विद्वानों से लेकर सशस्त्र बलों, आईटी क्षेत्र, राजनीति, उद्योग और तमाम महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक लंबा सफर तय किया है।

आधी आबादी के लिए यह यात्रा आसान नहीं रही है। अपने स्वतंत्र वजूद के लिए महिलाओं को पारंपरिक पुरुष-प्रधान समाज से मुद्दतों संघर्ष करना पड़ा।  तो

चलिए इस सफर से जुड़े कुछ एहम पड़ाव देखते हैं

–  ऋग्वेदिक काल में स्त्रियां सभा और समिति की सदस्य हुआ करती थीं।

–  प्राचीन काल में महिलाओं का सबसे पहला समूह “भिक्कुनी संघ” महात्मा बुद्ध ने बनाया था। बुद्ध के अनुसार महिलाएं भी उनकी शिक्षाओं (धम्म) के
व्यवस्थित अभ्यास से निर्वाण प्राप्त कर सकती थी।  उस युग में समानता और न्याय की दिशा में ये एक अभूतपूर्व कदम था।

-19 वीं शताब्दी को कई मायनो में ऐतिहासिक माना जा सकता है।  इस दौर में कई राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन जन्मे जिन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार किया।  राजा राम मोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महात्मा फुले, महर्षि कर्वे जैसे समाज सुधारकों ने महिलाओं का दमन कर रहे शिक्षा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह और सती प्रथा जैसे मुद्दों पर बहुत संघर्ष किया था। विद्यासागर, वीरसलिंगम और गुरुजादा अप्पाराव के प्रयासों से विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया था।  इसी दौर में ब्रिटिश राज के चलते भारत, पश्चिमी दुनिया के करीब आ गया था।

– 1848 में भारत को सावित्रीबाई फुले के रूप में पहली महिला शिक्षक मिली। यह बरस महिला सशक्तिकरण के उत्थान का प्रतीक माना जाता है क्यूंकि
सावित्रीबाई फुले ने उस रूढ़ि को सिरे से ख़ारिज किया था कि एक महिला को शिक्षित नहीं किया जा सकता।

–  स्वतंत्रता आंदोलन ने महिलाओं को आगे लाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महिलाएं घरों से बाहर आईं और अपनी क्षमता का एहसास कराया। रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हज़रत महल, कस्तूरबा गाँधी, ऐनी बेसेंट, कमला नेहरू, सरोजिनी नायडू, उषा मेहता, सरला देवी, कुमुदिनी मित्तर, सुशीला देवी, हर देवी और आर्य समाज से जुड़ी महिलाएँ इस राष्ट्रीय यज्ञ में आहुति देती रहीं।

– एनी बेसेंट 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनी। इन्होने वाराणसी और मद्रास में बालिकाओं के लिए स्कूल स्थापित किए और शिक्षा को प्रोत्साहित किया।

– सरला देवी चौधरानी ने 1901 में स्ट्राइक भारत महामंडल की स्थापना की थी।
महिला समाज की स्थापना 1908 में अहमदाबाद में और 1913 में मैसूर में की गई थी।
1917 में भारतीय महिला संघ की स्थापना हुई।
1925 में राष्ट्रीय महिला परिषद की स्थापना
1927 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना हुई।

इन सारे संगठनो का लक्ष्य महिला शिक्षा, बाल विवाह, पर्दा, बहुविवाह, परिवारों में महिलाओं की स्थिति सुधारना, उनको संपत्ति, विरासत और स्वामित्व के अधिकार दिलाना और अनैतिक देह व्यापर से मुक्ति दिलाना था।

– 1925 और 1935 के एक्ट्स के माध्यम से अंग्रेजों ने राजनीतिक सुधार लागू किये थे और महिलाओं को सीमित मताधिकार दिए गए थे।  इसी आधार पर साठ लाख महिला मतदाताओं ने विधान परिषदों में छत्तीस सीटें जीतीं थी। डॉ पूनम डुकोस 1925 में त्रावणकोर की पहली महिला राज्य स्वास्थ्य मंत्री हुईं और विजय लक्ष्मी पंडित 1937 में संयुक्त प्रांत (UP) में स्थानीय स्वशासन मंत्री बनी थीं।

– (आज़ादी के बाद)

– संविधान निर्माताओं ने महिला सशक्तिकरण के लिए कई सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रावधानों को भारतीय संविधान में को शामिल किया था।

