मैनपुरी में आसान नहीं है साइकिल का सफ़र

Vimal Chauhan

mulayam_singh“लला….अबकी मजा आएय.. दो पहलवान मैदान में हैं…जो ज्यादा ताकतवर होए सो जीत जे…हर बार की तरह नहीं जो कई लड़त उनमें से नेता जी जीत जात हैं…अबकी मुकाबला सीधो सीधो है…”, बुजुर्ग कहते कहते रुक गये…मैनपुरी के हर गली-कूचे में आप ऐसी बातें सुन सकते हैं.

आगामी 13 तारीख के लोकसभा उपचुनाव के रंग में मैनपुरी पूरी तरह से रंग गया है जहां बसपा चुनाव से बाहर है और इस वजह से मुकाबला सीधा-सीधा भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच हो गया है.

इस चुनाव में सपा की ओर से पार्टी सुप्रिमो मुलायम सिंह यादव के पोते तेज प्रताप सिंह यादव चुनाव मैदान में हैं वहीं भाजपा ने मैनपुरी के जातीय गणित को ध्यान में रखते हुए इस शाक्य बाहुल्य संसदीय सीट से शाक्य समाज के प्रेम सिंह शाक्य को मैदान में उतारा है.

मैनपुरी मुलायम का गढ़ है लेकिन लोकतंत्र में गढ़ टूटते भी हैं. रायबरेली में राजनारायण के हाथों इंदिरा गांधी की हार इसका सबसे बड़ा उदाहरण समझा जाता है. लोकतंत्र की इसी ताकत का भय मुलायम सिंह को भी इस चुनाव में सता रहा है.

मतदाता की नब्ज़ समझने की कोशिश करने के पता चलता है कि जहां पिछले चुनाव तक जीत का अंतर चर्चा का विषय होता था वहाँ इस चुनाव में यह चुहलें हार-जीत की चुस्कियों और कहकहों तक आ गई है. मैनपुरी को बेशक मुलायम सिंह ने अपने घर की तरह संभालकर रखा है लेकिन लहरों में घर भी गिरा करते हैं. भाजपा इसी लहर पर सवार होकर दुर्ग में सेंध लगाने की हरसंभव कोशिश कर रही है.

मैदान में मुद्दा

मुलायम सिंह ने मैनपुरी के विकास में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है लेकिन चुनावी मुद्दों की बात करें तो विकास के बजाए जातिवाद और परिवारवाद ज्यादा ज़ोर मारते नज़र आ रहे हैं. जहां एक ओर सपा पर एक विशेष जाति को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया जा रहा है तो वहीं बीजेपी को सवर्ण जातियों की पार्टी के रुप में देखा जा रहा है.

तेज प्रताप यादव के समर्थन में मैनपुरी में सपा द्वारा आयोजित मुलायम सिंह यादव की रैली में अधिकतर स्थानीय नेताओं के भाषण भी जाति केंद्रित रहे. चुनावी मुद्दों में नागरिकों से जुड़ी ज़रूरी सेवाएं मसलन मैनपुरी में 24 घंटे बिजली आपूर्ति और अच्छी सड़कों के होने जैसी बातें चर्चा और प्रचार का विषय नहीं बनाई गईं. अब इसे विडम्बना कहें या जातिवादी राजनीतिक मजबूरी, समाजवादी पार्टी के नेता अपने ही हाथों किए गए विकास को दरकिनार कर जातिवाद को चुनावी मुद्दा बनाने पर तुले हैं.

वैसे, इसकी एक वजह यह भी है कि भाजपा ने विकास के तने पर हमला करने के बजाय जाति की शाखाओं को निशाना बनाया है. इसलिए भी नेताजी किसी भी ईंट को बिना पलटे नहीं छोड़ना चाहते और पार्टी हर दांव जीत के सिद्धांत पर चुनाव की रणनीति बनाकर चल रही है.

भाजपा भी समाजवादी पार्टी को विकास के बजाए परिवारवाद और प्रशासन के दुरुपयोग जैसे मुद्दों पर घेर रही है. भाजपा प्रत्याशी प्रेम सिंह शाक्य ने कहा कि मुलायम सिंह को सिर्फ अपना परिवार दिखता है. पहले भाई, फिर बेटा, बाद में बहू-भतीजे और अब नाती. अल्पसंख्यक और यादवों की हितैषी होने का दावा करने वाली इस पार्टी को इन दोनों समुदायों में से एक भी योग्य उम्मीदवार नहीं मिला जिसे चुनाव में उम्मीदवार बना सकते थे.

भाजपा प्रत्याशी के इस आरोप को सपा उम्मीदवार तेज प्रताप यादव ने खारिज करते हुए कहा कि वे राजनीति में लोगों की सेवा करने के उद्देश्य से आए हैं. तेज प्रताप ने बातचीत में माना कि मैनपुरी ने हमेशा से ही उनके परिवार के लोगों को राजनीतिक वर्चस्व के लिए जमीन दी है.

इन सब के बीच बसपा का मैदान में न होना बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है और सपा को इसका खमियाज़ा भुगतना पड़ सकता है. हालांकि सपा को यादव वोट बैंक के अलावा सवर्ण वोटों से भी उम्मीद है. सपा नेता और राज्य महिला आयोग की सदस्य अर्चना राठौर का दावा है कि क्षत्रिय समुदाय भी एकजुट होकर सपा का समर्थन कर रहे हैं.

सपा पर प्रशासन के दुरुपयोग और बसपा के परंपारिक वोटरों को डराने और धमकाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं. जाटव जाति से ताल्लुक रखने वाले करीब 300 लोगों के गांव में कोई सीधे मुंह खोलकर कुछ नहीं कहना चाहता. लेकिन बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा तो नाम न बताने की शर्त पर एक ने कहा कि बाबू जी सुरक्षा केवल पोलिंग बूथ पर होती है न कि पोलिंग बूथ तक जाने वाले रास्तों पर. हमें रास्ते में रोक कर और डरा धमका कर वोट नहीं डालने दिया जाता है. सपा को समर्थन के सवाल पर उन्होंने कहा कि बहन जी नहीं तो बीजेपी, हम गेस्टहाउस कांड को अभी भूले नहीं हैं. यह वोट बसपा का जनाधार है, सपा के लिए सेंध है और भाजपा के लिए उम्मीद है.

भाजपा ने सपा पर राज्य की मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप भी लगाया है. फर्रुखाबाद से बीजेपी सासंद मुकेश राजपूत के अनुसार डीएम और एसपी सपा के नुमाइंदे के तौर पर काम कर रहे हैं और सपा प्रशासन का इस्तेमाल कर चुनावों में धांधली करवा सकती है.

इन सब बातों के बावजूद 24 घंटे बिजली, परंपारिक यादव वोट और मुलायाम सिंह यादव का क्षेत्र से जुड़ाव सपा के किले को गिरने से शायद बचा ले जाए लेकिन बदले राजनीतिक परिदृश्य ने सपा के इस अभेद्य दुर्ग की दीवारों में दरारें तो डाल ही दी हैं.