सुप्रीम कोर्ट पहुंचा भूमि अध्यादेश की वैधता का सवाल

Shyam Sunder

pm_modiभूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को फिर से जारी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई का फ़ैसला किया है. इस जनहित याचिका में अध्यादेश की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है. जनहित याचिका दायर करने वाले संगठनों ने कहा है कि क़ानून बनाने की संविधान में बताई प्रक्रिया को न मानकर सरकार अध्यादेश का सहारा ले रही है.

भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक राज्यसभा में लंबित है. बजट सत्र के पहले हिस्से में सरकार बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने वाले अध्यादेश के अलावा कोल और खान और खनिज अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों में पास कराने में कामयाब रही. लेकिन भूमि अधिग्रहण के मसले पर राज्यसभा में सरकार संख्या नहीं जुटा पाई. आख़िरकार सरकार को राज्यसभा के सत्रावसान की घोषणा करनी पड़ी. भूमि अधिग्रहण क़ानून में बदलाव पर डटी सरकार के लिए कोई और रास्ता बचता नहीं था. हांलाकी संसद सत्र शुरू होते ही सरकार को 6 हफ्ते के भीतर इस अध्यादेश को संसद में क़ानून में तब्दील करना होगा. मौजूदा हालात में ये काम सरकार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है.

भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बंगलुरू में पिछले हफ्ते ही संपन्न हुई. इस बैठक में पार्टी ने स्पष्ट कर दिया कि वो भूमि अधिग्रहण क़ानून में बदलाव के मुद्दे पर पीछे नहीं जा सकती. भाजपा का मानना है कि चुनाव में पार्टी ने आर्थिक तरक्की और रोज़गार के जो वादे किये हैं, इस क़ानून में बदलाव के बिना वो वादे पूरे करने संभव नहीं है.

बंगलुरू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण से भी ये बात साफ़ थी. मोदी ने अपने भाषण में कोयले और स्पैक्ट्रम की नीलामी में पारदर्शिता लाने का दावा किया. इसके अलावा सरकार की कई योजनाओं की बात की. लेकिन उनका ज़ोर खेती और किसानों पर ज़्यादा रहा.

पार्टी पर ग़रीब और किसान विरोधी सरकार होने का आरोप भी लग रहा है. पार्टी के लिए ये सबसे बड़ी चिंता की बात है. पार्टी और सरकार के वरिष्ठ लोग इस धारणा को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं. पार्टी ने तय किया है कि वो अपने संगठन के सहारे इस मुद्दे पर किसानों को विश्वास मे लेगी. पार्टी ने बाक़यदा एक बुकलैट जारी कर विपक्ष के प्रचार का जवाब दिया है.

भाजपा को ये एहसास है कि भूमि अधिग्रहण एक बेहद संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है. लेकिन उसकी स्थिति आगे कुंआ पीछे खाई जैसी है. अगर वो इस क़ानून में बदलाव नहीं करती तो चुनाव में लोगों को किए उसके वादे उसे ख़तरे में नज़र आते हैं. और अगर आगे बढ़ते हैं तो बिहार और बंगाल में विधानसभा चुनावों में उसे नुकसान हो सकता है. इस स्थिति में पार्टी ने आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया है. कुछ नुकसान की आशंका के बावजूद.

भूमि अधिग्रहण का मुद्दा राजनीतिक है जिसपर पार्टी ने आगे बढ़ने का फ़ैसला किया है. लेकिन दूसरा अहम मुद्दा है अध्यादेश का. यह सवाल संविधान और संसदीय व्यवस्था से जुडा है.

भारत का संविधान राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि अगर वे समझते हैं कि परिस्थिति विशेष हैं और संसद सत्र में नहीं है तो वो अध्यादेश जारी कर सकते हैं. यह अध्यादेश क़ानून की तरह ही प्रभावी होगा. राष्ट्रपति ऐसा केन्द्रीय कैबिनेट की सलाह पर ही करेंगे. ऐसी स्थिति में संविधान सरकार को अध्यादेश जारी करने का अधिकार देता है. लेकिन कुछ शर्तों के साथ. मतलब अध्यादेश तभी आ सकता है जब संसद का सत्र न चल रहा हो और क़ानून बनाना अनिवार्य हो रहा है.

