हमारा फार्मा सेक्टर, हमारी संजीवनी

Sandeep Yash

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नमस्कार, आज बात करते हैं देश के फार्मा सेक्टर की।  ये सुकून की बात है कि जहां कोविद के चलते अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी हुई है वहीँ McKinsey ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ हमारा फार्मा सेक्टर पिछले पांच बरसों से 13 -14 % की सालाना विकास दर बनाये हुए है।  तो चलिए इस सेक्टर का जायज़ा लेते हैं।  सरकारी आकड़ों के मुताबिक़

–  भारत, दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्माता है

–  दुनिया भर में उत्पादित टीकों का 62 % हिस्सा हमारा है

–  वॉल्यूम के हिसाब से भारत 20% दवाओं की आपूर्ति करता है

–  निर्यात के हिसाब से दुनिया में भारत 17 वे स्थान पर है

–  मूल्य की दृष्टि से हम 10वे नंबर पर हैं

पर ये यात्रा काफी लम्बी रही है जिसकी जड़ें प्राचीन काल तक पहुँचती हैं।  इसमें तमाम पड़ाव भी रहे हैं। भारतीय फार्मास्युटिकल इतिहास गुप्त काल से शुरू हुआ। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता चिकित्सा, औषध विज्ञान और शल्य चिकित्सा के दो मूलभूत ग्रंथ हैं। भारत में एलोपैथिक दवा ब्रिटिश शासन में शुरू की गई थी। लेकिन ऐसी दवाओं का उत्पादन विदेशों में होता था।  भारत से कच्चा माल आयात कर ये दवाएं बनायीं जाती थीं और वापस हमारे बाज़ारों में उतारी जाती थीं।  फिर 1882 में P C Ray, T K Gajjr और A S Kotibhaskar जैसे कुछ भारतीय वैज्ञानिकों ने देसी दवा उद्योग की नींव रखी।

–  1901 में आचार्य पी सी रे ने कलकत्ता में पहला भारतीय फार्मास्युटिकल उद्यम बंगाल केमिकल शुरू किया।
–  1907 में बड़ौदा में अलेम्बिक केमिकल वर्क्स शुरू हुआ
–  1919 में बंगाल इम्युनिटी की नीव पड़ी

इस शुरूआती दौर में भारत अपनी ज़रुरत की 13 % दवाएं बनाने लगा था। दूसरे विश्व युद्ध (1939-1945) के दौरान विदेशी कंपनियों से दवाओं की आपूर्ति में भारी गिरावट आई थी। नतीजतन, ज़रुरत के चलते भारत में बड़ी संख्या में दवा कंपनियों की शुरुआत हुई। इससे देश की 70% ज़रूरतें पूरी होने लगी थीं।

– 1911 में सरकार ने चिकित्सा अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए Indian Research Fund Association (IRFA) बनायीं थी।  1949 में इसका नाम
बदल कर Indian Council of Medica  Research (ICMR) कर दिया गया।  आज इसकी शुमार दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित चिकित्सा अनुसंधान निकायों में  होती है।

– 50-60 के दशक में दुनिया भर में इस उद्योग ने तेज़ प्रगति की।  इसी दौर में पहला गर्भ निरोधक, पेन्सिलिन, वैलियम , रक्तचाप और ह्रदय रोगों की दवाओं का जन्म हुआ था। फार्मा कम्पनिओं का फोकस अनुसंधान और विकास पर था।

पर धन और संसाधनों की कमी के चलते भारत इसका फायदा लेने के हालात में नहीं था। फिर नीतियों में बदलाव कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को निवेश का न्योता भेजा गया। इसके अच्छे नतीजे रहे।  1947 जो निवेश 10 करोड़ रू था वो 1952 में बढ़ कर 35 करोड़ हो गया। पर विदेशी कंपनियां बाहर से दवा लाकर देश में बेचा करती थीं और मूलभूत ढांचे का विकास नहीं हो रहा था।

अगला चरण
1956 में आये Industrial Policy Resolution ने उद्योगों को तीन वर्गों में बांटा दिया -Schedule A,B और C . फार्मा सेक्टर Schedule B में आता था जिसका मतलब निजी उद्योग को प्रोत्साहन देने के साथ उसका औद्योगिक लाइसेंसिंग के माध्यम से कड़ाई से विनियमन करना था। नयी लाइसेंसिंग नीति में, सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी देसी इकाइयों में final  drug बनाना अनिवार्य कर दिया था।  लाइसेंस देने की ज़िम्मेदारी Directorate General of Technical Development की थी।  इस नीति के जल्द नतीजे मिले – कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी यूनिट्स का विस्तार किया तो तमाम नई भारतीय कंपनियों की स्थापना हुई। 1962 में फार्मा उद्योग 100 करोड़ रुपये का हो गया था।

