MGNREGA के दस साल

FILE: MGNREGA workers at a site. Photo-PTI

FILE: MGNREGA workers at a site.
Photo-PTI

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा को 10 साल पूरे हो गए । सवा सौ करोड़ के मुल्क़ में किसी भी योजना के लिए इतना लंबा सफर तय करना एक उपलब्धि से कम नहीं है। मनरेगा की नींव 2006 में पड़ी। तब से अब तक इस पर 3.13 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। उस समय योजना का मुख्य उद्देश्य गांवों से शहरों की तरफ होने वाला पलायन रोकना था। मनरेगा के सफर में भी इस दौरान कई उतार-चढ़ाव आए।

एक वक्त ऐसा भी आया, जब इस योजना के औचित्य पर भी सवाल उठे । हालांकि इसकी वाजिब वजह भी रहीं। चूंकि मनरेगा का लाभार्थी वर्ग अशिक्षित था, इसलिए लागू होने के साथ ही अधिकारों के दुरूपयोग की शिकायतें भी मिलीं । जिन लोगों पर रोजगार देने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने इसे बखूबी निभाया। लेकिन कभी कभी विचलन भी हुआ ।

अक्सर फाइलों से निकलकर धरातल पर आने वाली कई सरकारी योजनाएं तंत्र का शिकार हो जातीं है, लेकिन मनरेगा के मामले में अच्छी बात रही कि यहां घाव के उपचार का दिखावा नहीं किया गया।

शिकायतें सामने आने के बाद फौरी तौर पर कुछ कदम उठाए गए और वक्त के साथ-साथ योजना के स्वरूप एवं संचालन में बदलाव भी हुए । यही वजह है कि मनरेगा 10 साल का लंबा सफर तय कर सकी। मनरेगा को समझने में शुरुआती तौर पर कई गलतफहमियां भी हुईं। मसलन, कहा गया कि 100 दिनों के काम की गारंटी लोगों को आलसी बना देगी, इस पर होने वाला भारी-भरकम खर्चा पाटने के लिए विकास से समझौता करना पड़ेगा, आदि। राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक ने मनरेगा पर सवाल उठाए। यहां तक कि वर्ल्ड बैंक की तरफ से 2009 की अपनी रिपोर्ट में मनरेगा को विकास बाधा समझा गया । मगर समय के साथ-साथ जैसे-जैसे गांवों में खुशहाली की तस्वीर सामने आने लगी, लोगों की सोच भी बदलने लगी।

वर्ल्ड बैंक की 2014 की रिपोर्ट इसका सबसे बड़ा सबूत है, जिसमें मनरेगा को ग्रामीण विकास का शानदार उदाहरण बताया गया। ये बात भी अब पूरी तरह साफ हो गई है कि मनरेगा ने ग्रामीणों को आलस नहीं बल्कि मेहनत करना सिखाया है।

मनरेगा के तहत महज हाजिरी ही मजदूरी का आधार नहीं है, निर्धारित काम के पूरा होने पर ही न्यूनतम मजदूरी दी जाती है। यानी अगर ग्रामीण आलसी हो जाएंगे तो उनकी उत्पादकता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं रहेगी और इस स्थिति में उन्हें न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे मिलेंगे।

मनरेगा की एक और अच्छी बात है उसका स्वरूप, जिसके चलते केवल उसी वर्ग को फायदा पहुंच रहा है जिसे रोजगार की सबसे ज्यादा जरूरत है। सरल शब्दों में अगर कहें तो काम से जुड़ी शर्तें और कम मजदूरी ने उन ग्रामीणों को आकर्षित नहीं होने दिया, जिनके पास कमाई के अच्छे विकल्प हैं। ऐसे में न तो अनावश्यक रूप से योजना का दायरा बढ़ाने की जरूरत पड़ी और न ही जरूरतमंदों को काम के इंतजार में बैठना पड़ा। यहां मनरेगा को लेकर मौजूदा सरकार की परिपक्वता भी सामने आई ।

हमारे राजनीतिक इतिहास में ऐसी कई योजनाएं दर्ज हैं जिन्हें अच्छी होने के बावजूद महज इसलिए दफना दिया गया, क्योंकि उनकी नींव विरोधियों के कार्यकाल में डाली गई थी।

सरकार ने मनरेगा के 10 साल पूरा होने के मौके पर इसकी उपलब्धियों को राष्ट्रीय गर्व और उत्सव का विषय करार दिया है। साथ ही इसकी मजबूत के लिए कदम उठाने की बात कही है। मनरेगा में कुछ जगहों पर काम न मिलने या समय पर काम का पैसा न मिलने जैसी शिकायतें अब भी सुनने में आ जाती हैं। इसमें सुधार की जरूरत है।