कार्टून की दुनिया के महानायक से आख़िरी मुलाक़ात

Rajesh Badal

laxman_cartoonistउस दिन पानी बरस रहा था. मैं अपनी कैमरा टीम के साथ पुणे में था और आरके लक्ष्मण से मिलने जा रहा था. रोमांचित था. बचपन से जिसका नाम सुनता रहा, उससे मुलाक़ात होने वाली थी. मेरी 38 बरस की पत्रकारिता का यह संयोग ही था कि लक्ष्मण से मिलने का कभी मुहूर्त ही नहीं आया. महीनों से उनके परिवार के साथ एक घंटे की फ़िल्म के लिए बातचीत चल रही थी. राज्यसभा टीवी के प्रस्ताव पर उनका परिवार सहमति दे चुका था लेकिन मुश्किल यह थी कि लक्ष्मण का बोलना क़रीब क़रीब बंद था. हमें सिर्फ विजुअल्स ही मिल सकते थे इसलिए शुरुआत में थोड़ी झिझक थी. एक-दो महीने तो इंतज़ार किया. फिर लगा कि देरी ठीक नहीं होगी. इस वजह से हम पुणे जा पहुंचे थे. वह 30 जुलाई 2014 की तारीख़ थी.

हम लक्ष्मण के ड्राइंगरूम में थे. सामने थे आरके लक्ष्मण. व्हीलचेयर पर. उनकी पत्नी कमला लक्ष्मण अपने हाथों से उन्हें नाश्ता करा रही थी. कुछ देर तो हम इस जोड़ी को देखते ही रहे. 94 साल के लक्ष्मण. भव्य और गरिमामय. किसी देवदूत की तरह. लक्ष्मण ने नाश्ता ख़त्म किया और हमें देखकर मुस्कराए. बोल तो नहीं सकते थे, लेकिन उनकी ओर से कमला जी ने बातचीत शुरू कर दी. बेबाकी के साथ.

दरअसल कमला लक्ष्मण की सगी भांजी हैं. बड़ी बहन की बेटी. इस तरह से लक्ष्मण उनके सगे मामा हुए. बचपन में लक्ष्मण कमला को गोद में लिए घूमते थे. इस तरह कमला ने जबसे होश संभाला, लक्ष्मण को अपने करीब पाया. जब बड़ी हुईं तो एक तरह से उनकी पूजा करने लगीं. कोई 70-75 साल पहले के हिन्दुस्तान में मामा-भांजी की शादी का विरोध तो होना ही था. लक्ष्मण और कमला नहीं झुके. आख़िरकार विरोध ठंडा पड़ गया. शादी के बाद लक्ष्मण ने वो पारी खेली, जिस पर दुनिया भर के कार्टूनिस्ट सदियों तक सिर झुकाते रहेंगे.

जब शादी की बात चल रही थी, तो लक्ष्मण हौले से मुस्कराए. आँखों ही आँखों में शायद कहना चाह रहे थे कि ब्याह की बात लम्बी मत खींचो, लेकिन कमला जी भी तब तक रौ में आ चुकी थीं. कमला ने हमें लक्ष्मण की ज़िन्दगी के तमाम अनछुए पहलुओं से परिचित कराया. उन दिनों मैसूर अलग रियासत होती थी. उसके पास सलेम ज़िले के रासीपुरम गाँव में आरके का जन्म हुआ. पिता का नाम था कृष्णस्वामी. लक्ष्मण का नाम और गाँव का नाम मिलकर बना- रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण. सारे भाई बहनों में सबसे छोटे थे. बड़े भाई थे आरके नारायण, जिन्हें दुनिया अँगरेज़ी के जाने माने लेखक के तौर पर जानती है. दोनों भाइयों के स्वभाव में जबर्दस्त विरोधाभास था. नारायण पढ़ाकू और लिक्खाड़. लक्ष्मण खिलंदड़ और पढ़ने लिखने से दूर भागते थे. शौक एक ही था- घर में जहाँ भी खाली जगह दिखती, रेखाचित्र बनाने लग जाते. दीवार, फर्श, दरवाज़े, खिड़कियाँ- सभी पर लक्ष्मण रेखाओं का हुनर दिखाते रहते. एक दिन माँ ने समझाया, “बेटा कम से कम ग्रेजुएट तो हो जाओ. घर में कौन सा कारोबार चल रहा है, जो बिना पढ़े लग जाओगे. लक्ष्मण को लगा, माँ ठीक कहती है. इसके बाद उन्होंने पढाई पर ध्यान देना शुरू कर दिया, लेकिन रेखाओं से नाता बना रहा. सुनने में हैरानी होती है कि मुंबई के जाने माने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स ने लक्ष्मण को एडमिशन के अयोग्य माना था. वर्षों बाद उसी स्कूल ने उन्हें अपने सालाना जलसे में बतौर चीफगेस्ट बुलाया. इस तरह के संयोग तो लक्ष्मण की ज़िन्दगी में भरे पड़े हैं.

