स्मार्ट सिटीज़: हक़ीक़त या फ़साना

Nav Vikram Singh

विश्वस्तरीय सुविधाएं, उच्च गुणवत्ता वाली जीवन शैली वाले शहर का सपना साकार करने के रास्ते पर हम दो कदम और बढ़ गये. देश भर में प्रस्तावित 100 में 98 स्मार्ट सिटी शहरों की लिस्ट केंद्र सरकार ने जारी कर दी. यह खबर जब सुर्खियों में आई तो भावी स्मार्ट सिटी के बाशिंदों में खुशी की लहर दौड़ गई हालांकि जिनके शहरों का नाम नहीं आया वो अपने राज्य में स्मार्ट सिटी के ऐलान से संतुष्ट लगे. चाय की दुकानों से लेकर क्लासरूम तक चर्चा में आ गया स्मार्ट सिटी.

जून में प्रधानमंत्री के ऐलान से लेकर लिस्ट जारी करने तक जो गर्मजोशी नजर आ रही है वो स्मार्ट सिटी के अमल तक बाकी कई योजनाओं की तरह उबाऊ न हो जाये इसका डर तो है ही. साथ ही सबसे बड़ी समस्या मौजूदा शहर के नक्शे में नये सांचे को तैयार करके उसमें स्मार्ट सिटी के ढालने की है. बड़ा सवाल ये है कि स्मार्ट सिटी पर अमल कैसे हो? क्या इससे शहरों की वाकई सूरत संवर कर किसी यूरोपीय शहर का अहसास कराएगी? बेतरतीब विकास की मिसाल बन चुके भारतीय शहर जहां ट्रैफिक जाम में फंसी गांडियों के साथ एंबुलेंस की आवाजे, बिजली-पानी जैसी मूलभूत समस्याओं के लिए परेशान लोग, सड़कों पर इंसानों के साथ जानवरों की आवाजाही और बेरोकटोक बढ़ता अतिक्रमण आम बात है. मसलन कानपुर का ही उदाहरण ले. कभी मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट कहे जाने वाले इस शहर को तो अतिक्रमण ने दबोच ही रखा है. साथ ही दर्जन भर से ज्यादा फैक्ट्री जो लाखों लोगों की रोजी रोटी का आसरा थी वो बंद हो चुकी है. नई दिल्ली जैसों को छोड़कर कमोबेश हर शहर के यही हालात हैं. शहरों के रहन सहन में काफी असमानताएं है.

स्मार्ट सिटी की जो जहन में तस्वीर आती है उसमें हमारे शहर फिट बैठते ही नहीं. आधी आबादी झुग्गियों में रहती है ऐसे में स्मार्टनेस की बराबरी कैसे होगी. देश में सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में 13 शहर जिनमें राजधानी लखनऊ समेत कानपुर, झांसी, बनारस जैसे शहर स्मार्ट सिटीज में शामिल है. तमिलनाडू के चेन्नई समेत 12, गुजरात में 6, हालांकि बिहार में राजधानी पटना को छोड़कर 3 शहर मुजफ्फपुर, भागलपुर, बिहारशरीफ. ऐसे ही पश्चिम बंगाल में कोलकाता को छोड़कर 4 शहरों को स्मार्ट सिटीज के तौर पर विकसित किया जाएगा. हर राज्य को कम से कम एक स्मार्ट सिटी मिला है. महज टैग भर मिलने से क्या जड़े जमा चुकी व्यवस्था का उखाड़कर नई पौध तैयार करना मुमकिन हो पाएगा. इन 98 शहरों में 13 करोड़ लोग यानि की शहरी आबादी के 35 प्रतिशत लोग रहते है. 20 शहरों को इसी वित्तीय वर्ष से पैसा मिलना शुरू हो जाएगा. सवाल ये भी है  शहरों को स्मार्ट बिना प्रशासनिक और पुलिस सुधार के किया जाना कैसे संभव है. सरकार डिजिटाईजेशन की बात करती है जबकि देश कॉल ड्राप जैसी समस्या से जूझ रहा है. उसके बाद बिजली पानी जैसी बुनियादी समस्याएं आड़े आएंगी. हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये सरकार का बेहद साहसिक कदम है.

चुनौतियां बरकरार है उनसे निपटने के लिए खाका तैयार करना मुश्किलों भरा होगा. एक ऐसा शहर जिसमें सारी सुविधाएं हो वहां कौन नहीं रहना चाहेगा. एक स्मार्टफोन तो अब निचले तबके के पास पहुंच गया है. लेकिन उसका वो भरपूर फायदा उठा सके इसके लिए उसे 3जी सर्विस का रीचार्ज कराना पड़ेगा उसके लिए पैसे नहीं और उसकी डिजीटल जागरुकता ज्यादा से ज्यादा फेसबुक या वाट्सएप तक सीमित है ऐसे में स्मार्टफोन और साधारण फोन में ज्यादा फर्क नहीं रह जाता ठीक उसी तरह स्मार्ट सिटी का बाशिंदा जब तक जानेगा नहीं तब तक न वो जिंदगी का ढर्रा बदलेगा और न शहर की तस्वीर में तब्दीली आएगी. और गांव के लोग क्या सिर्फ सांसद आदर्श ग्राम से खुश हो जाएंगे. अगर लचर प्रशासन को दुरुस्त किया जाए तो व्यवस्था में बदलाव की गुंजाइश है. गांव में सूख चुके तालाब और जर्जर होते ढांचे भी किसी योजना की आस में हैं. लेकिन चलिए शुरुआत तो हुई है आने वाले 5 सालों में ही लोग 20 शहरों को स्मार्ट सिटी में तब्दील होते देख सकेंगे. अच्छी ओपनिंग की शुरूआत के लिए जनता ही नहीं निवेशक भी आंखे गड़ा के बैठे हैं. यहां अंत भला नहीं शुरूआत ही अंत की तारीख लिखेगी.