स्लम बस्तियों में रहने वालों की जनसंख्या में बढ़ोतरी

Shyam Sunder

urban_poor2011 की जनगणना के अनुसार स्लम बस्तियों में रहने वालों की आबादी बढ़ी है. पिछले 10 सालों में स्लम में रहने वालों आबादी में लगभग डेढ़ करोड़ लोग और जुड़ गए हैं.

जनगणना के नए आंकड़ों के अनुसार क़रीब 6 करोड़ लोग एसी बस्तियों में रहते हैं जंहा जीने के लिए मूलभूत सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं. लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान शहरी ग़रीबी उपशमन मंत्री वैंकया नायडू ने ये जानकारी दी. स्लम बस्तियों में आबादी बढ़ने का एक बड़ा कारण बढ़ता शहरीकरण बताया गया है. सरकार के अनुसार बड़ी तादाद में लोग शहरों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं. लेकिन शहरों में उस अनुपात में जगह की कमी है.

सरकार की तरफ से दी गई जानकारी में स्लम बस्तियों को कई श्रेणियों में बांटा गया है. पहली श्रेणी में वो स्लम बस्तियां हैं जो राज्य सरकारों ने नोटिफाई की हैं. दूसरी श्रेणी की बस्ती वो हैं जो सरकार की तरफ से मान्यता प्राप्त हैं यानि सरकार उनका वजूद मानती है. लेकिन क़रीब 50 लाख लोग ऐसी बस्तियों में रहते हैं जो ना नोटिफ़ाईड है और ना ही मान्यता प्राप्त. यानि इन बस्तियों में रहने वालों को उतनी सुविधा भी नसीब नहीं हैं जितनी दूसरी स्लम बस्तियों में नसीब हैं.

इन बस्तियों में सुविधाओं की बात करें तो केवल 19 प्रतिशत बस्तियां ऐसी हैं जिनके अपने इलाक़े में शौचालय हैं. इसका मतलब ये है कि उन्हे अपनी शौच के लिए बस्ती से बाहर नहीं जाना पड़ता लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इन बस्तियों के घरों में शौचालय मौजूद है. नालियों की बात करें तो सिर्फ़ 37 प्रतिशत बस्तियों में ये सुविधा मौजूद है. जंहा तक पीने के पानी का सवाल है 57 प्रतिशत घरों में पीने का पानी उपलब्ध है. बिजली के मामले में ज़रुर हालात बेहतर नज़र आते हैं. सरकार के अनुसार स्लम बस्तियों में क़रीब 90 प्रतिशत घरों में बिजली का कनेक्शन मौजूद है.

सरकार की तरफ से लोकसभा में कहा गया केन्द्र सरकार सभी ग़रीबों को घर उपलब्ध कराना चाहती है. लेकिन ज़मीन उपलब्ध कराना राज्य का विषय है. लेकिन सबसे ज़्यादा चिंता की बात है कि स्लम बस्तियों में आबादी बढ़ने की जो वजह बताई जा रही है उसमें ही खामी नज़र आती है. सरकार का कहना है कि इसका बड़ा कारण शहरीकरण के प्रति बढ़ता आकर्षण है. लेकिन गांवों से शहर में पलायन की शायद सबसे बड़ी वजह ग्रामिण भारत में रोज़गार के अवसरों की कमी है. ये साबित हो चुका है कि जंहा भी मनरेगा जैसी योजनाएं इमानदारी से लागू हो पाईं वंहा से पलायन कम हुआ है.