आईएएस बनने आए छात्र आमरण अनशन को मजबूर

Adil Raza Khan

upsc_protest350पिछले एक साल से अपनी मांगों को लेकर अहिंसात्मक आंदोलन कर रहे आईएएस प्रतिभागी अब अनशन और भूख हड़ताल का रुख़ अख़्तियार कर चुके हैं. देशभर से दिल्ली आए छात्रों का विरोध, संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ली जाने वाली आईएएस परीक्षा में बीते कुछ सालों के दौरान हुए व्यापक बदलावों को लेकर है.

दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में हज़ारों की तादाद में टेंट के नीचे बैठे आंदोलनकारी छात्रों में 50 से ज़्यादा ऐसे भी हैं जो आमरण अनशन पर हैं. इनमें लगभग 20 लड़कियां भी शामिल हैं. 6 जुलाई से आमरण अनशन पर बैठे इन छात्रों के इम्तेहान की तारीख़ महज़ 1 महीने दूर है बावजूद इसके वो अपना क़ीमती वक्त अपने संघर्ष को दे रहे हैं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें इंसाफ की आस है. इन छात्रों के पास न तो कोई राजनीतिक छतरी है जिसके साये में आकर वो अपनी मांगें मनवा सकें और न ही कोई सरकारी पहलक़दमी जो उनके करियर और सपनों के बीच आई बाधा को दूर कर सके.

छात्रों की मांग है कि सरकार इस मामले में दख़ल दे और यूपीएससी की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा (सीसैट) के द्वितीय प्रश्नपत्र को पाठ्यक्रम से तुरंत हटाए. इसके अलावा मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार में अंग्रेज़ी के समकक्ष दूसरी भारतीय भाषाओं को तवज्जो देना भी प्रमुख मांगें हैं.

बदलाव की मार झेल रहे छात्रों के ग़ुस्से ने उस वक्त आंदोलन का रूप ले लिया जब 2013 के आईएएस के नतीजे इस साल जून में घोषित किए गए. छात्रों का दावा है कि इस साल सिविल सेवा के लिए चुने गए कुल 1122 प्रतिभागियों में मात्र 26 प्रतिभागी ही हिंदी माध्यम से चुने गए.

सीसैट के बाद बिगड़ा खेल

दरअसल साल 2011 में यूपीएससी ने सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा के पैटर्न में बदलाव किया और यहीं से शुरू हो गईं सारी उलझनें. नए बदलावों के मुताबिक सामान्य अध्ययन के साथ एक एप्टीट्यूड का पेपर पाठ्यक्रम में जोड़ा गया. एप्टीट्यूड के पेपर में अंग्रेज़ी और मानसिक अभियोग्यता वाले प्रश्नों की बहुलता है. जिसमें गणित और तर्क शक्ति के जटिल प्रश्न शामिल होते हैं.

सीसैट नामक प्रारंभिक परीक्षा के प्रावधान के बाद से लगातार हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों के चयन में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई. एक आंकड़े के मुताबिक साल 2010 की प्रारंभिक परीक्षा में जहां हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं से 38 फीसदी छात्रों का चयन हुआ वहीं साल 2011 में ये आधे से भी कम यानि 17 फीसदी पर आकर अटक गया. इसके बाद क्रमशः 2012 और 2013 में संख्या घटकर और भी कम रह गई.

नए बदलावों के बाद से अंतिम रूप से भी सिविल सेवा चयन पर व्यापक असर पड़ा है. ख़ासकर कला और मानविकी विषयों की पृष्ठभूमि वाले प्रतिभागियों पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिला. वहीं इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट से आए छात्र फायदे में देख गए. 2010 में कला-मानविकी पृष्ठभूमि से 28-30 फीसदी प्रतिभागियों का चयन सिविल सेवा में हुआ जो कि तक़रीबन इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट के बराबर ही रहा. लेकिन 2011 में नए बदलावों के बाद कला पृष्ठभूमि से महज़ 15 फीसदी चयन हुआ इसके ठीक उलट इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट के 50 फीसदी छात्रों ने सफलता प्राप्त की.

सिविल सेवा के इस तरह के नतीजों को हिंदी माध्यम और दूसरे भाषाई माध्यम से तैयारी कर रहे छात्र बेहद शंका की नज़र से देखते हैं. छात्रों का मानना है कि जान बूझकर यूपीएससी द्वारा भेदभाव की नीति अपनाई जा रही है जहां अंग्रेज़ी को ही मान्यता और वरीयता प्राप्त है. छात्रों को ख़ासतौर पर प्रारंभिक परीक्षा के पैटर्न पर एतराज़ है.