– जनवरी, 1950 में भारतीय गणराज्य की स्थापना के साथ ही महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया गया।

कुछ ख़ास अनुच्छेद जो महिला सशक्तिकरण को मजबूती देते है

– कानून के समक्ष समानता और समान सुरक्षा (अनुच्छेद 14)

– राज्य, धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करेगा। राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए कोई भी प्रावधान बनाने का अधिकार है।  (अनुच्छेद १५)

– सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता। (अनुच्छेद १६)

– आजीविका कमाने के लिए पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार (अनुच्छेद 39 (ए)

– महिलाओं के लिए काम और मातृत्व के लिए सुरक्षित माहौल (अनुच्छेद ४२)

– पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करना (अनुच्छेद 44)

– महिलाओं की गरिमा का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है (अनुच्छेद ५१ ए (ई)

इनके अलावा कुछ विशेष कानून भी महिला सशक्तिकरण के लिए बनाये गए है

शादी से जुड़े हुए कानून

– Special Marriage Act, 1954
-Hindu Marriage Act, 1955
– Dowry Prohibition Act, 1961
– Hindu Adoption and Maintenance Act, 1955
– Prohibition of Child Marriage Act 2006
– The Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019

संपत्ति से जुड़े कानून
– The Hindu Succession Act, 1956
– Equal Remuneration Act, 1976
– Hindu Succession (Amendment) Act, 2005.

हिंसा निरोधक कानून
– Commission of Sati (prevention) Act, 1987.
– Immoral Traffic (Prevention) Act, 1986
-The Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
– Indecent Representation of Women (Prohibition) Act, 1986
– Homicide for Dowry, Dowry Deaths or their attempts (Sec. 302/304-B IPC)
– Torture, both mental and physical (Sec. 498-A IPC)
–  Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act 2013

महिला कल्याण के लिए विशेष पहल
– National Commission for Women
– Reservation for Women in Local Self -Government
– The National Plan of Action for the Girl Child (1991-2000)
– National Policy for the Empowerment of Women, 2001

अंतरष्ट्रीय स्तर पर, 1967 में संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि महिलाओं से भेदभाव मानवीय गरिमा के खिलाफ अपराध है।  उसने सदस्य देशों से ऐसे कानूनों, रीति-रिवाजों, विनियमों और प्रथाओं को खत्म करने को कहा जो महिलाओं से भेदभाव करते हैं। 1979 कन्वेंशन में UNGA ने महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर प्रस्ताव पारित किया था।  इसमें माना गया कि तमाम सघर्षो, पहलों के बाद भी महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिले हैं।

आपकी जानकारी के लिए आधुनिक काल में एक अवधारणा के तौर पर महिला सशक्तिकरण की शुरुआत 1985, नैरोबी में संयुक्त राष्ट्र के तीसरे विश्व सम्मेलन में की गई थी।

हाल के बरसों में महिला सशक्तिकरण एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है और भारत ने महिलाओं के समान अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और मानवाधिकार सिद्धांतों पर मोहर लगायी है।  इसमें 1993 में हुआ Convention on the Elimination of all Forms of Discrimination Against Women (CEDAW) शामिल है।

फिलहाल, पिछले कुछ बरसों में भारत सरकार ने कमजोर और हाशिए पर पड़ी महिलाओं के लिए की कई पहल की हैं।

जननी सुरक्षा योजना
प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना
स्वाधार
सर्व शिक्षा अभियान
प्रधानमंत्री मातृ सहयोग योजना
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम
इंदिरा आवास योजना:
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तो एक नज़र

-9 मार्च, 2010 को राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ने की चर्चा आम है। इस विधेयक में महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33 % आरक्षण देने का प्रावधान है। पर ये विधेयक अभी मुकम्मल कानून नहीं बना है

– समाज में महिलाओं की स्थिति समझने के चुनींदा पैमाने हैं – लिंग अनुपात, साक्षरता, स्वास्थ्य, कार्य और रोजगार, शारीरिक, यौन और मनोवैज्ञानिक हिंसा, आर्थिक निर्णय लेने और राजनीतिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी वगैरह

– भारत सरकार ने 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया था।  राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण नीति भी इसी बरस पारित की गई थी।

