मीडिया मोनोपोली के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून की ज़रूरतः पी साईनाथ

Amrita Rai

P_sainathसवाल- मीडिया सृजनशीलता का मध्यम है, सृजनशीलता के अलग-अलग माध्यमों के ज़रिए ये दावा किया जाता है कि मीडिया समाज का आइना है. क्या मीडिया के इस आइने में समाज और देश अपना चेहरा देख पा रहा है.

जवाब- मुझे ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता. पिछले 20 वर्षों में मीडिया का सबसे ज़्यादा बाज़ारीकरण हुआ है. उसका अपना एक वैल्यु-सिस्टम है. मीडिया की आत्मा आज ग़ायब हो चुकी है. मीडिया को जहां से पैसा मिलता है वह वहीं पर फ़ोकस करता है. आज एक भी संवाददाता श्रमिकों, मजदूरों के लिए नहीं है, रोज़गार बीट को कोई कवर ही नहीं करता. भारत में लेबर इंप्लॉयमेंट एक्सचेंज में चार करोड़ से ज़्यादा लोग अपना पंजीकरण करा चुके हैं. बताइए उसे कितने पत्रकार कवर कर रहे हैं.

आखिर क्या वजह है कि मास रियलिटी से मास मीडिया दूर हो रहा है.

मैं समझता हूं कि जहां एक समाज अपने आप में खुद बहस करे, वह सबसे अच्छी पत्रकारिता है. ग्रामीण भारत में 83.6 करोड़ लोग जो 780 भाषाओं में बात करते हैं, उन्हें कितने पत्रकार कवर करते हैं लेकिन बॉलीवुड को पूर कवरेज मिलता है. भारत में सबसे ज़्यादा जुलाहा समुदाय उत्तर प्रदेश में है लेकिन वे मीडिया कवरेज से बाहर हैं. कृषि समेत ग्रामीण भारत की बहुत सी चीजें आज मीडिया की कवरेज से बाहर हैं. इस सीज़न में महाराष्ट्र के नांदेड़ ज़िले में 120 किसानों ने आत्महत्या की, दो जून से अब तक तेलंगाना के मेडक में 500 से ज़्यादा किसान मर गए. आप बताइए कहां है उनकी कवरेज लेकिन मुंबई में मॉडल मर जाए तो उसकी पूरी कवरेज होती है. नेशनल सैंपल सर्वें ऑर्गेनईज़ेशन के ताज़ा आकड़ों के मुताबिक किसानों की औसत आय 6500 से कम है. कहां है इस ख़बर की कवरेज.

दिन-प्रतिदन मीडिया के विस्तार होने के बावजूद भी ग्रामीण भारत से मीडिया की दूरी क्यों बढ़ रही हैं.

देखिए भारत की मीडिया में एक ऐतिहासिक विरोधाभास है. वर्ष 1890, 1900 के दशक में गांधी, बालगंगाधर तिलक के दौर में एक छोटा सा मीडिया बहुत बड़े बड़े सामाजिक कार्यों को अंजाम देता था लेकिन आज 2015 में एक बहुत बड़ा मीडिया भी संकीर्ण हो चुका है. आज कपास पैदा करने वाले किसान की क्या हालत है, 1973 में एक कुंतल कपास बेचकर आप 15 ग्राम सोना खरीद सकते थे लेकिन आज आठ कुंतल कपास बेचने पर 10 ग्राम सोना मिलता है. इसके लिए हमारे देश की बदलती हुई आर्थिक नीति ज़िम्मेदार है जिसकी मीडिया में कोई कवरेज नहीं होती है.

क्या बढ़ते हुए शहरीकरण की तरफ़ मीडिया का वास्तविक ध्यान जा रहा है.

नहीं, बिल्कुल नहीं. शहरों में भी मीडिया एक ख़ास तबक़े तक ही सीमित है. वह एक ख़ास तबके को ही कवरेज देता है. बैंकिंग और शेयर बाज़ार कवर करने लिए तो उसके पास रिपोर्टर हैं लेकिन बताइए कि कितने लोग खेती को कवर करते हैं. कितने लोग ग़रीबी को कवर करते हैं. दरअसल, दिल्ली में जिसे लोग एग्रीकल्चर कोरेस्पांडेंट कहते है वह कृषि को नहीं कवर करता बल्कि कृषि मंत्रालय को कवर करता है.

आप हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की बात करते है. आप का एक मशहूर कथन है कि- इफ़ दि इंडियन प्रेस कवर्स टॉप फ़ाइव परसेंट, आई शुड कवर बॉटम फ़ाइव परसेंट… क्या आपके इस टॉप 5 फ़ीसद कवरेज को हम आपके वेब पोर्टल पर देख पाएंगे.

