राष्ट्रीयता और सामाजिक चेतना के कवि: रामधारी सिंह दिनकर

Ritu Kumar
   “सुनुँ क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युग-धर्म का हुंकार हूँ मैं        कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का, प्रलय गांडीव का टंकार हूँ मैं।“

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हिन्दी -उन्नति का मूल

Sandeep Yash
14 सितंबर यानी आज हिन्दी दिवस है। हिन्दी संघर्षरत भाषा रही है। इसे लेकर सड़क से संसद तक आजादी से पहले और बाद भी आवाज उठती रही है। दस्तावेज़ बताते

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कहाँ खो रही है हमारी बोलियों की मिठास

Rajesh Badal

एक ज़माना था जब कहा जाता था कि बच्चों का रिश्ता अपने माता पिता से ज़्यादा दादा-दादी या नाना नानी से होता है. लेकिन अब तस्वीर बदल गई है. दादी या

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विलाप निरर्थक, मिलावट पर चिंता कीजिए

Rajesh Badal

इन दिनों राष्ट्रभाषा हिन्दी के बारे में अनेक स्तरों पर जानकार विलाप करते नज़र आते हैं. अगर उनकी बातों को गंभीरता से लिया जाए तो लगता है कि हिन्दी

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दिल की ज़बान कोई फ़र्क़ नहीं करती

Rajesh Badal

जिस तरह सूरज की किरणों की कोई सरहद नहीं होती, बहते हुए झरने का कोई मज़हब नहीं होता और ठंडी हवाओं की कोई भाषा नहीं होती, वैसे ही साहिर के गीत और

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