हम मनुष्य हैं, हम नदी का निर्माण करते हैं…

Abhay Mishra

Bhilwara-Water-train राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के रायला कस्बे से लगा एक गांव, गांव के नाम से फर्क नहीं पड़ता, यह भी राजस्थान के हजारों गांवों की तरह ही है. 8 साल की ओढ़नी की तेज और खिलखिलाती आवाज, “बाबा नदी आ गई, बाबा नदी आ गई.” बात तेजी से गांव में फैल गई. बाल्टी, घड़े, भगोने से लेकर जो जिसके हाथ लगा वह लेकर दौड़ा. थोड़ी ही देर में छोटे बच्चों से लेकर बुजूर्गों तक की भीड़ एक ही दिशा में जा रही थी. करीब आठ दस ऊसर खेतों को पार कर तीन एक सौ लोगों की यह भीड़ रूक जाती है. सामने नसीराबाद- भीलवाड़ा वाटर ट्रेन खड़ी है, भीलवाड़ा जा रही इस ट्रेन को गांव के लड़कों ने लाठियां लेकर रूकवाया हुआ है.

ट्रेन के टैंकर का नल खुल गया है और पिछले कई दिनों के खाली पड़े बर्तन भरे जा रहे है. भीड़ के हल्ले में एक उत्साह और मस्ती है, बुजुर्ग उसमें भी सावधानी बरतने की सलाह दे रहें है.

राजस्थान में पानी से मस्ती कोई बर्दास्त नहीं करता, एक बानगी देखिए, वहीं बनाए गए एक अस्थाई चबुतरे पर चढ़कर बच्चे और पुरूष नहा रहे है, उनका नहाया हुआ पानी नीचे एक बड़े से गड्डे में जमा हो रहा है, गड्डे के चारों ओर महिलाएं उसी पानी से कपड़े की पहली धुलाई कर रही है, यहां धुलने के बाद एक बार कपड़ों को साफ पानी से निचोड़ लिया जाएगा. यह पानी भी बेकार नहीं जाएगा . इस पानी परंपरागत तकनीक का प्रयोग कर सोखती कुइयां तक पहुंचाया जाएगा. सोखती कुइयों तक पानी पहुंचने से पहले दो बार फिल्टर होता है.

ट्रेन आगे बढ़ गई है, ड्राइवर और उनके साथियों को गांववालों ने पहले से इकट्ठा किए 600 रूपए दिए है. गांववालों को दाम और दबंगई का संतुलन बिठाना आता है. भीलवाड़ा पहुंच कर ड्राइवर रिपोर्ट फाइल करेंगे कि लीकेज के चलते थोड़ा पानी बह गया है. इस क्षेत्र के कई गांव ट्रेन के इस तरह रिसते पानी के दावेदार है.

ऐसी ही एक ट्रेन पाली जिले के लिए भी चलाई जाती है और साल दर साल इन ट्रेनों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. मात्र तीन महीने के लिए चलने वाली इस ट्रेन को पीएचईडी विभाग करीब 15 करोड़ रूपए का भुगतान करेगा. चार लाख रूपए हर फेरे का किराया है. पचास टैंकर वाली ट्रेन भीलवाड़ा में खड़ी है. स्टेशन प्रशासन पर दबाव है कि पानी को जल्दी मेजा बांध तक पहुंचाया जाए. ट्रेन के स्टाफ के स्वागत के लिए बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद है. भीलवाड़ा स्टेशन के पास ही एक बड़े टैंक को अंतिम रूप दिया जा रहा है. लाखों रूपए की लागत से बने इस टैंक में ही ट्रेन से लाए गए पानी खाली किया जाएगा. इसके बाद पाइप लाइन द्वारा इसे मेजा प्लांट तक पहुंचाया जाएगा. पाइप लाइन को भी बदला जा रहा क्योंकि रख रखाव में कमी के चलते पाइप लाइन सड़ गई है. नसीराबाद रेलवे में हाइडेंट लगाने के ठेके उठाए गए, ताकि ट्रेन के टैंकरों में पानी भरा जा सके.

