सरोगेसी बिल पर कई सवाल

healthयह तो स्वागतयोग्य है कि किराए पर कोख के चलन (सरोगेसी) को सरकार ने विनियमित करने का फैसला किया है. लेकिन इसके लिए जिस विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी, उसके कुछ प्रावधानों से देश में वाजिब अंदेशे भी उठे हैँ. सवाल यह है कि क्या इस कानून के जरिए सरकार खास ढंग से पारिवारिक मूल्यों को थोपने का प्रयास कर रही है.

सरोगेसी (विनियमन) विधेयक-2016 के मुताबिक देश में सिर्फ “परोपकारी” सरोगेसी की इजाजत होगी. इसका अर्थ है कि पैसा देकर सरोगेट मदर बनाने पर रोक लग जाएगी. फिर सिर्फ वैध विवाहित जोड़े ही इस का लाभ उठा सकेंगे. वह भी तब ,अगर शादी के पांच साल बाद तक वे निसंतान रहें. सरोगेट मदर खून के रिश्तेवाली कोई महिला ही बन सकेगी. रिश्तेदार का प्रावधान गुर्दा दान से संबंधित कानून में भी शामिल किया गया था. इसके पीछे मकसद गरीब लोगों को लालच देकर उनके अंग को खरीदने पर रोक लगाना है. भारतीय परिस्थितियों में यह उचित प्रावधान है.इस कानून से खास प्रभावित विदेशी और अनिवासी भारतीय जोड़े होंगे, जो भारत की गरीब महिलाओं की कोख किराए पर लेते रहे हैँ.

भारत में सरोगेसी का चलन 2002-03 में आरंभ हुआ. उसके बाद से ये धंधा इतनी तेजी से फैला कि आज देशभर में लगभग 3000 सरोगेसी क्लीनिक चल रहे हैं. सैकड़ों एजेंट उनसे जुड़े हैँ. अनुमान है कि इसका सालाना कारोबार 900 करोड़ रुपए से ज्यादा है.ऐसे कई अध्ययन सामने आए, जिनसे जाहिर हुआ कि इस व्यापार में गरीब महिलाओं का घोर शोषण होता है. कुछ मामलों में गरीब महिलाओं को कोख किराए पर देने के लिए मजबूर किया गया. खासकर गुजरात के कुछ इलाके इस कारोबार का केंद्र बने. रिपोर्टों के मुताबिक सरोगेट मदर के एवज में महिलाओं को दो से तीन लाख रुपए मिल जाते हैं. गरीब परिवारों के लिए ये बड़ी रकम है. इसीलिए कई महिलाओं को एक से ज्यादा बार सरोगेट मदर बनने को मजबूर किया गया . इसका उन महिलाओं की सेहत पर दीर्घकालिक बुरा असर होता है. फिर बार-बार दूसरे के बच्चे की मां बनने का प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता है. लेकिन इनकी फिक्र किसी को नहीं होती.

अनेक विकसित पश्चिमी देशों में व्यापारिक सरोगेसी पर पूर्ण प्रतिबंध है. उनमें ब्रिटेन भी है. आम समझ है कि भारत का प्रस्तावित कानून का मसविदा मोटे तौर पर ब्रिटिश कानून की तर्ज पर है. बहरहाल, इस मसविदे पर व्यापक बहस की आवश्यकता है. बिल की कई आलोचनाएं सामने आई हैं. मोटे तौर पर ये आलोचनाएं दो दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करती हैं.एक तरफ वो लोग हैं, जिनके निहित स्वार्थ सरोगेसी के धंधे से जुड़े हैं. उन हलकों से ये तर्क दिए गए हैं कि प्रस्तावित कानून शरीर के बारे में निर्णय की महिलाओं की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है. गरीब परिवारों को होने वाले आर्थिक लाभ की इसमें अनदेखी की गई है . इससे विदेशी मुद्रा का नुकसान होगा. मगर इसकी जवाबी दलील भी प्रभावशाली है. अहम सवाल है कि क्या कोई सभ्य और सुसंस्कृत समाज हर चीज को- यहां तक कि मनुष्य को भी व्यापार और मुनाफे के नजरिए से देख सकता है ? क्या धनी को लोगों को इजाजत होनी चाहिए कि वे गरीबों की मजबूरी का गैर-वाजिब फायदा उठाएं, जैसा सरोगेसी के मामलों में होता है ?

दूसरी तरफ कुछ सवाल समाज एवं संस्कृति के प्रति वैकल्पिक दृष्टिकोण से भी उठे हैं. हमारा संविधान आधुनिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आधारभूत मान्यता पर टिका है. हमारी संवैधानिक व्यवस्था के तहत व्यक्ति कैसे जीवन जीता है, या किस तरह के परिवार का हिस्सा बनता है या बिना परिवार के रहता है- यह पूरी तरह उसके निजी चयन पर आधारित है. ऐसे में सिर्फ वैध रूप से विवाहित जोड़ों को सरोगेसी के जरिए संतान प्राप्ति का अधिकारी बनाना समस्याग्रस्त है. लिव-इन रिलेशनशिप में अथवा अकेले रहने वाले लोगों को यह अधिकार नहीं क्यों नहीं होना चाहिए? प्रस्तावित कानून के तहत लिव-इन जोड़े, अविवाहित, तलाकशुदा या विधुर-विधवा व्यक्ति और समलैंगिक लोग सरोगेसी का जरिए संतान नहीं पा सकेंगे- भले उनकी खून की कोई रिश्तेदार सरोगेट मदर बनने को तैयार हो. समलैंगिकता भारत में अब तक अपराध है. लेकिन इससे जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को रद्द करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ विचार कर रही है. आधुनिक नजरिया यह है कि अपने यौन रूझान के मुताबिक जीना हर व्यक्ति का अधिकार है.

बहरहाल, जब तक धारा 377 कायम है, भारत में कोई व्यक्ति या जोड़ा खुद को समलैंगिक घोषित नहीं कर सकता. ऐसे में प्रस्तावित कानून में उसका उल्लेख करना अतार्किक है. जबकि सिंगल पैरेंट बनने के इच्छुक विधुर-विधवाओं को रोकना सिरे से अनुचित है. यही बात लिव-इन जोड़ों के संदर्भ में भी कही जा सकती है.जाहिर है, जिस बिल को मंजूरी दी गई है, उस पर बहस की गुंजाइश है. एक ऐसा कानून बनना उचित नहीं है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संकुचित करता हो.