चुनाव विश्लेषण: दिल्ली में क्यों धूल हो गया फूल

Panini Anand

narendra_modiभाजपा के दिल्ली में धूल-धुसरित होने के कई कारण हैं. 16 मई से चले आ रहे जीतों के सिलसिले का घमंड जिस तरह से पार्टी को बदज़बान, निरंकुश और अतिवादी बनाता जा रहा था, उसमें दिल्ली के दरवाज़े पर कई दस्तकें न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनाई दे रही थीं और न ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को. पार्टी के मतांध नेतृत्व की एक के बाद एक ग़लती दो मोर्चों की लड़ाई को एकतरफा हवा में तब्दील करती चली गई और प्रबंधन से लेकर लहर तक के सारे दावे धूल हो गए.

किरण का विकिरण

सबसे बड़ी ग़लती थी किरण बेदी का चुनाव. पार्टी को लगा था कि कांटे से कांटा निकाल लेंगे. लेकिन जितनी बार किरण बेदी मुंह खोलती थीं और कुछ बोलती थीं, पार्टी के वोट कम होते जाते थे. किरण बेदी न तो पार्टी के लोगों का दिल जीत सकीं और न ही पार्टी के नेताओं का विश्वास. उन्होंने तिहाड़ के कैदियों की तरह वोटरों को संबोधित किया, चुनावी जनसभाओं को पाठशाला समझा और लगातार किसी ठोस बात के बजाय मोदी प्रेम में डूबी हवाई बातें कहती रहीं.

संगठन बनाम व्यक्ति

पैसा और ताकत हर वक्त और हर जगह काम नहीं आते. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह लगातार अपने अतिविश्वास की वेदी पर संगठन के लोगों और कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान और अस्तित्व की बलि देते रहे. दिल्ली भाजपा और उससे पहले जनसंघ का गढ़ रहा है. यहाँ दशकों से समर्पित भाव से काम करता आ रहा कार्यकर्ता भी है और छोटा-बड़ा नेतृत्व भी. सभी को कमतर मानकर आयातित नेतृत्व के सहारे खेलने की ग़लती भीतरघात और विद्रोह की वजह बनी. चुनाव परिणामों को देखकर नहीं लगता कि पार्टी के अपने स्थायी जनाधार ने भी पार्टी के पक्ष में वोट दिया है.

उपलब्धियों का कालपात्र

दिल्ली सूचना और संचार की, संप्रेषण की राजधानी है. यहाँ के नागरिक अधिक साधन संपन्न होने के कारण ज़्यादा करीब से चीज़ों को देख पाते हैं. मोदी का मंत्र भले ही किसी बेहतर भविष्य की उम्मीदों के जादू में बाकी राज्यों को रसरंजित करते चल रहे हों, लेकिन दिल्ली में उपलब्धियों की नौ महीने की कहानी ही भाजपा के लिए कालपात्र बन गई. इस कालपात्र में एक ओर महंगाई, भ्रष्टाचार, तानाशाही, सांप्रदायिकता और घमंड था तो दूसरी ओर भूमि अधिग्रहण से लेकर मजदूरों, श्रमिकों के साथ हुए छल की लंबी फेहरिस्त. इससे न तो ग्रामीण दिल्ली में सिर उठाकर चला जा सकता था, न प्रवासी दिल्ली में और न ही जमी-बसी संभ्रांत और मध्यवर्गीय दिल्ली में.

किसके आंगन में खिला फूल

उद्योग जगत की गोद में बैठकर, उससे अपनी पीठ थपथपवाकर और उसके इशारे पर चलकर कोई भी नेता लोगों का दिल नहीं जीत सकता. जिस वक्त मजदूरों के अधिकारों, श्रम कानून, रोज़गार और आर्थिक नीतियों पर लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे थे, उस वक्त अडानी का कारोबार सातवें आसमान पर जा रहा था, अंबानी के अस्पताल का उदघाटन हो रहा था, एक निजी चैनल को वफादारी का वजीफा मिल रहा था और बार-बार कहा जा रहा था कि विकास के लिए लोगों को समझौते करने पड़ेंगे. संसाधन, ज़मीन, जंगल और सब्सिडी में कटौती को अपरिहार्य बताया जा रहा था. अगर आप की जीत का आंकड़ा 35-40 तक होता तो यह दिल्ली के लिए जनादेश होता लेकिन 60 पार का आंकड़ा स्पष्ट बताता है कि यह दिल्ली भाजपा की हार नहीं, मोदी की हार है.

मोदी, भाजपा की भाषा और अहंकार

कभी उन्हें बुरे गोत्र का कहा गया तो कभी नक्सली, कभी कहा गया कि जो जैसा काम कर सकता है, उसे वही करना चाहिए. कभी भगोड़ा तो कभी धोखेबाज़. जिस तरह के विज्ञापन और जिस तरह की भाषा रैलियों और भाषणों में सुनने को मिली, उससे भाजपा लगातार लोगों का विश्वास खोती गई. लोग दिल्ली के लिए भाजपा की नीति और नीयत जानना चाहते थे और उन्हें केवल कड़वाहट सुनने को मिल रही थी. सत्ता में बैठी किसी पार्टी के लिए यह कतई शोभनीय नहीं था. मोदी अपने ही भाषणों की चोट खा गए हैं. सत्ता का अहंकार, जीत का अहंकार और अपने में डूबा नायक इसी गति को प्राप्त होता है.

विकास बनाम फासीवाद

लोग वादों की टाल पर बैठे विकास की राह देख रहे थे. लोगों को उम्मीद थी कि मोदी जी ने जो वायदे किए हैं उनको फलीभूत होते वे देखेंगे. वे देखेंगे कि जिस तरह की चमक को चुनाव से पहले आतिशी रंग देकर लोगों की आंखों में उतारा गया, वो हक़ीक़त में बदलेगी. लेकिन विकास की जगह कैमरे के लिए सफाई अभियान का नाटक दिखा. दो बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य की चिंता कर रहे समाज को पांच और 10 बच्चे पैदा करने के फतवे सुनाई दिए. कपड़े और राशन के लिए दिनरात खून गारते लोगों को 10 लाख के कोट में नामधारी प्रधानसेवक दिखा. समाज को रामज़ादों और हरामज़ादों में बांटा जा रहा था. यह सब ताबूत में कील बनते गए.

इसके अलावा कितने ही और पहलू हैं जो भाजपा के लिए प्रतिकूल साबित हुए. भाजपा के अश्वमेध का घोड़ा दिल्ली में एक मामूली सी और कल की पार्टी ने रोक दिया. यह लवकुश द्वारा राम के अहंकार को चुनौती थी. अहंकार कभी नहीं जीतता और उसका टूटना अवश्यंभावी होता है. भाजपा अगर इसे समझ सकेगी तो आगे चलने में आसानी होगी.