पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन (1924 – 2018)

RSTV Bureau
Vajpayee

Atal Bihari Vajpayee, File Photo

टूटे हुए सपने की सुने कौन किसकी,
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं …… गीत नया गाता हूं

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ये बोल उनकी जिंदगी के फलसफे को बयां करते हैं। उन्होंने अपने करिश्माई व्यक्तित्व और कुशल नेतृत्व क्षमता के दम पर देश की राजनीति में एक अलग पहचान बनाई। 25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे वाजपेयी छात्र जीवन से ही राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे और आजादी के आंदोलनों में भी हिस्सा लिया।

ग्वालियर से शुरूआती शिक्षा हासिल करने के बाद वाजपेयी ने कानपुर से राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रधर्म, पांच्यजन्य, स्वदेश और वीर-अर्जुन का संपादन किया। छात्र जीवन में ही वाजपेयी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संध से जुड़ गए। और आजीवन भारतीय जनसंघ के सक्रिय सदस्य रहे।

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File Photo, Former Prime Minister Atal Bihari Vajpayee

1968 से 1973 तक वो भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे। विपक्षी पार्टियों के दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल जाना पड़ा। मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार में 1977 से 1979 तक वे विदेश मंत्री रहे। इस दौरान 4 अक्टूबर, 1977 को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिन्दी में संबोधित कर भारत का गौरव पूरी दुनिया में बढ़ाया। ऐसा करने वाले वाजपेयी पहले व्यक्ति थे।

1980 में जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद भारतीय जनता पार्टी का गठन किया गया। वाजपेयी इसके संस्थापक सदस्य और अध्यक्ष रहे। इस पद पर वो 1980 से 1986 तक रहे। इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे। ये वाजपेयी के व्यक्तित्व और करिश्माई नेतृत्व का ही नतीजा था कि 1984 के लोकसभा चुनाव में दो सीट जीतने वाली बीजेपी ने 1989 के लोक सभा चुनाव में 85 सीटों पर जीत हासिल की और बीजेपी एक मजबूत पार्टी बनकर उभरी।

भारतीय राजनीति को अलग दिशा देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी 9 बार लोकसभा और 2 बार राज्य सभा के सदस्य चुने गए। वाजपेयी 1957 में पहली बार बलरामपुर संसदीय सीट से जनसंघ के टिकट पर लोकसभा सदस्य चुने गए। 16 मई 1996 को वो पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने,….लेकिन गठबंधन से एआईएडीएमके की समर्थन वापसी से एक बार फिर उनकी सरकार गिर गई।

जिसके बाद 1999 में लोक सभा चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए। इन चुनावों में वाजपेयी का नेतृत्व भी एक अहम मुद्दा था। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। और पहली बार किसी गठबंधन सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। लेकिन 2004 के चुनाव में एनडीए गठबंधन की हार हुई और 2009 में खराब सेहत की वजह से वाजपेयी ने सक्रिय राजनीति छोड़ दी।

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File Photo, Former Prime Minister Atal Bihari Vajpayee

अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए कई अहम कदम उठाए। उन्होंने विज्ञान और तकनीक की प्रगति के साथ देश का भविष्य जोड़ा और जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान का नारा दिया। परमाणु शक्ति को देश के लिए आवश्यक बताकर 11 मई 1998 को पोखरन में परमाणु परीक्षण किए।

वाजपेयी के लिए राष्ट्रहित हमेशा दलगत राजनीति से ऊपर रहा। इसी वजह से उन्होंने परमाणु कार्यक्रम की आधारशिला रखने वाली भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सराहा।  वाजपेयी के उदार चरित्र की वजह से ही वो समाज के सभी तबकों में लोकप्रिय रहे।

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भारत-पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्तों के समर्थक थे, उन्होंने कश्मीर समस्या के हल के लिए राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ के साथ आगरा में शिख़र वार्ता की,  हालांकि उनका ये प्रयास विफल रहा। आर्थिक विकास के लिए अटलजी ने ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ योजना समेत कई योजनाएं शुरू की थी। दशकों तक भारतीय राजनीतिक पटल को अपनी ओजस्वी व्यक्तित्व से चमकाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की शख्सियत, अंदाज-ए-बयां और देश प्रेम का जज्बा कभी भी खत्म नहीं हो सकता। आने वाली पीढ़ियों को राजनीति के इस पुरोधा से कई सदियों तक प्रेरणा मिलती रहेगी।