क़ुदरत का चेतावनी भरा संदेश

earthquakeभूकंप से एक बार फिर पूरी दुनिया खौफ में है. वजह है दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक के बाद एक आए तीव्र भूकंप. वैज्ञानिक चिंता में हैं और सरकारें दहशत में. धरती के इस तरह बार-बार डोलने को ख़तरे की घंटी माना जा रहा है.

ठीक पांच साल पहले मार्च 2011 में समंदर के नीचे धरती में हलचल हुई और दुनिया ने बड़ी बर्बादी देखी. जापान में 9 तीव्रता का भूकंप आया . चंद सेकेंड बाद समंदर से उठी 10 मीटर से भी ऊंची लहरों ने हजारों बस्तियाँ बर्बाद कर दीं . तीन लाख से ज्यादा इमारतें बह गईं.चार हजार से ज्यादा सड़कों का नामो-निशान मिट गया. इसकी तीव्रता 9 नापी गई . जापान के परमाणु केंद्र इसे नहीं झेल पाए. त्रासदी में करीब 16 हजार लोगों की मौत हो गई . अब पांच साल बाद जापान सरकार और वहां के लोग खौफ ज़दा हैं. खौफ है बड़े भूकंप का. नतीजा यह है कि जापान ने अपने ढाई लाख लोगों को राहत शिविरों में पहुंचा दिया है.

हर तरफ अलर्ट है और सरकारें चौकन्नी . सिर्फ भारत ही नहीं, जापान ही नहीं, म्यांमार और इंडोनेशिया से लेकर अमेरिका तक वैज्ञानिक बिरादरी जमीन के भीतर हलचलों पर निगाह रखे हुए हैं. तमाम आंकड़ों के अध्ययन के बाद कोलोरिडा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का दावा है कि 6 से 7 तीव्रता के आ रहे लगातार भूकंप आशंका पैदा कर रहे हैं

दरअसल अप्रैल के इस महीने में धरती का यह व्यवहार चौंकाने वाला रहा है. अफगानिस्तान, जापान, इक्वाडोर में बड़े भूकंप आए. वैज्ञानिकों की मानें तो ये भूकंप 2015 में नेपाल में आए 7.9 तीव्रता के भूकंप से भी बड़े भूकंप की आहट हैं. नेपाल में आए भूकंप ने इस देश को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था. आठ हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. ऐसा ही भूकंप अब फिर आ सकता है. इसकी वजह भी है. वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती के नीचे की टेक्टोनिक प्लेट्स में बहुत ज्यादा ऊर्जा जमा हो गई है. ये ऊर्जा छोटे-छोटे भूकंपों के जरिए धीरे-धीरे निकल रही है लेकिन ये छोटे भूकंप इस ऊर्जा को पूरी तरह निकाल नहीं पा रहे इसलिए जमीन के भीतर दबी ऊर्जा को निकालने के लिए धरती महाभूकंप का सहारा ले सकती है.

ये महाभूकंप रिक्टर पैमाने पर 9 की तीव्रता से ज्यादा का हो सकता है. तब जो मंजर होगा उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. धरती पर इंसान ने पिछले 100 सालों से भूकंप का लेखा-जोखा रखना शुरू किया है. इस दौरान बड़े-बड़े भूकंपों ने तबाही मचाई लेकिन कभी भी 10 तीव्रता का भूकंप नहीं रिकॉर्ड किया गया. वैज्ञानिकों की मानें तो ये भी एक बड़ी वजह है कि आने वाले वक्त में 10 तीव्रता का भूकंप आने की आशंका जताई जा रही है.

Baramulla: A vehicle demaged after massive earthquake at Rafiabadin Distrct in Baramulla, Jammu and Kashmir on Monday, October 26, 2015. Photo - PTI

FILE | Baramulla: A vehicle demaged after massive earthquake at Rafiabadin Distrct in Baramulla, Jammu and Kashmir on Monday, October 26, 2015.
Photo – PTI

हम भी हैं खतरे में

पिछले हफ्ते हिंदुकुश इलाके में भूकंप के बाद पूरे उत्तर भारत में झटके महसूस किए गए. तभी से ये चर्चा है कि आखिर अप्रैल के महीने में भूकंप बार-बार क्यों आ रहा है. चिंता तो दिल्ली के लोगों को भी है कि अगर देश की राजधानी में इतनी तीव्रता का भूकंप आ गया तो क्या होगा. दिल्ली पर भूकंप की आशंका से तबाही मचने की वजहें भी हैं.