laxman_cartoonist2हिंदुस्तान टाइम्स ने उन्हें संघर्ष के दिनों में नौकरी नहीं दी. बाद में उन्हें दुर्गारत्न से सम्मानित किया. इंडियन एक्सप्रेस में उन्हें रोज़गार नहीं मिला. अरसे बाद उसी समूह ने गोयनका अवार्ड दिया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में महीनों तक पॉलिटिकल कार्टून बनाने का मौक़ा नहीं मिला और एक दिन घर बैठे थे तो संपादक ने बुलाकर पॉलिटिकल कार्टून बनाने का न्यौता दिया. आगे जाकर टाइम्स ऑफ़ इंडिया में नौकरी माँगने पहुंचे तो ढाई सौ रूपये महीने पगार चाही थी. नौकरी मिली तो पांच सौ रूपये महीने के वेतन पर. आज अख़बारों में कार्टूनिस्ट को संपादक बुलाते हैं और विषय देते हैं. लक्ष्मण के केबिन में प्रवेश करने से पहले संपादक दस बार सोचते थे और अनुमति लेकर ही आते थे. उम्र के लिहाज़ से ही भले ही लक्ष्मण टाइम्स ऑफ इंडिया से सेवानिवृत हो गए थे, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने उन्हें कभी रिटायर नहीं किया. टाइम्स ऑफ इंडिया से उन्हें बाद में भी सारी सुविधाएँ मिलती रहीं, जब तक कि लक्ष्मण ने वे लौटा नहीं दीं. और सबसे बड़ा विरोधाभास तो यही था कि लक्ष्मण की रेखाओं में दिलचस्पी तो थी, लेकिन कार्टूनिस्ट बनने में नहीं. वे कहते थे, “मैं तो दुर्घटनावश ये काम करने लगा”.

जिस बरस देश आज़ाद हुआ, उसी बरस लक्ष्मण ने टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ पारी शुरू की. उन दिनों लक्ष्मण के आराध्य थे सर डेविड लॉव. लक्ष्मण को उनका अंदाज़ लुभाता था. मन ही मन वो डेविड लॉव की पूजा करने लगे. मज़ेदार यह है कि डेविड लॉव कार्टून में हस्ताक्षर कुछ इस तरह करते थे कि वह कॉव नज़र आता. लक्ष्मण उन्हें कॉव ही समझते थे. बहुत बाद में यह भेद खुला. लक्ष्मण ने कहीं लिखा, “मन ही मन मनाया करता था कि कहीं से मेरी भेंट सर डेविड लॉव से हो जाए. मेरे वह आदर्श थे. एक दिन जब मैं अपने दफ्तर पंहुचा, तो मैंने पाया कि एक बुजुर्ग दंपत्ति मेरे कमरे में बैठे थे. मैं हैरान. मेरे कमरे में यूं ही कोई आकर नहीं बैठ सकता था. मैं कुछ पूछता, उससे पहले ही उन सज्जन ने पूछा- क्या आप ही आरके लक्ष्मण हैं? मैंने उत्तर दिया, “हाँ! मगर आप? उन्होंने कहा, “ये मेरी पत्नी हैं और मेरा नाम है डेविड लॉव. मैं आपका प्रशंसक हूँ और अपने डॉक्टर से मिलने कलकत्ता जा रहा हूँ. आपका बड़ा नाम सुना था और आपसे मिलने ही मुंबई आया हूँ”. आप कल्पना कर सकते हैं लक्ष्मण की हालत क्या हुई होगी. वो हक्का बक्का थे. उनके आराध्य सामने थे और कह रहे थे मैं आपका दीवाना हूँ. आपसे मिलने ही मुंबई आया हूँ. यह शिव और राम जैसा संवाद हो गया. लक्ष्मण भाव विह्वल हो गए और उन्होंने लॉव दंपत्ति को आग्रहपूर्वक रोका. दो दिन तक मुंबई की सैर कराई. फिर विदा कर दिया. कितने लोगों की ज़िन्दगी में ऐसा होता है?