इसी नीति के तहत भारत सरकार ने सार्जनिक क्षेत्र की दो कंपनियों को आगे बढ़ाया
1954 में Hindustan Antibiotics Ltd.- इसका उद्देश्य देश में सस्ती दवाओं को उपलब्ध करना था।  शुरुआत पेनिसिलिन के निर्माण से हुई थी।
1961 में Indian Drugs and Pharmaceuticals Ltd (IDPL)

इन दोनों संस्थानों ने विश्विद्यालयों में फार्मा सेक्टर से जुड़े कौशल विकास की नीव डाली थी जिसका फायदा देश को आज तक मिल रहा है। देसी बाज़ार में एक मजबूत थोक दवा उद्योग का बुनियादी ढांचा भी इन्ही दोनों ने तैयार किया था।  साथ ही Central Drug Research Institute (CDRI), Indian Institute of Chemical Technology (IICT) और National Chemical Laboratory (NCL) जैसे शोध संस्थानों ने फार्मा सेक्टर की निजी कंपनियों के काम काज में तेजी लाने के लिए तमाम वैज्ञानिक पद्धतियां और तौर तरीके विकसित किये।

70  का दशक
– इस दशक में फार्मा सेक्टर ने ऊंची छलांग लगानी शुरू कर दी थी

–   इस दशक तक थोक दवा व्यापार 72 करोड़ का और उत्पादन (formulation) 370 करोड़ का हो चूका था

– पर Patent Act (1911) के चलते विदेशी कंपनियों को कहीं ज़्यादा मुनाफा हो रहा था।  इस समस्या का समाधान ढूँढा गया नीतियों में बदलाव करके। नए Process Patent के तहत दिए जा रहे पेटेंट की समयावधि घटा दी गयी। इस कदम से भारत के बाज़ारों पर से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का शिकंजा ढीला पड़ा और सरकार द्वारा दी गयी सब्सिडी और ढांचागत सुविधाओं के चलते देसी कंपनियों का तेज़ी से प्रसार हुआ। रोगों से जुडी तमाम नयी दवाएं बाजार में आयीं। निर्यात को गति मिली।

80 का दशक
– पिछले दशक में हुए नीतिगत बदलावों का असर इस दशक पर दिखने लगा था।  बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बाजार में हिस्सा घट कर लगभग 50% रह गया था
– निजी कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 1986 में फिर नीतिगत बदलाव किये
– इस दशक तक फार्मा कंपनियों की सख्या 10 गुना बढ़ चुकी थी

90 का दशक
– 1995 तक ये सेक्टर 16% से भी ज़्यादा विकास दर से बढ़ा था
– भारतीय कंपनियां 100 से अधिक देशों में अपने उत्पादों का निर्यात कर रही थीं

सन 2000 का दशक
– जंववरी, 2004 में Good Manufacturing practice (GMP) लागू की गयी।  इस प्रणाली का मक़सद दवाओं को गुणवत्ता मानकों के अनुसार बनाना और
नियंत्रित करना है।  यह किसी भी दवा उत्पादन में शामिल जोखिमों को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है जिसे परीक्षण के माध्यम से समाप्त नहीं
किया जा सकता है। इसकी ज़रुरत 70 के दशक में कुछ दुर्घटनाओं के बाद महसूस हुई। GMP, 1975 में  World Health Assembly द्वारा प्रकाशित “good manufacturing practice and quality of drugs.” पर आधारित है

फिलहाल सन 2010 तक थोक दवाएं, रसायन और फार्मूलेशन की 70 % पूर्ती भारतीय कंपनियों द्वारा की जाने लगी थी।
– इस दशक तक भारत वैश्विक बाजार में अग्रणी भूमिका में आ चुका था – वॉल्यूम के मामले में तीसरे नंबर पर और मूल्य के मामले में 14 वें स्थान पर। ये संभव
हुआ था नई तकनीकों को अपनाने से और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनुसंधान और विकास पर काम करने से।

आइये देखते इस सेक्टर को दिशा देते कुछ प्रमुख कानूनों को
– The Drugs and Cosmetics Act, 1940 : यह अधिनियम भारत में दवाओं का वितरण और बिक्री, यात, निर्माण को नियंत्रित करता है
– The Pharmacy Act, 1948 : यह कानून भारत में फार्मेसी के पेशे को नियंत्रित करता है
– The Drugs and Magic Remedies (Objectionable Advertisement) Act, 1954 : यह अधिनियम दवाओं के विज्ञापनों को नियंत्रित करने के साथ
भ्रमित करने वाले विज्ञापनों को प्रतिबंधित करता है।
– The Indian Patents Act, 1970
– Hatch-Waxman Act, 1984
– The Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985:: यह अधिनियम नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक पदार्थों से संबंधित संचालन
के नियंत्रण और विनियमन से संबंधित है।
– The Drugs Price Control Order (DPCO), 1995:: यह दवाओं की कीमतों को विनियमित करने के लिए Essential Commodities Act, 1955 के
तहत भारत सरकार द्वारा जारी एक आदेश है
– Good Clinical Practice (GCP) Guidelines:: WHO के ये दिशानिर्देश मानव शरीर पर होने वाले अनुसंधान से जुड़े हैं।

