सृजन के प्रतीक

Sandeep Yash
M. Visvesvaraya

M. Visvesvaraya

आज इंजीनियर्स डे यानी अभियन्ता दिवस है। यह दिन प्रकांड विद्वान, अर्थशास्त्री, राजनेता, शिक्षाविद और देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियर मोक्षगुंडम

विश्वेश्वरैया को समर्पित है, जिन्हें इंजीनियर्स का पितामह कहा जाता है। विश्वेश्वरैया का जन्म आज ही के दिन 1860 में मैसूर रियासत में हुआ था।

आधुनिक भारत को गढ़ने में इनकी अतुल्य भूमिका रही है। इस बरस इनकी 159 वीं जयंती है। ये मौका है, जब कृतज्ञ राष्ट्र अपने इंजीनियर्स की

प्रतिभा और योगदान का समादर करता है और युवा पीढ़ी को इंजीनियरिंग के करियर के प्रति प्रेरित करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एम विश्वेश्वरैया को साधुवाद देते हुए कहा है कि इंजीनियर्स, परिश्रम और दृढ़ संकल्प का पर्याय है, जिनके योगदान के बगैर

मानव प्रगति संभव नहीं है।

वहीं उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने विश्वेश्वरैया को एक बेमिसाल सिविल इंजीनियर बताते हुए कहा कि उन्होंने बांधों के माध्यम से देश के जल संसाधनों

का बेहतर दोहन किया।

तो चलिए एक नज़र डालते हैं आदर्शवाद और अनुशासन के पर्याय एम विश्वेश्वरैया के योगदान पर-

– इन्होंने 1903 में पुणे के खड़कवासला जलाशय पर ऐसा बांध बनवाया था, जिसके दरवाजे बाढ़ के दबाव को भी झेल सकते थे ।
– इसके बाद इनकी देख -रेख में ग्वालियर में तिगरा बांध बनाया गया
– 1906-07 में सरकार की ओर से जल आपूर्ति, जल निकासी व्यवस्था की पढाई के लिए इन्हें अदन भेजा गया।

– इनके द्वारा कावेरी नदी पर बनवाये गए कृष्णा राजा सागरा बांध का जलाशय उस दौर में एशिया में अव्वल था ।
– हैदराबाद शहर के लिए बनाई गयी बाढ़ सुरक्षा प्रणाली ने इनका यश दूर-दूर तक पहुंचाया था।
– अविभाजित भारत में इन्होंने नहर बना कर सिंधु नदी के जल को सिंध के सुक्कुर शहर तक पहुंचाया था ।
– इन्होंने एक नई सिंचाई प्रणाली ‘ब्लाक सिस्टम’की शुरुआत कर जल प्रवाह और संचयन में सुधार किया था ।
-इन्होंने ही बांधों में इस्पात के दरवाजे लगाने का चलन शुरू किया, जिससे जल प्रवाह को आसानी से रोका जा सके।
– विश्वेश्वरैया जी ने समुद्री कटाव झेल रहे विशाखापत्तनम बंदरगाह की रक्षा के लिए एक प्रणाली विकसित करने में भी बड़ी भूमिका निभाई ।

मैसूर राज्य में दीवान रहे विश्वेश्वरैया जी दृढ इच्छा शक्ति के लिए जाने जाते थे। इन्होंने तमाम कठिन बुनियादी परियोजनाओं को अंजाम तक पहुंचाया,

जिसका फायदा देश को सदैव मिलेगा।

तो चलिए देखते हैं स्वतंत्र भारत में इंजीनियरों ने इस परम्परा को कैसे मजबूत किया है-

गुजरात के चरनका गांव का सोलर पार्क – 5,000 एकड़ में फैला यह भारत का पहला सोलर पार्क है और एशिया का सबसे बड़ा हब। इस पार्क की

क्षमता 500 मेगावाट है। यहां सोलर और पवन ऊर्जा दोनों उत्पन्न होती हैं।

पीर पंजाल रेलवे सुरंग, जम्मू और कश्मीर – दुर्गम पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला को काट कर बनिहाल-काजीगुंड रेलवे लाइन पर बनी 11 किमी लंबी सुरंग