भारत को भूकंप के क्षेत्र के आधार पर चार हिस्सों सिस्मिक जोन-2, जोन-3, जोन-4 तथा जोन-5 में बांटा गया है. जोन 2 सबसे कम और जोन-5 सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है. जोन 5 में जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से आते हैं. उत्तराखंड के निचले हिस्से, उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्से तथा राजधानी दिल्ली जोन-4 में आती हैं. मध्यभारत जोन-3 में दक्षिण भारत के इलाके आते हैं.

साफ है कि दिल्ली दूसरे नंबर के सबसे खतरनाक सिस्मिक जोन-4 में है. दिल्ली फाल्ट लाइन यानी जमीन के नीचे भूकंप के लिहाज से सक्रिय तीन इलाकों की सरहद पर बसी है. ये फाल्ट लाइन हैं सोहाना फाल्ट लाइन, मथुरा फाल्ट लाइन. दिल्ली-मुरादाबाद फाल्ट लाइन. लंबी रिसर्च के बाद आईआईएससी यानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के वैज्ञानिक भी दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और उत्तरकाशी के इलाकों में भयंकर भूकंप आने की चेतावनी दे चुके हैं यानी करीब-करीब पूरा उत्तर भारत भूकंप की चपेट में आ सकता है.

भूकंप की आशंका की वजह जमीन के नीचे भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट में चल रही जबरदस्त रस्साकशी है. पिछले कुछ साल में भारत, पाकिस्तान, ईरान, चीन और आसपास के इलाकों में बार-बार आ रहे भूकंप की वजह भी यही है. वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती में मीलों नीचे भारतीय प्लेट यूरेशिया प्लेट की ओर 45 मिलीमीटर प्रति साल की दर से खिसक रही है. इन दोनों प्लेट्स की इसी रगड़ या दुश्मनी का नतीजा है हिमालय पर्वत. धरती खिसकती रही और पर्वत बनता रहा. अब यही पर्वत आने वाले दिन में बड़ी तबाही की वजह भी बन सकता है. 2012 में छपी एक रिसर्च के मुताबिक हिमालय के केंद्रीय हिस्से में रिक्टर स्केल पर 8 से 8.5 की तीव्रता के कई भूकंप आ चुके हैं. हिमालय का ये हिस्सा ऐसे बड़े भूकंपों की अनगिनत संभावनाएं लिए हुए है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि भूकंप की पूरी भविष्यवाणी तो संभव नहीं है लेकिन ये जरूर पता लगाया जा सकता है कि धरती के नीचे किस इलाके में किन प्लेट्स के बीच हलचल ज्यादा है और किन प्लेट्स के बीच ज्यादा ऊर्जा पैदा होने की आशंका है.

A photo of an Optical Electromagnetic Seismometer used for measuring  seismic waves generated by earthquakes, etc. Image credit: Apple2000/CC BY-SA 4.0

A photo of an Optical Electromagnetic Seismometer used for measuring seismic waves generated by earthquakes, etc.
Image credit: Apple2000/CC BY-SA 4.0

क्यों आता है भूकंप, कैसे मापी जाती है भयावहता

धरती की ऊपरी सतह सात टेक्टोनिक प्लेटों से मिल कर बनी है. जहां भी ये प्लेटें एक दूसरे से टकराती हैं वहां भूकंप का खतरा पैदा हो जाता है. हिमालय के इर्दगिर्द का हिस्सा इंडियन प्लेट कहा जाता है अफगानिस्तान की ओर जाने वाला हिस्सा यूरेशिया प्लेट कहलाता है वहीं उसके बगल में अरब प्लेट और अफ्रीकी प्लेट भी हैं. भूकंप तब आता है जब इन प्लेट्स एक दूसरे के क्षेत्र में घुसने की कोशिश करती हैं, प्लेट्स एक दूसरे से रगड़ खाती हैं, उससे अपार ऊर्जा निकलती है, और उस घर्षण या फ्रिक्शन से ऊपर कीधरती डोलने लगती है, कई बार धरती फट तक जाती है, कई बार हफ्तों तो कई बार कई महीनों तक ये ऊर्जा रह-रहकर बाहर निकलती है और भूकंप आते रहते हैं…इन्हें आफ्टरशॉक कहते हैं.

भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर मापी जाती है. जिसे रिक्टर मैग्नीट्यूड टेस्ट स्केल कहा जाता है. इसे 1935 में कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी के चार्ल्स रिक्टर ने बेनो गुटेनबर्ग के सहयोग से खोजा था. भूकंप की तरंगों को रिक्टर स्केल 1 से 9 तक के आधार पर मापता है. हर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 10 गुना और उससे निकलने वाली ऊर्जा 32 गुना बढ़ जाती है.

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FILE | A view of the destruction caused by an earthquake in Nepal Photo: PTI

दुनिया में आए 10 सबसे बड़े भूकंप

22 मई 1960 को वाल्डिविया, चिली में भूकंप की तीव्रता 9.5 नापी गई थी. सुनामी लहरों ने चिली समेत हवाई, जापान, फिलीपींस, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया तक में तबाही मचाई. सबसे ज्यादा असर चिली के वाल्डिविया शहर में हुआ.

27 मार्च 1964 को अलास्का, अमेरिका में भूकंप की तीव्रता 9.3 मापी गई. अलास्का में उस दिन 4 मिनट 38 सेकंड तक धरती हिलती रही. भूकंप ने अलास्का का नक्शा ही बदल दिया.

26 दिसंबर 2004 को दक्षिण भारत में भूकंप की तीव्रता 9.2 मापी गई. इस दिन समंदर ने भारत के कई शहरों में मौत का तांडव किया. सुनामी लहरों ने मौत का ऐसा विकट जाल बिछाया जिसमें हजारों लोगों की जिंदगी बर्बाद हो गई.

26 जनवरी 2001 को गुजरात के भुज में भूकंप की तीव्रता 7.7 मापी गई. इससे पूरा शहर ही मानो मलबे के ढेर में तब्दील हो गया. कच्छ और भुज में 30 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. डेढ़ लाख से ज्यादा लोग जख्मी हुए और करीब 4 लाख मकान जमींदोज हो गए.

12 जनवरी 2010 को हैती में भूकंप की तीव्रता 7 मापी गई. सबसे ज्यादा तबाही राजधानी पोर्ट ओ प्रिंस में मची. भूकंप के बाद 52 ऑफ्टर शॉक्स महसूस किए गए. इस भूकंप ने एक लाख से ज्यादा लोगों की जान ले ली.

27 फरवरी 2010 को बायो-बायो, चिली में भूकंप की तीव्रता – 8.8 मापी गई. इस भूकंप ने चिली की 80 फीसदी आबादी को प्रभावित किया था. इस भूकंप का दायरा इतना बड़ा था कि चिली के आसपास के सभी देशों में झटकों को महसूस किया गया.

8 अक्टूबर 2005 को पाकिस्तान के क्वेटा में भूकंप की तीव्रता 7.6 मापी गई. एक ही झटके में 75 हजार से ज्यादा लोग मौत के मुंह में समा गए. करीब 80 हजार लोग घायल हुए और 2 लाख 80 हजार लोग बेघर हो गए.

11 अप्रैल 2012 को सुमात्रा, इंडोनेशिया में भूकंप की तीव्रता 8.6 मापी गई. भूकंप का केंद्र जमीन से काफी नीचे होने की वजह से तबाही वैसी नहीं हुई जिसकी आशंका जताई जा रही थी.

11 मार्च 2011 को जापान में भूकंप की तीव्रता 9 मापी गई. सुनामी की लहरों में तीन लाख से ज्यादा इमारतें बह गई. चार हजार से ज्यादा सड़कों का नामो-निशान मिट गया. त्रासदी में करीब 16 हजार लोगों की मौत हुई थी.

25 अप्रैल 2015 को नेपाल में भूकंप की तीव्रता 8.1 मापी गई. 8000 से अधिक मौतें हुईं और 2000 से अधिक लोग घायल हुए. भूकंप के झटके भारत, चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान तक महसूस किए गए.