देश भाग रहा था. नई मंजिलें तय करते हुए और समस्याओं से जूझते हुए. लोकतंत्र मज़बूत होता दिखाई दे रहा था तो नई बीमारियाँ भी देश की देह में घर कर रही थीं. भ्रष्टाचार, गरीबी, असमानता, रोजमर्रा की समस्याएं और भी बहुत कुछ. लक्ष्मण की रेखाओं में देश का ये सफर उभर कर आ रहा था.

कुछ ही वर्षों में वो देश ही नहीं, दुनिया के चहेते कार्टूनिस्ट बन गए थे. बड़े-बड़े नेता चाहते थे कि वो कम से कम एक बार लक्ष्मण के हाथ से निकलकर काग़ज़ पर उतरें. पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी लक्ष्मण से सवाल करते, “भई! टोपी तो मेरी पहचान है और आप मुझे हमेशा नंगे सिर दिखाते हैं. क्यों? इंदिरा गांधी पूछतीं, “मेरी नाक तोते जैसी इतनी लम्बी क्यों दिखाते हैं? मोरारजी देसाई अपने कार्टून पर मुस्करा देते. राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तो उनका तकिया कलाम बन गया था, आई विल लुक इन टू द मैटर. एक बार दोनों मिले तो राजीव ने पूछा, ‘सर! मुझे कार्टून में इतना मोटा और टेढ़ा मेढ़ा क्यों दिखाते हैं? शांत लक्ष्मण ने कहा, आई विल लुक इन टु द मेटर. जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान प्रेस सेंसरशिप लगाई, तो लक्ष्मण सीधे उनसे मिलने पहुंचे. बोले, ये ग़लत है. इंदिराजी ने कहा, “आप अपना काम करिए. आपको कोई नहीं रोकेगा.” तो ये थी लक्ष्मण की रेखाओं की ताक़त.

टाइम्स ऑफ इण्डिया में लक्ष्मण के कार्टून सभी संस्करणों में छपते थे. देश भर से उन्हें प्रतिक्रियाएँ मिलतीं. बोरों में बंद चिठ्ठियाँ आतीं. दफ्तर में मिलने वालों का ताँता लगा रहता. लोग समझते कि लक्ष्मण के हाथ में कोई जादू की छड़ी है, जो पलक झपकते ही उनकी समस्या दूर कर देगी. कोई नल में पानी नहीं आने की शिकायत करता तो कोई स्ट्रीट लाइट बंद होने की. किसी को मोहल्ले की गंदगी परेशान करती तो किसी को राजनेताओं से शिकायत होती. लक्ष्मण का दरबार जैसे संकटमोचक बन गया था और अगर कहीं किसी समस्या पर उनकी कलम से कार्टून निकल जाता तो उसी दिन समस्या का समाधान भी हो जाता. लक्ष्मण इसी दौर में आम आदमी की ज़िन्दगी के ज़्यादा करीब आए. कुछ तो रेखाओं के ज़रिए निकला लेकिन बहुत कुछ दिमाग में ही धीमी आँच पर पकता रहा. वर्षों बाद दूरदर्शन के धारावाहिक वागले की दुनिया में लक्ष्मण ने सब परोस दिया. धारावाहिक के कर्ता-धर्ता लक्ष्मण ही थे.

laxman_cartoonist3हालाँकि लक्ष्मण की एक उलझन भी थी. एक देश, अनेक धर्म, अलग अलग रीति रिवाजों, विविध वेशभूषा वाले देश में आखिर आम आदमी या कॉमनमैन को वो कैसे व्यक्त करें? महीनों मंथन के बाद जब लक्ष्मण ने कॉमनमैन को अखबार के पन्ने पर उतारा तो वो भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का अमर किरदार बन गया. इस कॉमनमैन ने बेशुमार लोकप्रियता बटोरी. एक ऐसा किरदार, जिससे सब सतर्क और सावधान रहते थे. जो कुछ न बोलकर भी सब कुछ बोलता था. इस आम आदमी के कार्टून की ख्याति समंदर पार थी. लक्ष्मण ने क़रीब-क़रीब सारी दुनिया नापी थी और जब वह विदेशों में जाते तो उन्हें लेने जो भी आता, एयरपोर्ट पर नाम के स्थान पर कॉमनमैन का बड़ा सा कार्टून हाथ में लिए रहता. लक्ष्मण उसे देख लेते. वर्षों तक ये सिलसिला चलता रहा.

