दिल्ली में थमा भाजपा का विजय रथ

Anugrah Mishra

narendra_modiहरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि ये नतीजे इस बात के गवाह हैं कि ‘मोदी लहर’ अब सुनामी बन चुकी है और ये विरोधियों को ध्वस्त कर देगी.

आज लगता है उस सुनामी को दिल्ली की जनता ने झाड़ू से साफ कर दिया. नतीजे गवाह हैं, आम आदमी पार्टी ने चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की जबकि भाजपा महज़ तीन सीटों पर सिमट गई.

दिल्ली में भाजपा के कई दिग्गजों को शिकस्त झेलनी पड़ी. पार्टी का चेहरा किरण बेदी खुद अपनी सीट भी नहीं बचा सकी. तो क्या माना जाए कि दिल्ली ने भाजपा का विजय रथ रोक दिया.

2014 के आम चुनावों में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली. तीस वर्षों में पहली बार कोई पार्टी अकेले बहुमत का जादूई आंकड़ां हासिल कर सकी.

लोकसभा चुनावों की जीत को ‘मोदी युग’ की शुरूआत के तौर पर देखा गया तो विधानसभा चुनाव के नतीजे उस युग के काल खण्ड बने. देश भर में ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा सफल होता दिखाई दिया.

ऐसा लगने लगा कि मोदी-शाह की ये जोड़ी अपराजय हो चुकी है. लेकिन शायद दिल्ली की जनता ने ये भ्रम तोड़ दिया. दिल्ली में ‘आप’ की जीत ने राजनीति के पुराने मिथकों को अगर तोड़ा नहीं तो झकझोरा जरूर है.

नरेंद्र मोदी के कमान संभालने के बाद भाजपा कोई भी चुनाव नहीं हारी. पार्टी को महाराष्ट्र और हरियाणा में अप्रत्याशित जीत मिली. वहीं जम्मू-कश्मीर में पार्टी 25 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही.

भाजपा के ‘विजय रथ’ की शुरूआत मोदी की अगुवाई के साथ ही हो गई थी. 13 सितंबर 2013 में पार्टी ने नरेंद्र मोदी को आम चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया. 8 दिसंबर 2013 को जब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजे आए तो उनमें भी पार्टी को जबर्दस्त बहुमत हासिल हुआ.

तीन राज्यों में मिली सफलता ने आम चुनाव में भाजपा की जीत को आसान बना दिया. नतीजा सबसे सामने था भाजपा ने आम चुनाव में 282 सीटों पर ऐतिहासिक जीत हासिल और सेनापति अमित शाह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीत के नायक बने.

तब से लेकर अब तक जो विजय रथ चला था वो आज थमा नजर आता है. नाक की लड़ाई बने इस दिल्ली चुनाव में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी. सरकार में केंद्रीय मंत्रियों के साथ 120 भाजपा सांसदों को प्रचार में उतारा गया था ताकि दिल्ली में कमल खिल सके.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद भी दिल्ली में चार रैलियां की. विरोधियों पर जमकर हमला बोला और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन दिल्ली की जनता ने फिर भी आम आदमी पार्टी को चुना.

‘आप’ को दिल्ली में 54.30 फीसदी लोगों का वोट मिला, सीटों के मामले में तो पार्टी बाकी दलों को साफ कर दिया. भाजपा की ओर से चुनाव में जिस तरह का नकारात्मक प्रचार किया गया उसे पार्टी की हार की बड़ी वजह माना जा रहा है.

प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा के तमाम बड़े नेता हर मौके पर ‘आप’ खिलाफ नेगेटिव कैंपेन करते दिखे, जिसके वजह से दिल्ली का वोटर भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर आम आदमी के पाले में खिसक गया.

लोकसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी को पहली बार किसी चुनाव में शिकस्त मिली. देश भर से अन्य राजनीतिक दलों ने भी ‘आप’ की जीत को नरेंद्र मोदी और भाजपा की हार बताया.

बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश से लेकर जम्मू कश्मीर से आम आदमी पार्टी के लिए बधाई संदेश आए. लालू यादव ने इसे नफरत की राजनीति पर लोकतंत्र की जीत बताया तो वाम मोर्चा भी इस जीत से खुश दिखाई दिया.

भाजपा के विरोधी आम चुनाव की हार के बाद शिथिल पड़ गए थे, इसी वजह से आम आदमी पार्टी को देश में एक नए विपक्षी खेमे के तौर पर देखा जा रहा है जो भाजपा का मुकाबला कर सके.