सीपीएम सांसद पी राजीव संविधान और संसदीय नियम क़ायदों के माहिर माने जाते हैं. वो कहते हैं. “संविधान में बेशक अध्यादेश की व्यवस्था है लेकिन संविधान निर्माताओं ने ये व्यवस्था विशेष परिस्थितियों के लिए की थी, सरकार की सुविधा के लिए नहीं.”

राजीव आगे कहते हैं, “देश के पहले लोकसभा स्पीकर जीवी मावलंकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से इसी मसले पर नराज़ हो गए थे. उन्होंने नेहरु को लिखा था कि अगर आप ऐसे ही अध्यादेश लाते रहे तो संसद अध्यादेशों पर मोहर लगाने वाली संस्था बन कर रह जाएगी.”

जवाहर लाल नेहरु ने भी मावलंकर की चिट्ठी का जवाब लिखा. इस चिट्ठी में उन्होंने माना कि अध्यादेश क़ानून बनाने का सही रास्ता नहीं है.

नेहरु ने लिखा, “हांलाकि मैं ये मानता हूं कि संविधान में दिए गए अध्यादेश के अधिकार का सरकारों द्वारा दुरूपयोग हो सकता है. मैं ये मानता हूं कि आख़िर संसद को ही ये अधिकार है कि वो ये फ़ैसला करे कि कोई अध्यादेश अधिकार का सही इस्तेमाल करके लाया गया या फिर अधिकार का दुरूपयोग किया गया.”

अध्यादेशों जारी करने के मामले में सरकारों का रिकार्ड देंखे तो मौटे तौर पर जिन सरकारों को कमज़ोर और अस्थिरता के ख़तरे से घिरा माना जाता है उन सरकारों ने अध्यादेशों का सहारा ज़्यादा लिया.

1950 से 1964 के बीच नेहरु सरकार ने औसतन 11 अध्यादेश हर साल जारी किए. 1964 से 1966 के बीच गुलजारी लाल नंदा और लालबाहदुर शास्त्री की सरकारों का औसत हल साल 2 के क़रीब रहा. 1971 से 1974 के बीच इंदिरा गांधी ने हर साल 12 अध्यादेश जारी किए, लेकिन इमरजेंसी में 1975-76 में 22 से ज़्यादा अध्यादेश लाए गए. देवगौड़ा के समय में ये औसत 31 अध्यादेश प्रति वर्ष पहुंच गया लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के ज़माने में ये औसत घट कर 14 पर आ गया. यूपीए 1 और यूपीए 2 के ज़माने में सबसे कम क़रीब 5 अध्यादेश हर साल लाए गए.

यानि भारत के गणतंत्र बनने के साथ से ही अध्यादेशों के जारी होने का सिलसिला शुरू हो गया और आलोचना भी. देश के पहले स्पीकर जी वी मावलंकर से लेकर वर्तमान स्पीकर सुमित्रा महाजन सरकारों को अध्यादेशों से बचने की सलाह देते हैं. लेकिन सरकारों कहती रही हैं कि अध्यादेश मजबूरी में ही लाए जाते हैं. अध्यादेश पर निर्भर होने की एक सबसे बड़ी वजह बताई जाती है संसद में समय की कमी या समय की बर्बादी. संसद और विधानसभाओं की बैठकों की संख्या लगातार कम हुई है. ज़ाहिर है ऐसे में सांसदों और विधायकों को कम समय मिलता है. कई महत्वपूर्ण क़ानूनों को बहस हुए बिना पास करना पड़ता है और कई अहम मुद्दे जो आम लोगों के हितों से जुड़े होते हैं उन पर चर्चा नहीं हो पाती है.

अगर संसदीय इतिहास पर नज़र डाली जाये तो 1952 से 1961 के बीच प्रतिवर्ष लोकसभा की 124 से ज़्यादा बैठक होती थीं, राज्यसभा की 90 से ज़्यादा बैठकें प्रतिवर्ष होती थीं. अगले दशक में ये आंकड़ा घटकर लोकसभा के लिये 116 बैठकों पर पहुंच गया. हांलाकी राज्यसभा की 98 से ज़्यादा बैठक प्रतिवर्ष हुईं. 1992 से लेकर 2001 के दशक में ये स्थिति ख़राब हुई और इस दशक में लोकसभा की बैठकों का औसत 70 बैठक प्रतिवर्ष तक पहुंच गया और राज्यसभा की बैठकें 70 से भी कम हुईं.

