नेपाल से रिश्तों पर कितना प्रचण्ड असर

Pushpa-Kamal-Dahal,-Prachanda,-Nepalनेपाल में पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड के रूप में बदलाव का नया सवेरा हुआ है. यह बदलाव केवल मुल्क की अंदरूनी परिस्थतियों को ही प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि इसका दायरा भारत और चीन तक होगा.

भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो प्रचंड का सत्ता में आना अच्छा संकेत है. ऐसा इसलिए नहीं कि प्रचंड भारत के प्रति कोई विशेष लगाव रखते हैं, बल्कि इसलिए कि पूर्व की ओली सरकार ने नई दिल्ली की मुश्किलें बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. चाहे वह चीन के साथ समझौता हो या भारत में नेपाल के राजदूत दीप उपाध्याय को वापस बुलाना. ओली उन नेताओं में हैं, जो मानते हैं कि भारत मदद के नाम पर नेपाली राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है.

हालांकि नेपाल की भौगौलिक स्थिति के चलते सामरिक लिहाज से भारत के लिए उसका साथ बेहद जरूरी है. इसलिए भारत इस पड़ोसी राज्य में सत्ता तक पहुंचने के लिए होने वाले प्रयासों में अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी सुनिश्चित करता है.

भारत और नेपाल के रिश्ते सदियों पुराने हैं, और इन्होंने काफी उतार चढ़ाव देखा है. असल मायनों में राजा महेंद्र के कार्यकाल के दौरान नेपाल में भारत विरोधी सोच ने आकार लेना शुरू किया. महेंद्र भारत पर अपनी निर्भरता समाप्त करने की जल्दबाजी में चीन के साथ कई ऐसे समझौते कर गए, जिसके दूरगामी परिणाम नई दिल्ली को झेलने थे. 1956 में संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिलने के बाद तो नेपाल ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए चीन के साथ सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते के बाद भारत में सरकार की विदेश नीति, खासकर नेपाल से संबंधों पर उसके रुख की आलोचना हुई. मगर नई दिल्ली ने हालात सामान्य कर दिए. 1988 में जब नेपाल ने पूर्व की संधियों को नजरअंदाज करते हुए चीन से हथियारों की खरीद फरोख्त की तो भारत से दरकते रिश्तों का अहसास एक बार फिर हुआ.

भारत और नेपाल के बीच पूर्व की संधियों में इस बात का उल्लेख था कि यदि नेपाल भारत के अलावा किसी दूसरे मुल्क से हथियार खरीदता है तो उसे भारत की स्वीकृति लेनी होगी. हालांकि इसके बावजूद स्थितियां जितनी पेचीदा आज हैं, उतनी कभी नहीं रहीं. दरअसल भारत नेपाल के स्वछंद विचरण और उसके चीन की ओर आकर्षित होने से असुविधाजनक पाता है. चीन एशिया उपमहाद्वीप में अपना वर्चस्व स्थापित करने के हर संभव प्रयास में जुटा है. कूटनीति के लिहाज से कई मौकों पर उसने भारत को शिकस्त भी दी है.पाकिस्तान पूरी तरह से उसके वश में है. श्रीलंका में उसकी दखलंदाजी काफी हद तक बढ़ गई है. लिट्टे से संघर्ष के दौरान जब मनमोहन सरकार ने जयललिता के दबाव में आकर श्रीलंका को हथियारों की आपूर्ति से इंकार कर दिया था तब चीन ने इस मौके पर भरपूर फायदा उठाया. नक़्शे पर भले ही श्रीलंका हमारा करीबी राष्ट्र है, लेकिन उसका चीन के प्रति झुकाव छिपा नहीं है . यही वजह है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका से संबंधों पर खास ध्यान देना शुरू कर दिया है.

Beijing: Chinese President Xi Jinping, right, shakes hands with Nepal Prime Minister Khadga Prasad Oli, left, inside the Great Hall of the People Monday, March 21, 2016 in Beijing, China. Photo - PTI

चीन की मंशा नेपाल तक अपनी पहुंच को तिब्बत की तरह ही सुगम बनाना है. यदि वो इसमें पूरी तरह सफल हो जाता है तो भारत की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

लेकिन यह मान लेना कि प्रचंड भारत की चिंताओं और शंकाओं के निवारणकर्ता साबित होंगे, सही नहीं है. यह दूसरा मौका है जब प्रचंड प्रधानमंत्री बने हैं. इससे पहले 2008 में उन्होंने सत्ता संभाली थी और तब जो संकेत उन्होंने दिए थे वो भारत हितैषी बिल्कुल भी नहीं थे. प्रचंड ने अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा की शुरुआत चीन से की थी. यह उस परंपरा का टूटना था, जिसे हर नेपाली प्रधानमंत्री निभाता आ रहा था. प्रचंड के सत्ता में आने से पहले तक नेपाली प्रधानमंत्री पहले भारत आते और फिर दूसरे मुल्कों का रुख करते. इतना ही नहीं, प्रचंड ने भारत के साथ पूर्व की सभी संधियों की पुनर्समीक्षा करने की घोषणा भी की थी. उस वक्त दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हो गया था, और यदि प्रचंड ज्यादा वक्त तक सत्ता में रहते तो भारत के लिए स्थितियां बेहद विकट हो जातीं.

पुष्प कमल दहल माओवादी नेता हैं, और प्रचंड की उपाधि उन्हें अपने विद्रोही स्वभाव के चलते मिली. जब माओवादी सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब चीन से उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हर रूप में सहयोग मिला था. ऐसे में अब जब प्रचंड सत्ता में हैं, तो क्या उनके विचारों और फैसलों में चीन का प्रभाव दिखाई नहीं देगा?

अंदरूनी तौर पर नई दिल्ली खुद भी इस बात को लेकर आशंकित है. प्रचंड इस बार ज्यादा शक्तिशाली अवतार में सामने आए हैं. उन्हें नेपाली कांग्रेस के साथ साथ मधेशियों का भी समर्थन हैं. मधेशियों को आशा है कि प्रचंड उस विवादित संविधान को अमल में नहीं आने देंगे, जो सीधे तौर पर उनके अधिकारों का हनन करता है. वैसे भी अधिकतर माओवादी मानते हैं कि नेपाल में गरीबी कीव् मुख्य वजह भारत है. उन्हें लगता है कि भारत ने वादे तो खूब किए, मगर उन पर अमल नहीं किया. प्रधानमंत्री के रूप में क्या प्रचंड इस सोच से खुद को अलग रख पाएंगे? इस सवाल का जवाब भले ही भविष्य के गर्त में हो, लेकिन आशंका यही है कि प्रचंड 2008 के अपने अधूरे कार्यों पर आगे बढ़ेंगे. लिहाजा भारत को बेहद सोच विचार के और नाजुक हाथों से रिश्ते से डोर संभालनी होगी. क्योंकि जरा सी चूक चीन को एक ऐसा अवसर दे जाएगी, जिसका मलाल हमें ताउम्र होता रहेगा.