आंदोलन में सक्रिय हिंदी माध्यम के छात्र दुष्यंत बताते हैं कि समस्याएं कई स्तर पर हैं. प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट यानि एप्टीट्यूड का पेपर बेहद जटिल अंग्रेज़ी और गणितीय प्रवृति का है जो सामान्यतया इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट स्नातकों के अनुकूल है. इसके बाद मुख्य परीक्षा में अंग्रेज़ी क्वालीफाइंग का पर्चा भी इस दर्जे का है कि बिना अंग्रेज़ी माध्यम और पृष्ठभूमि के छात्र इसे हल करने में सक्षम नहीं. वहीं निबंध का पेपर हिंदी और दूसरी भारतीय भाषा माध्यम में लिखने वालों के बजाय अंग्रेज़ी वालों को वरीयता और ज़्यादा अंक प्रदान किए जाते हैं. इसी प्रकार साक्षात्कार में भी अंग्रेज़ी वालों को वरीयता दी जाती है ताकि अंतिम रूप से ज़्यादा से ज़्यादा अंग्रेज़ी वालों का ही चयन हो सके.

बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले अतहर का मानना है कि प्रारंभिक परीक्षा चूंकि क्वालीफाइंग प्रवृति का है तो इसे हर पृष्ठभूमि मसलन ग्रामीण-शहरी, कला, मानविकी और विज्ञान सभी संवर्गों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए न कि किसी विषय विशेष या टेक्निकल-प्रोफेशनल डिग्री को ध्यान में रखकर. अतहर आगे बताते हैं कि “वर्तमान स्वरूप से ये स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक परीक्षा अभियांत्रिकी और प्रबंधन के छात्रों के नज़रिए से ज़्यादा आसान है. ऐसे हालात में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के अलावा बाकी प्रतिभागी पहली रेस में ही लगभग बाहर हो जाते हैं और ये कुल चयन को प्रभावित करता है.”

ग्रामीण छात्रों के चयन में गिरावट

यूपीएससी की अखिल भारतीय परीक्षा के प्रारूप में इंडिया और भारत का फर्क़ भी महसूस किया जा सकता है. सिविल सेवकों को प्रशिक्षण देने वाले मसूरी स्थित संस्थान, लाल बहादुर शास्त्री अकादमी की साल 2013 में आई रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011 के बाद से ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के चयन में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है. नए बदलाव से पूर्व के तीन सालों (2009, 2010, 2011) में जहां ये तादाद 63-67 फीसदी थी वहीं साल 2012 में घटकर महज़ 27 फीसदी रह गई.

ग्रामीण भारत के खस्ताहाल प्रदर्शन से गांव से आई छात्राएं परेशान हो उठती हैं. सीवान (बिहार) के दूर-दराज़ गांव से ताल्लुक रखने वाली नम्रता एक बेहद ही सामान्य परिवार से हैं और आईएसएस का सपना लेकर दिल्ली आई हैं. नम्रता कहती हैं “मेरे मां-बाप ने काफी संघर्ष कर मुझे दिल्ली पढ़ने भेजा है, मैं अपने गांव से बाहर पढ़ाई करने आई पहली लड़की हूं. मेरी तालीम शुरू से हिंदी में हुई है, जिस तरह के नतीजे सामने आ रहे हैं उससे मुझे बहुत डर लगा रहा है. जबतक हमें अवसर की समानता नहीं मिल पाएगी, हमारा आगे बढ़ना मुश्किल है.”

यूपीएससी परीक्षा में सुधार को लेकर गठित अरुण निगवेकर कमेटी भी नए बदलावों की आलोचना कर चुकी है. बावजूद इसके न तो आयोग न ही सरकार की तरफ से इस बारे में कोई कदम उठाया गया है. आंदोलन कर रहे हज़ारों छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर बीते 28 जून को 25 किलोमीटर की पदयात्रा कर प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना-प्रदर्शन भी किया लेकिन कहीं से उन्हें कोई उम्मीद नज़र नहीं आई. आखिरकार थक-हार कर ये छात्र आमरण अनशन को मजबूर हुए.

सिविल सेवा देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा है जिसमें हर साल करीब 5 लाख छात्र हिस्सा लेते हैं. जिनमें एक बड़ी तादाद ग्रामीण भारत से आए छात्रों की होती है. ज़ाहिर तौर पर ऐसे छात्र हिंदी और दूसरे भाषाई माध्यम और पृष्ठभूमि से शामिल होते हैं. ऐसे हालत में इन छात्रों की चिंता जितनी वाजिब है, उतना ही इस देश की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली पर सवालिया निशान भी. ऐसी चिंताओं को दरकिनार कर भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण देश की नौकरशाही को न तो अखिल भारतीय स्वरूप दे पाना संभव है और न ही समाज के अलग-अलग तबके की लोकतंत्र में भागीदारी और समावेश को सुनिश्चित कर पाना संभव है.