– इतिहास में महिलाओं के मुद्दों और उनके समाधानों को लेकर अपने पद से इस्तीफा देने वाले एकमात्र राजनेता डॉ आंबेडकर थे, क्योंकि संसद ने उनके ‘हिंदू कोड बिल’ को स्वीकार नहीं किया था जिसमें ये विषय प्रमुख रूप से शामिल थे।

– World Economic Forum द्वारा जारी Global Gender Gap Index (2020) में कुल 153 देशों में भारत का स्थान 112 रहा।  इसका सन्देश ये है की
महिला सशक्तिकरण की डगर लम्बी है। अभी हमें काफी काम करना है

– सनद रहे, Economic Survey 2017-18 ने फिर भारतीय समाज में बेटे की चाहत को इंगित किया है और कहा है कि बालिकाओं में भेदभाव बचपन से ही शुरू हो जाता है

-ORF की 2017 में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 14 से 49 आयुवर्ग में 51% महिलाओं को एनीमिया से पीड़ित पाया गया, जो प्रसव को कठिन और खतरनाक बनाता है।

– BRICS देशों के मुकाबले भारत का महिला श्रमबल 26 % है जिसे बढ़ाने की काफी संभावना है

–  आर्थिक सशक्तिकरण के लिए – महिला केंद्रित गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, माइक्रो क्रेडिट, महिलाओं की दृष्टि से आर्थिक और सामाजिक नीतियों को डिजाइन करना, वैश्वीकरण के नकारत्मक प्रभाव से महिलाओं को बचाना, कृषि एवं उद्योग क्षेत्र में आधी आबादी की भागीदारी बढ़ाना,

– अंतराष्ट्रीय महिला दिवस का प्रस्ताव 1910 में कोपेनहेगेन में हुए दुसरे अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी महिला सम्मेलन में क्लारा जिकिटिन ने रखा था।  ये प्रस्ताव  8
मार्च, 1857 को न्यूयॉर्क में महिला दर्ज़ियों द्वारा की गयी हड़ताल की स्मृति में रखा गया था।  संयुक्त राष्ट्र ने 1975 से इसे मनाना शुरू किया था।

– 1945 में बना संयुक्त राष्ट्र का चार्टर पहला कानूनी दस्तावेज है जो सभी मनुष्यों में समानता की बात करता है और सेक्स के आधार पर भेदभाव की खिलाफत करता है।

-इस बरस के यूनियन बजट में
* मुद्रा योजना के तहत महिलाएं 1,00,000 रुपये तक का ऋण ले सकेंगी
* प्राथमिक शिक्षा स्तर पर नामांकन अनुपात लड़कों के लिए 89.28% लड़कियों के लिए यह 94.32% है
* हायर सेकेंडरी में लड़कियां 59% से अधिक हैं जबकि लड़के 57% रहे
* प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना ’के लिए 2,500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है
* पोषण संबंधी कार्यक्रमों के लिए 35,600 करोड़ आवंटित किए गए
* बेटी बचाओ, बेटी पढाओ ‘बड़ी सफलता’, महिला-कार्यक्रमों के लिए 28,600 करोड़ रुपये

-IMF के मुताबिक़ भारत में लैंगिक समानता 2025 तक जीडीपी में 700 अरब डॉलर जोड़ सकती है
– महिलाएं अपनी आय का 90 प्रतिशत हिस्सा अपने परिवारों पर खर्च करती हैं
– महिला उद्यमी लाभार्थियों का MUDRA योजना में लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा हैं।
– 2004 में महिलाओं का श्रमबल में 35 % हिस्सा था, 2019 में ये घट कर 29% था
-अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ प्राइवेट सेक्टर महिलाओं के कौशल विकास और नौकरियों के बीच की खाई को पाटने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं
– 2020 में भारत का लिंगानुपात 924 /1000 था, जनसँख्या में 48 % महिलाएं थीं जिनकी साक्षर दर लगभग 54% थी
– आज भारत में 14 लाख महिला पंचायत नेता है
-IMAI की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में लगभग 11 करोड़ महिला नेट उपभोगता हैं जो 46% की रफ़्तार से बढ़ रही हैं
– IT -BPM सेक्टर में 12 लाख महिलाएं कार्यरत हैं

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चलते चलते
नीति आयोग के मुताबिक़ महिला श्रमबल के जुड़ने से भारत की अर्थव्यवस्था 10% सालाना दर से ज़्यादा पनप सकती है।  तो कह सकते हैं की महिला सशक्तिकरण देश के लिए शुभ और मंगलकारी है।

आज बस इतना ही।