संसद की कम होती बैठकों पर राजनीतिक दल चिंतित तो होते हैं पर ठोस पहल का इंतज़ार ही है. वामपंथी पार्टियां ज़रुर कम से कम 100 दिन संसद की बैठक की मांग करते रहे हैं. संसदीय कार्य राज्यमंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी भी कहते हैं कि संसद की बैठक बढ़नी चाहिए. लेकिन इसका फ़ायदा तभी है जब संसद में अवरोध कम हो. उन्होंने कहा, “अगर एसा होता है तो बहुत अच्छा है, देश के बड़े मसले हैं जिन पर चर्चा की ज़रुरत होती है.”

हांलाकी संसद का लंबा अनुभव रखने वाले शरद यादव कहते हैं इस बहाने से सरकार अध्यादेश के रास्ते को जायज़ नहीं ठहरा सकती. “ये अध्यादेश संसद सत्र ख़त्म होने के दो दिन में लाए गए. आप संसद से मुंह छुपाकर, परंपराओं और संस्थाओं की अनदेखी करके नहीं ला सकते. यंहा स्टैंडिंग कमेटी वाला सिस्टम है, सेलेक्ट कमेटी का है. अब रुलिंग पार्टी के दिमाग में है कि हमें इसी रास्ते से जाना है. आप ये सोचने को तैयार नहीं हैं कि आप संस्थाओं की अनदेखी कर रहे हैं.”

सरकार का इस मामले में पुराना तर्क है. सरकार का कहना है कि देश हित में क़ानून बनाने के लिए ही अध्यादेशों का इस्तेमाल किया गया है. नक़वी कहते हैं “दोनों ही सदनों में लोकसभा या राज्यसभा में कोई क़ानून अगर नहीं बन पा रहा है. किसी वजह से विरोध कारण या फिर भ्रम के कारण नहीं बन पा रहा है तो सरकार को संविधान ने अधिकार दिया है अध्यादेश का.”

अध्यादेशों पर सरकार पर विपक्ष की आलोचना में सबसे बड़ा मसला था कि सरकार ने नीतिगत मामलों पर संसद की अवहेलना की. विपक्ष का कहना है कि संसदीय व्यवस्था ने लगातार अपने को मजबूत किया है. संसद की स्थाई समितियां बनाई गईं जिससे संसद में समय बर्बादी की भरपाई हो सके. भूमि अधिग्रहण क़ानून 2013 व्यापक बहस के बाद ही पास किया गया था. इस बहस में और क़ानून पास कराने में भाजपा शुरु से आख़िर तक शामिल थी. भूमि अधिग्रहण बिल जिस संसदीय स्थाई समिति को भेजा गया था और जिसकी रिपोर्ट को इस क़ानून के बनाने में महत्वपूर्ण दस्तवेज़ माना गया, उस समिति की अध्यक्ष भाजपा की नेता और वर्तमान स्पीकर सुमित्रा महाजन थीं.

ख़ैर नीतिगत मसलों पर राजनीतिक दलों में बहस का कोई अंत नहीं है और होना चाहिए भी नहीं. लेकिन इस बहाने जो बहस संसदीय व्यवस्था की उठी है उस पर भी फ़ोकस हो तो देश का भला होगा. और राजनीतिक दलों और नेताओं दोनों की विश्वसनियता स्थापित होने में मदद मिल सकती है. इस बहाने राजनीतिक दल संसद की बैठकों की संख्या बढ़ाने से लेकर संसद में अवरोध को कम करने के तरीक़ो पर गौर करे. कंही से शुरूआत होनी है और ये शुरूआत जितनी जल्दी हो उतना अच्छा. लेकिन विपक्ष में रहते हुए आप अगर अवरोध को संसदीय लोकतंत्र में स्वीकार्य तथ्य मानेंगे और सरकार में आने पर अवरोध को विकास विरोधी बताएंगे तो शुरूआत नहीं होगी. आपको ये मानते हुए की अवरोध को एक स्वीकार्य तरीका स्थापित करने में आप भी शामिल थे, तभी आप इस बहस को शुरू कर सकते हैं.