जी बिल्कुल आप ऐसा www.ruralindiaonline.org पर आप देख सकते है. यह बिल्कुल फ़्री-एक्सेस वेबसाइट है. हमारे वेब पोर्टल में 250 से ज़्यादा पत्रकार जुड़ चुके है. ये लोग हमसे क्यों जुड़ रहे हैं क्योंकि इनकी बेहतर स्टोरी को मीडिया नहीं दिखाती है. मैं कुछ पत्रकारिता के स्कूलों में पढ़ाता हूं. मुझे ऐसा लगता है कि आज के युवाओं में बेहतर काम की समझ है और वो काम करना चाहते हैं. इस प्रोफ़ेशन में वे आते ही हैं एक बेहतर सोच के साथ. हमारे नौजवान ग्रामीण क्षेत्रों में काम करना चाहते हैं लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल पाता है.

क्या बेहतर पत्रकारिता करने के लिए आज हमें मीडिया के नए माध्यमों की ज़रूरत है.

देखिए मुख्यधारा की मीडिया में काम करने की जगह तेज़ी से सिकुड़ रही है. आज टीवी में रेवेन्यु मोड आ चुका है. आजकल फ़ोर्थ एस्टेट और रीयल एस्टेट में कोई फ़र्क नहीं रह गया है. इनके बीच की रेखा आज अख़बारों से ग़ायब हो चुकी है. टीवी चैलनों पर 12 घंटे की पैनल बहस तो चलती है लेकिन फ़ील्ड रिपोर्टिंग खत्म हो चुकी है.

क्या विचार और ज्ञान को बढ़ाने की ज़िम्मेदारी मीडिया में बची है.

हां लेकिन हमें अहम मुद्दों के लिए स्पेस बढ़ाने की ज़रूरत है. मुझे लगता है कि अगले 15 साल में जब ब्रॉडबैंड का विस्तार होगा तो अख़बार की क्राइसिस बढ़ जाएगी. इन हालातों में वही पेपर ज़िंदा बचेंगे जो विशिष्ट रिपोर्टिंग करेंगे.

क्या अब फ़ूड सिक्यूरिटी को देखने का नज़रिया पहले से बेहतर हो पाया है.

नहीं, बिल्कुल नहीं. उत्पादन की बड़ी समस्या है क्योंकि फ़ूड क्रॉप की ज़मीन घट रही है और कैश क्रॉप की ज़मीन बढ़ रही है. पिछले 20 वर्षों में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न औसत तेज़ी से गिरा है.

ऐसा माना जाता है कि सरकार किसानों को सबसे ज़्यादा सब्सिडी देती है फ़िर भी उनकी आमदनी घट रही है, वो आत्महत्या कर रहे हैं. आखिर क्यों.

आप खुद ही चेक कर लीजिए कि किस किसान को कितनी सब्सिडी मिली है. एग्रीकल्चर क्रेडिट डेटा के मुताबिक दिल्ली और चंडीगढ़ के किसानों को 32 हज़ार करोड़ दिए गए. मैं पूछता हूं कि दिल्ली और चंडीगढ़ में किसान रहे कहाँ जो इतने पैसे देने पड़े. सब्सिडी एक एग्रीकल्चर लोन है.

भूमि अधिग्रहण बिल पर कई जन संगठनों ने विरोध किया. क्या आपको इनका विरोध सही लगता है.

केवल जनसंगठन ही नहीं, आम लोग भी विरोध कर रहे हैं. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी कंपनियां किसानों से ज़मीन लेकर उन्हें हटा देती हैं. फिर ज़मीन को किराए पर दे देते हैं और उस ज़मीन पर बैंकों से लोन भी ले लेते हैं. मैं इसे लैंडग्रैब बिल कहता हूं.

क्या मीडिया में आज विविधता की ज़रूरत है. ख़बरों की भूख को मिटाने के लिए किस तरह की विविधता को अपनाया जाए.

देश में क्रॉस ओनरशिप मीडिया रिस्ट्रिक्शन की ज़रूरत है. इसके तहत एक आदमी एक शहर में मीडिया के एक से ज़्यादा माध्यम को नहीं खरीद सकता है. आज मीडिया के मालिक बहुत मज़बूत लोग हैं. उनसे कोई लड़ नहीं सकता है. 2009 में राज्यसभा में पेड़ न्यूज़ पर एक बहुत अच्छी बहस हुई थी लेकिन अगले दिन उसे केवल एक अख़बार ने ही छापा. आप इससे मीडिया की ताक़त का अंदाज़ा लगा सकते हैं. मीडिया मोनोपोली के ख़िलाफ़ आज सख़्त क़ानून की ज़रूरत है.