आपकी जानकारी के लिए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) और रसायन और उर्वरक मंत्रालय (MoCF) फार्मा सेक्टर में नियामक यानी Regulator की भूमिका में हैं
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तो एक नज़र
– भारत में पहली व्यापक दवा नीति 1978 में बनाई गई थी। इसमें 1986, 1994 और 2002 में नीतिगत बदलाव किये गए।
– राज्य स्तर पर, State Food and Drug Administrations (FDAs) कंपनियों द्वारा दवा निर्माण, बिक्री और परीक्षण पर नज़र रखते हैं
– वर्तमान अड़चनों के बाद भी 2020 के अंत तक इस सेक्टर का आकार 35 अरब डॉलर तक होने का अनुमान है
– अप्रैल 2020 में प्रधान मंत्री भारतीय जनऔषधि योजना (पीएमबीजेपी) के तहत सस्ती दवाओं ने 52 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड बिक्री की
–  फार्मा उद्योग के लिए कच्चा माल बनाने वाली कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार लगभग 1 लाख करोड़ रू का फंड स्थापित कर रही है
– जनवरी 2020  तक भारत का दवा निर्यात लगभग 14 अरब डॉलर रहा
– फार्मा विज़न 2020 का लक्ष्य दवा उत्पाद में भारत को सिरमौर बनाना है
– अप्रैल 2000 और मार्च 2020 के बीच हमारे फार्मा सेक्टर में 16 50 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया
– वर्तमान में, AIDS के इलाज में काम आने वाली antiretroviral drugs का 80 % उत्पादन भारतीय कंपनियां करती है
–  2025  तक हमारे फार्मा उद्योग का आकार 100 अरब डॉलर और मेडिकल उपकरण का बाजार 25 अरब डॉलर होने का आकलन है
– मार्च 2020 तक इस उद्योग से निर्यात 20. 70 अरब डॉलर था
– 2025  तक, भारत के biotechnology सेक्टर का आकार भी 100 अरब डॉलर होने का अनुमान है
– 2019 में,भारत का घरेलू दवा बाजार कारोबार 1.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था
– आसानी से उपलब्ध दवाओं के दुरूपयोग को रोकने के लिए और ऑनलाइन फार्मेसियों को विनियमित करने के लिए सरकार एक इलेक्ट्रॉनिक
प्लेटफ़ॉर्म बनाने जा रही है
– अगले पांच वर्षों में भारत में चिकित्सा व्यय 9-12 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है, जिससे भारत दवा खर्च के मामले में शीर्ष 10 देशों में आ जायेगा
– भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है।  UNICEF- 30 % दवाओं और संयुक्त राष्ट्र अपनी 80 % दवाओं की सालाना खरीद भारत से करते हैं
– भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसके 262 फार्मा प्लांट्स US-FDA से मान्यता मिली हुई है
– भारत के पास लगभग 1400 WHO-GMP अनुमोदित फार्मा प्लांट हैं
– साथ ही 253 आधुनिक फार्मा प्लांट्स को European Directorate of Quality Medicines (EDQM) से मान्यता मिली है
– भारत 60 चिकित्सीय श्रेणियों में 60,000 जेनेरिक ब्रांडों का स्रोत है और 500 से अधिक Active Pharmaceutical Ingredients का निर्माण करता है।
– देश में लगभा 3000 फार्मा कंपनी और 10,500 से अधिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का नेटवर्क है
– भारत में उत्पादन की लागत अमरीका से लगभग 33 % कम है
– अमेरिका, यूरोप और दक्षिण एशिया की तुलना में भारत -स्तरीय चिकित्सा सेवाएं कम लागत पर देता है।  इससे Medical Tourism को बढ़ावा मिल रहा है।
– भारतीय फार्मा उद्योग हर बरस करीब 11 बिलियन डॉलर का ट्रेड सरप्लस जेनरेट करता है
– इस सेक्टर में 64% राजस्व अकेले बायो-फार्मा देता है
– देश में लगभग 80 % रिटेल मार्किट ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं का है
– 2018  के आकड़ों के मुताबिक़ इस सेक्टर में करीब 6 लाख लोगों को रोज़गार मिल रहा था
– विशेषज्ञों के मुताबिक़, तमाम मुश्किलों के बावजूद 2025 तक, हमारा फार्मा सेक्टर 45% की विकास दर हासिल कर सकता है, 58 हज़ार अतिरिक्त रोजगार पैदा कर सकता है।  इसमें लगभग 40 % महिलाएं होंगी
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तो आज बस इतना ही