दिल की ज़बान कोई फ़र्क़ नहीं करती

Rajesh Badal

जिस तरह सूरज की किरणों की कोई सरहद नहीं होती, बहते हुए झरने का कोई मज़हब नहीं होता और ठंडी हवाओं की कोई भाषा नहीं होती, वैसे ही साहिर के गीत और

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आत्मा से चिपका हुआ एक मृत्युगीत

Rajesh Badal

नीरज जो आज सोचते हैं, वो दुनियाभर से ग़ुम होती जा रही इंसानियत और उससे होने वाले खतरों पर है. क़रीब-क़रीब 90 साल का हो रहा एक इंसान आज भी कविता के

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