अमित शाहः नए राजनीतिक दौर के शो मैन

Anugrah Mishra

amit_shaha“भाजपा के विरोधी उपचुनाव के बाद ये कह रह थे कि देश से मोदी लहर ख़त्म हो गई है, उनके लिए ये चुनाव नतीजे सबक हैं. नतीजों के बाद से ये सिद्ध हो गया कि मोदी लहर खत्म नहीं हुई बल्कि अब वह सुनामी बन गई है जो सभी विरोधी दलों को ध्वस्त करने में सक्षम है…”. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का ये बयान उनके ज़बरदस्त आत्मविश्वास और देश की राजनीति में भाजपा के बढ़ते वर्चस्व की गवाही देता है.

लोकसभा चुनावों तक अमित शाह पर्दे के पीछे की राजनीति कर रहे थे तब भाजपा का असली चेहरा नरेंद्र मोदी थे. चुनाव के दौरान अमित शाह ने अपनी बेजोड़ कार्यकुशलता और राजनीतिक प्रबंधन की बदौलत भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई.

शाह की मेहनत का नतीजा सामने था, चुनाव के बाद भाजपा के कई कद्दावर नेताओं को पीछे छोड़ते हुए अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. महाराष्ट्र और हरियाणा का विधानसभा चुनाव उनकी नेतृत्व क्षमता की पहली परीक्षा थी जो शानदार सफलता के साथ साबित भी हुई.

नतीजे साफ बताते हैं कि शाह इस परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए हैं. अमित शाह को भाजपा के तमाम बड़े नेताओं से इतर दोनों राज्यों में प्रचार का जिम्मा सौंपा गया था. महाराष्ट्र और हरियाणा में शाह ने जमकर प्रचार अभियान में हिस्सा लिया और पार्टी के लिए वोट मांगे.

महाराष्ट्र में हमेशा से सहयोगी पार्टी माने जाने वाली भाजपा 15 साल पुरानी कांग्रेस सरकार को उखाड़ते हुए राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. सीटों के मामले में शिवसेना और एनसीपी भाजपा से कहीं पीछे छूट गए. उनके आत्मविश्वास का अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है, जब चुनाव नतीजों के ठीक बाद की प्रेस कांफ्रेंस में अमित शाह महाराष्ट्र में सरकार बनाने के बारे में साफतौर पर ये कहते हुए नज़र आते हैं कि राज्य में सबसे बड़ी पार्टी भाजपा है और सीएम की कुर्सी भी भाजपा के पास ही रहेगी.

वहीं दूसरी ओर हरियाणा में जाट वोटों की राजनीति इस बार ध्वस्त होती नज़र आई. 2009 के विधानसभा में चार सीटें जीतने वाली भाजपा 2014 में 47 सीटें जीतकर अपने दम पर सरकार बनाने जा रही है.

90 विधानसभा सीटों वाले राज्य में भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है. हरियाणा में भाजपा को इससे पहले कभी 16 से ज्यादा सीटों पर जीत नहीं मिली थी. यहां भाजपा ने कभी 26 से ज्यादा सीटों पर चुनाव ही नहीं लड़ा था. ऐसे में मौजूदा नतीजों को चमत्कारिक कहना गलत नहीं होगा. अमित शाह दोनों राज्यों में अपनी जीत को देश में चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी जीत मानते हैं.

दोनों ही राज्यों में हुए चुनाव, पार्टी अध्यक्ष होने के नाते अमित शाह के लिए काफी अहम थे. शाह को ख़ुद को साबित करना शायद इसलिए भी अहम रहा क्योंकि पार्टी के इतने पुराने चेहरे और राजनीतिक दिग्गज को अध्यक्ष पद से रिप्लेस करने की नौबत आन पड़ी.  राजनीतिक हलकों में ऐसी भी अटकलें लगाईं गईं कि पार्टी के अंदर मोदी से अलग-थलग पड़े खेमे में अमित शाह को लेकर बेचैनी भी है. अटकलें ऐसी भी लगीं कि आम चुनावों में पार्टी को उत्तर प्रदेश से मिली बड़ी सफलता के पीछे किसी व्यक्ति विशेष के चुनाव प्रंबधन से कहीं ज़्यादा वहां के आंतरिक हालात ज़िम्मेदार रहे. साथ ही राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ सरकारों से जनता का मोहभंग भी पार्टी की सफलता के लिए काम कर गया.

अमित शाह की कुशलता का परीक्षण इसलिए भी और महत्वपूर्ण हो गया जब मोदी लहर का डंका पीटने वाली पार्टी का प्रदर्शन आम चुनावों के ठीक बाद राज्यों में हुए उपचुनावों में निराशाजनक रहा. ऐसे वक्त में अमित शाह के सामने कड़ी चुनौती थी और संगठन में मिली सर्वोच्च भूमिका और मोदी के चहेते होने के विश्वास को क़ायम रखने के लिहाज से अहम भी हो गई थी.

महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों ही राज्यों में बिना गठबंधन के चुनाव लड़ने का फैसला अपने आप में एक जोखिम भरा काम था. जोखिम ऐसा जब दोनों ही राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के साथ बरसों का रिश्ता रहा हो. हरियाणा में जहां पुरानी सहयोगी इनेलो का साथ छूटा तो वहीं महाराष्ट्र में भाजपा को 25 साल पुराने साथी शिवसेना का दामन छोड़ना पड़ा. लेकिन ‘नो रिस्क, नो गेम’ वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए नए भाजपा अध्यक्ष ने ये साहस किया और आखिरकार ये जोखिम इतना सही साबित हुआ कि सारा खेल उनके पक्ष में आ गया.

निश्चित तौर पर भाजपा को मिली ये कामयाबी अभूतपूर्व है और इस कामयाबी में अमित शाह एक शो-मैन की तरह उभरकर सामने आए.