भारत में सबसे लम्बी और एशिया में दूसरा सबसे लंबा परिवहन मार्ग है।

बांद्रा – वर्ली समुद्र लिंक, मुंबई – भारत में ये 8 लेन वाला अनूठा केबल पुल है, जिसके टावर लगभग 43 मंज़िल जितने ऊंचे हैं। 20,000 टन वज़न का

ये पुल करीब 2,250 किमी लम्बे मजबूत इस्पात के तारों से बुना गया है। ये पुल रिक्टर स्केल पर 7.0 तक भूकंप झेलने की क्षमता रखता है ।

प्रोजेक्ट हिमांक रोड – 2017 तक लद्दाख में खारदुंग ला दर्रा दुनिया की सबसे ऊंची सड़क मानी जाती थी पर उसी बरस बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन

(BRO) ने प्रोजेक्ट हिमांक के तहत 19,300 फीट की ऊंचाई पर स्थित उमलिंगला टॉप तक सड़क बना कर इस ताज को छीन लिया। आपकी

जानकारी के लिए इस सड़क की ऊंचाई माउंट एवरेस्ट की आधी है।

चिनाब रेल पुल – जम्मू के रेसाई जिले में बन रहे इस पुल को दुनिया का सबसे ऊंचा रेल पुल का दर्जा दिया जा सकता है। ये पुल नदी के किनारे

लगभग 1,178 फीट ऊंचा है। बीहड़ इलाके और हिमालय की कठिन भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए इसे आधुनिक इंजीनियरिंग का बेहतरीन

नमूना माना जा रहा है।

बोगीबील रेल रोड ब्रिज – डिब्रूगढ़, असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बना ये दुनिया का सबसे लम्बा स्टील ब्रिज है, जिस पर ताम्बे की परत चढ़ी है। इसका

उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। ये पुल न सिर्फ भारत के सबसे भारी युद्धक टैंकों का भार वहन कर सकता है बल्कि इस पर लड़ाकू जेट

भी उतर सकते हैं।

तो ये कुछ उदाहरण थे, स्वतंत्र भारत से जिनकी फेहरिस्त वक़्त के साथ बढ़ती रहेगी। पर इस विषय पर बात करें तो हमारा इतिहास भी काफी समृद्ध

रहा है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की शहरी संरचना, सांची स्तूप, दिल्ली का लौह स्तंभ, कोणार्क का सूर्य मंदिर, बृहदेश्वर मंदिर, होयसला वास्तुकला,

हम्पी और ताज महल इसके प्रबल प्रतीक हैं।

तो अब देखते हैं कुछ तथ्य देश के इंजीनियरिंग सेक्टर से
2030 तक इंजीनियरिंग निर्यात के 200 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
अप्रैल 2000 से 2020 के बीच इस सेक्टर में 3 .63 अरब डॉलर के विदेशी निवेश किये गये।
भारत, दुनिया के तमाम देशों में परिवहन उपकरण, कैपिटल गुड्स, मशीनरी / उपकरण और कास्टिंग, फोर्जिंग और फास्टनरों जैसे इंजीनियरिंग

उत्पादों का निर्यात करता है।
भारत में कैपिटल गुड्स का कारोबार 2025 तक बढ़कर 8.05 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है।
भारत से इंजीनियरिंग वस्तुओं का निर्यात ज्यादातर अमेरिका और यूरोप में होता है।
इस सेक्टर में 100 फीसदी विदेशी निवेश का प्रावधान है।

चलते चलते
कहावत है कि इंजिनियर सफलता से नहीं असफलता से बनते हैं, प्रकृति से ही हर इंसान इंजिनियर होता है, इनमें कुछ मकान बनाते हैं, कुछ

सॉफ्टवेयर बनाते हैं, कुछ मशीन बनाते हैं और कुछ सपने बनाते हैं और सब मिल कर देश बनाते हैं। भारत रत्न मोक्षमुंडम विश्वेश्वरैया इसकी जीवंत

मिसाल हैं।