लक्ष्मण के कॉमनमैन ने वो धूम मचाई कि कई बार लगा करता था कि कॉमनमैन लक्ष्मण से ज़्यादा पॉपुलर है. पुणे के सिम्बॉयसिस के संचालक एसबी मजूमदार ने एक कार्यक्रम में लक्ष्मण को बुलाया. वहां चर्चा चल निकली कि कॉमनमैन भारत के करोड़ों लोगों का एक चेहरा है. इसे याद रखने के लिए उसकी प्रतिमा लगाई जाए और सिम्बॉयसिस संस्थान परिसर में कॉमनमैन की प्रतिमा खड़ी कर दी गई. वर्षों से यह प्रतिमा हर आने जाने वाले का ध्यान खींचती है. इतना ही नहीं मुंबई में भी कुछ स्थानों पर इसी कॉमनमैन की प्रतिमा नज़र आती है. क्या दुनिया में कोई भी ऐसा दूसरा उदाहरण है जहाँ काग़ज़ के किरदार की मूर्ति लगाई गई हो और वो किरदार बड़े बड़े नेताओं से कहीं ज़्यादा पसंद किया जाता हो. खुद लक्ष्मण भी मानते रहे कि उनका रचा गया कॉमनमैन लोगों के परिवार का हिस्सा बन गया है. पुणे के उस कार्यक्रम के बाद लक्ष्मण ने पुणे की सैर की और फ़ैसला किया कि वो अब पुणे में ही रहेंगे. औंध इलाक़े में मकान खरीदा गया और मुंबई से विदाई ले ली. सिम्बॉयसिस संस्थान ने इसके बाद लक्ष्मण शोधपीठ स्थापित की. जाने-माने पत्रकार दिलीप पडगांवकर इस लक्ष्मण चेयर के अध्यक्ष हैं.

यह लक्ष्मण का ही जज़्बा था कि नब्बे साल की उम्र में भी वह सक्रिय थे. कुछ समय पहले पक्षाघात ने शरीर पर असर दिखाया था. बुढ़ापे की बीमारियों ने भी दस्तक दे दी थी. लक्ष्मण इसके बावजूद ज़्यादातर काम खुद ही करते थे. कमला लक्ष्मण बताती हैं कि मैगसायसाय पुरस्कार लेने गए तो लक्ष्मण की लोकप्रियता को देखकर वो हैरान रह गईं. वो कहती हैं कि पचास-साठ साल से दुनियाभर के कार्टूनिस्ट एक तरह से लक्ष्मण की पूजा करते हैं. विश्व में लक्ष्मण की ऊँचाई तक शायद ही कोई और कार्टूनिस्ट पहुँचा हो.

हम लोगों को क़रीब क़रीब तीन घंटे हो चुके थे. मैंने चलने की अनुमति माँगी तो कमला जी ने एकदम मना कर दिया. बोलीं, खाने का टाइम है. बिना खाए नहीं जाने दूंगी. पांच मिनट में ही थर्मोकॉल की प्लेट में दक्षिण भारतीय व्यंजन आ गए. हम थोड़ा हैरान थे. प्लेट और गिलास एक बार इस्तेमाल होने वाले बर्तनों में? हमारी हैरानी कमलाजी ने दूर कर दी. बोलीं, लक्ष्मण को एक एक बूँद पानी की चिंता रहती है. कई साल से हमारे यहाँ जूठे बर्तन नहीं धुलते क्योंकि सभी लोग एक बार इस्तेमाल होने वाले बर्तनों में खाना खाते हैं. इससे पानी की काफ़ी बचत होती है. मैं सोच रहा था – क्या एक बूँद पानी के लिए इस तरह चिंता करने वाला देश में कोई दूसरा परिवार होगा? शायद नहीं.

भोजन के बाद हमने विदाई चाही, लेकिन एक रस्म बाकी थी. कमला जी ने हमें लक्ष्मण की ओर से उनके बनाए गणपति का रेखाचित्र भेंट किया. हमारे लिए यह अनमोल तोहफा था. पुणे से लौटने के बाद भी हमारी कमला जी से फोन पर बात होती रही. उनके बेटे-बहू मुंबई में रहते हैं. उनसे बात होती रही. फिल्म का संपादन क़रीब -क़रीब पूरा हो चुका था और मैं सोचा करता था कि खुद लक्ष्मण अपने पर तैयार फिल्म देखेंगे तो क्या सोचेंगे. अपनी प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करेंगे. फिर मन कहता, हो सकता है तब तक वो कुछ बोलने लगें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 26 जनवरी को यह महानायक हमारे बीच से हमेशा के लिए चला गया.