स्टेशन पर जमा हुए प्रशासनिक अधिकारियों, पत्रकारों और छुटभैये नेताओं के खाने पीने का इंतजाम इन्ही पाइप लाइन, टैंक निर्माण करने वाले और हाईडेंट के ठेकेदारों ने किया है.

water-train-bhilwaraएक समय पूरे शहर की प्यास बुझाने वाला मेजा बांध पूरी तरह सूख चुका है. इस पानी को मेजा बांध में डालने के बाद शहर में सप्लाई किया जाएगा, ताकि हर तीन दिन में एक बार लोगों को पानी मिल सके. राजस्थान के इस क्षेत्र के हालात बयान करना मुश्किल है, आंखों से देखिए तो अमृत की असली अवधारणा समझ आ जाती है. नब्बे के दशक के शुरूआत से ही जिले के प्राकृतिक स्रोत सूखने लगे थे, धीरे – धीरे हालात बदतर होते चले गए और 2003 में भीलवाड़ा को सुखाग्रस्त घोषित किया गया था.

हालात बिगड़ने पर तय किया गया कि जयपुर, अजमेर और टोंक जिलों को पानी पिलाने वाले बीसलपुर बांध से पानी लाकर भीलवाड़ा को पिलाया जाए. इस बात का स्थानीय स्तर पर विरोध तो होना ही था सो हुआ भी. कोई भी अपने हिस्से का पानी नहीं छोड़ना चाहता.

बीसलपुर बांध बनास नदी पर बना है. पानी पर्याप्त था इसलिए सबकी नजर बीसलपुर पर लग गई. अच्छी खासी रकम खर्च होने के बाद ट्रेन नसीराबाद से भीलवाड़ा चलने लगी. लोगों को काम भर का पानी मिलने लगा. धीरे – धीरे बीसलपुर बांध ने लगातार बढ़ रहे बोझ को उठाने से इंकार कर दिया.

पानी की फिर किल्लत हुई तो नीति नियंताओं ने ब्राह्मणी नदी पर नजर डाली, प्रस्ताव पास हुआ कि ब्राह्मणी नदी को बनास से जोड़ कर पानी को बीसलपुर पहुंचाया जाए. अब ब्राह्मणी को बनास से जोड़ने का काम शुरू हो गया है तो ब्राह्मणी पर आश्रित लोग खुद को ठगा महसूस कर रहे है. पानी की कीमत समझने वाले समाज में यह एक लंबी चेन है. बनास और ब्राह्मणी का दोहन करने वाला शासन जानता है कि यह सब बहुत लंबा नहीं चलने वाला है. जयपुर और अजमेर की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, सभी की जरूरतें बीसलपुर से पूरी होती है और बीसलपुर का पेट भरने के लिए दूसरों का हक मारा जा रहा है. अब चंबल नदी का पानी भी जयपुर तक लाने की जुगत लगाई जा रही है. बीसलपुर बांध के पेट में कई बोर कर दिए गए है ताकि जमीन का जो भी पानी बचा है वह ऊपर आ जाए.

मध्य प्रदेश से लेकर गुजरात तक यही खेल खेला जा रहा है. नर्मदा का पानी भोपाल को पिलाया जाने लगा है और कच्छ की सिंचाई का पानी मध्य गुजरात के बड़े शहरों और कारखानों को दिया जा रहा है, पर नदियों की अपनी एक क्षमता होती है . एक का पानी खत्म होने पर विकास के झंडाबरदार दूसरी नदी का पानी ले आएगें.

नदी जोड़ो योजना के पैरोकारों को यह खेल अच्छी तरह पता है. जब इससे भी काम नहीं बनेगा तो तकनीक का उपयोग कर पटरियों पर ही नदी को दौड़ाने लगेंगे. ओढ़नी जैसे बच्चों की सहज सुलभता ने ट्रेन को ही नदी का नाम दे दिया . ओढ़नी के तोतली आवाज में हमारे भयावह भविष्य की चेतावनी छुपी है, जिसे हम पढ़ नहीं पा रहे, कि नदी का विकल्प नहीं होता. तलाब, कुंओं और नहरों का निर्माण होता है लेकिन नदी अवतरित होती है.