श्रीलंका राष्ट्रपति चुनावः मुखर है अल्पसंख्यक मुद्दा

Dilip Khan

mahinda_srilankaआठ जनवरी को श्रीलंका में निर्धारित समय से दो साल पहले राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है.

महिंदा राजपक्षे ने 2009 में एलटीटीई सफाया अभियान के दौरान अपनी ‘राष्ट्रभक्ति’ को सिंहला आबादी के बीच जिस तरह पैबस्त कर अगले ही साल 2010 में मध्यावधि चुनाव करवाया था, तो तमिलों सहित बाक़ी अल्पसंख्यकों के तमाम नफ़रतों के बावजूद जीतकर सत्ता में पहुंचे. तब से लेकर अब तक श्रीलंका के हालात बहुत बदल चुके हैं.

राजपक्षे की पार्टी यूपीएफ़ए ने जिस गठबंधन की बदौलत श्रीलंका के राजनीतिक गलियारों में आगे की राह देखना चाहते थे, उसमें पिछले साल भर में फूट पड़ने के बाद कई बड़े नेताओं ने अपनी राहें जुदा कर ली.

श्रीलंका में मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों के प्रति स्टेट के रवैये को लेकर जिस तरह एक तबके में नाराजगी थी उसके काउंटर में पिछले 4 साल में बहुसंख्यक सिंहलाओं के सेंटीमेंट धीरे-धीरे राजपक्षे के प्रति कमज़ोर होने लगा. लिहाजा चुनाव के लिए ये माक़ूल वक़्त मानते हुए उन्होंने चुनाव करवाने का फ़ैसला किया.

दूसरी अहम बात ये है कि इस वक़्त श्रीलंका की अर्थव्यवस्था और उसके आंकड़े राजपक्षे के पक्ष में हैं. 2012 में औंधे मुंह गिरी आर्थिक वृद्धि दर पुराने स्तर पर लौट चुकी है और इस वक़्त दक्षिण एशिया में सर्वाधिक तेज़ी से श्रीलंका आगे बढ़ रहा है.

ये सारे आंकड़े राजपक्षे को नया चुनाव कराने के लिए आत्मविश्वास पैदा करने वाले हैं. लेकिन तमिलों के बीच जिस तरह राजपक्षे का नकार है उस भाव को विपक्ष के साझा उम्मीदवार मैत्रिपाला सिरिसेना अपनी मज़बूत दावेदारी पेश कर रहे हैं.

वहां के कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में भी सिरिसेना को वजनदार बताया जा रहा है. लेकिन तमिलों के हितों के पक्षधर बने सिरिसेना चुनाव की घोषणा से ठीक पहले तक राजपक्षे सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे. सिर्फ़ विपक्ष में खड़ा हो जाने से वो लकीर की सुरक्षित तरफ़ जाकर राजपक्षे के ख़िलाफ़ वो तमिलों के हीरो बनने की कोशिश में हैं. ये आसान तरीका भी है.

हालांकि तमिल नेशनलिस्ट एलायंस सहित कई अल्पसंख्यक समूहों ने उन्हें अपना समर्थन दिया है और वो तकरीबन सारी बड़ी राजनीतिक पार्टियों की तरफ़ से सर्वस्वीकृत उम्मीदवार के तौर पर दावेदारी ठोक रहे हैं. लेकिन, 2010 में भी विपक्ष लामबंद होकर राजपक्षे के ख़िलाफ़ उतरा था लेकिन उस वक़्त सारथ फोंसेका को क़रीब 20 लाख वोट से हार का मुंह देखना पड़ा था.

मध्यावधि चुनाव की पुरानी रणनीति के टोटके इस बार महिंदा राजपक्षे के लिए कितना कारगर होगा कितना नहीं, उससे ज़्यादा दिलचस्पी लोगों को ये देखने में है कि क्या 18वें संविधान संशोधन के बाद श्रीलंका की जनता उनमें फिर से भरोसा करेगी?

18वें संविधान संशोधन के ज़रिए राजपक्षे ने ये शक्ति हासिल की कोई भी राष्ट्रपति तीसरी बार भी चुनावी मैदान में उतर सकता है. यही नहीं, उन्होंने राष्ट्रपति के अधिकार को इतना बढ़ा दिया कि वो संसद की कद से भी बड़े हो गए.

सिरिसेना अपने घोषणापत्र में वादा कर रहे हैं कि अगर वो राष्ट्रपति चुने गए तो राष्ट्रपति के अधिकार में वो कटौती करेंगे.

तमिलों को लेकर अब राजपक्षे ने भी नरमी बरती है और अपने घोषणापत्र में वो 2009 के युद्ध अपराध की स्वतंत्र जांच कराने का वादा कर रहे हैं. इसकी वजह ये है कि श्रीलंका के उत्तरी प्रांत में तमिल बहुसंख्यक हालात में हैं और देश में इनकी कुल आबादी 11.21 प्रतिशत है.

लेकिन राजपक्षे की इन तमाम नर्मियों के बावजूद तमिलों में उनकी स्वीकार्यता नहीं है. सलमान ख़ान जब अभी उनके प्रचार के लिए श्रीलंका गए तो तमिल संगठनों ने मुंबई में सलमान के घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया. भारत की राजनीतिक पार्टियां, ख़ासकर दक्षिण भारत की राजनीतिक पार्टियां, इस चुनाव पर गहरे नज़र रखी हैं.